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– नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’

 

काजल का किसी बात पर अपनी पड़ोसन से झगड़ा हो गया। पड़ोसन कुछ ज्यादा ही झगड़ालू थी। उसने कह दिया कि तेरा पति तुझे मारता – पीटता है और तू बांझ है। शादी किए सात साल हो गए लेकिन माँ नहीं बनी। ऐसी बांझ का सुबह सवेरे मुँह देख लेने पर पूरा दिन खराब हो जाता है।
काजल बहुत रोई। पति और दूसरी औरतों ने उसे समझाया, चुप कराया।
वह शाम को राशन लेने दुकान गई। दुकान मालकिन झगड़े की बात पूछने लगी। तभी मालकिन का लड़का आया और बाहर मारूती भान में दुकान का सामान यों ही रखा देख भड़क गया और अपनी माँ को खूब गालियाँ देने लगा कि उसने नौकर से सामान दुकान में क्यों नहीं रखवाया ?
बूढ़ी माँ को काटो तो खून नहीं। सामान जैसे – तैसे दुकान में फेंक बेटा माँ को दुबारा गाली देते हुए चला गया।
माँ के झर – झर आंसू गिर पड़े। वह काजल से बोली, “बेटा हो तो भी दुख, ना हो तो भी दुख। कोई तुझे निपूति बांझ ही कहता है और मैं सपूति होकर कौन सा सुख भोग रही हूँ..?”

2 thoughts on “सपूति”
    1. धन्यवाद ! आपकी अप्रकाशित रचनाओं का स्वागत है .
      – नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’

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