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– नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’

 

रात दस बजे चाचा – चाची घर आए। दिल्ली जाने वाली उनकी ट्रेन छूट गई थी। उस समय हम खाने की तैयारी ही कर रहे थे। जितना खाना था सबके लिए हो गया, मगर पत्नी रिया के लिए कुछ नहीं बचा। मम्मी ने कहा कि वह अपने लिए रोटी – सब्जी बना ले। रिया ने कह दिया कि आप चिंता न करें मैं खा लूंगी, भूखे पेट नहीं सोऊंगी। रसोई के सारे काम निबटा, साढ़े ग्यारह बजे वह खाने के लिए बैठी। मैंने देखा, उसने चूरा को पानी में भिंगों दिया और उसमें नमक – तेल डाल भात की तरह अचार के साथ खा – पीकर सो गई।

एक महीने बाद मुझे आफिस के काम से शहर जाना पड़ा। काम जल्दी पूरा हो गया इसलिए मैं चार दिन में ही लौट आया। लेकिन घर में नहीं बताया। सरप्राईज देना चाहता था।  सबके लिए उपहार ले लिए थे। कमबख्त ट्रेन चार घंटे लेट हो गई। मैं घर रात को 11 : 40 बजे पहुंचा। जानता था कि सभी लोग खा पीकर सो गए होंगे। सिर्फ एक रोटी बची होगी, जो सुबह गाय या चिड़ियां खाती है। मुझे जोर से भूख लगी थी। मैंने भी सोच लिया था कि रिया की तरह आज मै भी चूरा को भात की तरह खाऊंगा। उसे चूरा भिगोंने को कह मैं बाथरूम में चला गया।

आधे घंटे में जब नहा कर आया तो डिनर टेबल पर गमा गर्म पराठें – भूजिया देख अचरज में पड़ गया, “रिया, तुमने मेरे लिए खाना बना कर रखा था क्या ?”

“नहीं। मैंने अभी बनाया है। जल्दी खा लीजिए । ठंडा हो जाएगा ।” हाथ में लगे आटे को धोते हुए रिया बोली।                                                     स्वादिष्ट पराठें – भूजिया खा मेरी आत्मा तृप्त हो गई। मन ही मन मैं रिया के आगे नतमस्तक हो गया।

मेरे मन ने कहा – इसी को  हाउस वाइफ ( गृहणी ) कहते हैं, जो अपने लिए नहीं, बल्कि अपने घर – परिवार, पति और बच्चों के लिए जीती है।

 

2 thoughts on “हाउस वाइफ”
  1. ज़हान भारती अशोक (एस रणज़ीत सि्घ "अशोक") says:

    नीतू जी , नमस्ते जी !
    आपकी मिन्नी कहानी/लघुकथा–हाऊस वाईफ़
    यकीनन एक बेहतरीन लघुकथा है जी ,इस दी
    ज़िन्नी वी तारीफ़ करी जाय ; कम कहलायेगी !
    एैसे हालातों की शिकार …अक्सर मध्यमवर्गीय
    हाऊस वाईफ़ें होती रहती है जी ।
    शेष फिर कभी ….

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