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“राष्ट्रभाषा के बगैर हमारा आजाद देश आज भी गूंगा है!”-  सिद्धेश्वर
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“सरकार अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति से इसे ऊँचे रोजगार की भाषा बनाकर राष्ट्रभाषा का दर्जा दें !”- भगवती प्र. द्विवेदी

पटना :15/09/2021! ” देश की आजादी के बाद भी हिंदी का राष्ट्रभाषा नहीं बनने के दो प्रमुख कारण है ! पहला, व्यवहारिक तौर पर हिंदी के प्रति सरकार की उदासीनता के कारण हिन्दी को नौकरी और व्यावसाय की भाषा नहीं बनाना और दूसरा कारण है हमारे देश की जनता के हृदय में, अपने देश के प्रति आत्मसम्मान का अभाव !”
भारतीय युवा साहित्यकार परिषद के तत्वाधान में, फेसबुक के ” अवसर साहित्यधर्मी पत्रिका ” के पेज पर आयोजित ऑनलाइन हिंदी पर आयोजित वेबिनार में, ” राजभाषा, मातृभाषा हिंदी कब बनेगी राष्ट्रभाषा ?” विषय पर, संयोजक एवं संस्था के अध्यक्ष सिद्धेश्वर ने उपरोक्त उद्गार व्यक्त किया l
विषय प्रवर्तन करते हुए उन्होंने कहा कि -” निश्चित तौर पर भाषा की राजनीति ने हिंदी को देश की राष्ट्रभाषा बनने से रोक रखा है और वह हिंदी के विकास में अवरोध का काम कर रहा है ! वर्षों पहले भी सच यही था और आज भी सच यही है कि ” राष्ट्रभाषा के बगैर राष्ट्र गूंगा होता है और आज हमारा आजाद देश, भाषा के स्तर पर गूंगा है !
मुख्य अतिथि भगवती प्रसाद द्विवेदी ने कहा कि ” हिन्दी दिवस की सार्थकता तभी है जब हम इसे माँ जैसा सम्मान देकर पग-पग पर व्यावहारिक जीवन में अपनाएँ और हमारी सरकार अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति से इसे ऊँचे रोजगार की भाषा बनाकर राष्ट्रभाषा का दर्जा दे।हमें इसे सही अर्थों में विश्वभाषा बनाना है !”
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में नरेंद्र कौर छाबड़ा (महाराष्ट्र )ने कहा कि -” 170 साल पहले का वह व्यक्ति ( लार्ड मायकाले ) अपनी सोच से मर कर भी, ऐसी शिक्षा पद्धति दे गया है कि हम उसी के दीवाने बन के रह गए हैं, आज भी लार्ड मैकाले की शिक्षा पद्धति चल रही है ! उसने अंग्रेजी जानने वाले को वरीयता दिया था,ओर वही आज तक चल रहा है, यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है ? हिंदी के प्रति यह साजिश थी, जिसे हम लोग आज तक नहीं समझ सके है l”
विशिष्ट अतिथि बीरेंद्र कुमार यादव ने कहा कि -” राष्ट्रभाषा बनाने के लिए हिन्दी को, रोजी-रोटी से जोड़ना जरूरी है lअफसोस है कि हिंदी को अपने ही देश में संघर्ष करना पड़ रहा है, और अपने प्रांतीय भाषा को लेकर लोग रोड़ा बने हुए हैं !”
मुख्य वक्ता अपूर्व कुमार ने कहा कि -” हिंदी राजभाषा मात्र एक छलावा और हिंदी राष्ट्रभाषा राजनीतिज्ञों के लिए बस चुनावी मुद्दा है l हिंदी को उचित सम्मान दिलाने की जन आंदोलन की बेहद जरूरत है l इससे गैर हिंदी भाषाई को कोई क्षति नहीं है बल्कि इसी में उनका बड़प्पन सिद्ध होगा l हिंदी को राष्ट्रभाषा नहीं बनने के पीछे हमारी ही कमजोरियां है l”
गजानन पांडे( हैदराबाद )ने कहा कि -” भाषा समाज व संस्कृति का आधार है, अपनी भाषा में ही हमारी उन्नति है! हिंदी इस देश का चरित्र है ! संपर्क भाषा के रूप में हिंदी का कोई विकल्प नहीं है !”
इस व्यापक विचार गोष्ठी में भाग लेते हुए कौशल किशोर और रामनारायण यादव ने भी कहा कि -” सरल और सुबोध भाषा होने के बावजूद हिंदी अपने ही देश में उपेक्षा की शिकार है,यह दुर्भाग्यपूर्ण है l जन आंदोलन के बिना इसे राष्ट्रभाषा बनाना मुमकिन नहीं !”
लगभग तीन घंटे तक चली इस ऑनलाइन अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन में, विचार गोष्ठी के अतिरिक्त, दो दर्जन कवियों ने राजभाषा हिंदी से संदर्भित काव्य पाठ भी किया l आराधना प्रसाद ने -” मैं हिंदी माथे की बिंदी, मुझको ऐसे मत भूलो,गीतों,ग़ज़लों की हूँ खुशबू, मुझको ऐसे मत भूलो !”/ सिद्धेश्वर ने -” हिंदी हमारी राष्ट्र की फुलवारी है !,हिंदी ही कश्मीर है, कन्याकुमारी है !!,कुंठित मन की खोल दो खिड़कियां !,हिंदी में ही मान सम्मान हमारी है !!/मधुरेश नारायण ने -” हिन्दी का मान बढ़ाना है, जग में स्थान दिलाना है !,देश के कोने कोने तक, पैगाम ये पहुंचाना है !”/सीमा रानी ने – ” हिंदी है हम, वतन है हिंदुस्तान हमारा !,कितना खूबसूरत बनाया किसी ने यह नारा !/ डॉ कुंवर वीर सिंह ‘मार्तण्ड ‘(कोलकाता ) ने -” हिंदी को नमन, हिंदी को नमन, भारत माता की बिंदी को नमन !!”/राज प्रिया रानी ने-” मां भारती की माथे की बिंदी, हिंदुस्तान की अभिमान है!, भारत की जन- जन की बोली, सभ्यता – संस्कृति की पहचान है !”/डॉ पुष्पा जमुआर ने -” हिंदी सिर्फ भाषा नहीं, जाति -धर्म के रक्षक है, वीरों की यह गाथा है, मां भारती की माथे की बिंदी है !!”/अभिलाषा कुमारी ने -” सुनो सखी तुम ही बोलो मैं भी हिंदी ही बोलूंगी !”/ कमल (गुजरात )ने -” हिंदुस्तान के हिंदी हवा हूं!, पूरब से पश्चिम उत्तर दक्षिण,मैं आर्यावर्त की चहुँ ओर बहा हूँ !”
ऋचा वर्मा ने -” हिंदी मेरी आत्मा की आवाज है, और जब ये आवाज़, शब्द.. हिंदी के शब्द बन कर उभरतें हैं ,तो मां की नर्म-गर्म गोद में होने के जैसा एक एहसास होता है । /श्रीकांत ( झांसी ), ने -” थोड़ी ठंडा वाणी रख, थोड़ा नरम जवानी रख !”/ राजकान्ता राज ने – ” सब भाषा से मीठी है हिंदी बड़ी!, यह सभ्यता संस्कृति की मजबूत कड़ी !”/ डॉ योगेंद्र नाथ शुक्ल (इंदौर)ने -” हिंदी जीवन दर्शन है, अर्पण और समर्पण है !, नव आशाओं की चितवन है, कुमकुम अक्षत चंदन है !!”/ विभा रानी श्रीवास्तव ने -” निर्णीत अपने धर्म का पालन सहर्ष करते है,सांस हिंदी है, सदा इसके पास रहते हैं !”/कालजई घनश्याम (नई दिल्ली )ने -” यूं तो है हम हिंदुस्तानी, पर असर अभी इंग्लिशतानी !”
हरिनारायण सिंह हरि(समस्तीपुर) ने – “दासी को दे बैठे गद्दी!,हिंदी को समझते हैं रद्दी !,इसमें हम कब- कब बतिआए, आओ हिंदी दिवस मनाएं !”/ दुर्गेश मोहन समस्तीपुर )ने -” हिंदी बनेगी हमारी राष्ट्रभाषा, यह है अमूल्य धरोहर !,है प्राचीन भाषा, है संस्कृत की सहोदर !”/ डॉ मेहता नगेंद्र ने अपनी हिंदी प्यारी हिंदी सारे जग से न्यारी हिंदी सरल सहज भाषा हिंदी, भारत की परिभाषा हिंदी!”- का पाठ कर, हिंदी को गरिमा प्रदान किया !
इसके अतिरिक्त संजय रॉय, तीन सौ से अधिक हिंदी प्रेमियों की भागीदारी रही, जिनमें संतोष मालवीय,सुनील कुमार उपाध्याय, कुमारी मेनका , डॉ गोरख प्रसाद मस्ताना, राम नारायण यादव, एकलव्य केसरवानी, विमलेश कुमार, माला चंद्रा, प्रियंका श्रीवास्तव शुभ्र, अंजू सिन्हा, मंजू कुमारी, डॉ सविता मिश्रा मागधी आदि की भी भागीदारी रही !
– प्रस्तुति: ऋचा वर्मा ( सचिव) एवं सिद्धेश्वर ( अध्यक्ष)> भारतीय युवा साहित्यकार परिषद\ पटना , मोबाइल 92347 60365

2 thoughts on “देश गूंगा है राष्ट्रभाषा के बिना”
  1. हिन्दी दिवस की हार्दिक बधाई,
    ये प्रोग्राम बहुत ही बेहतरीन था। ढ़ेर सारी जानकारी प्राप्त करने का अवसर मिला। एक से बढ़कर एक कविता सबने सुनाया।

  2. मित्रों! यह रचना मेरी नहीं है। हिंदी दिवस पर यह तो मेरे पास एक मैसेज आया था जो मैंने सभी मित्रों को भेज दिया था। पंक्तियों के नीचे किसी का नाम न लिखा होने के कारण शायद यह गलतफहमी हो गई।-डॉ. योगेंद्र नाथ शुक्ल

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