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– अम्बालिका ‘फूल’

 

अचानक खिड़की के जोर से खड़कने की आवाज से हरिनाथ की आंख खुल गई । बाहर देखा तो आंधी आ रही थी। वह खिड़की बंद करने के लिए उठा पर तभी बूंदा बूंदी शुरू हो गयी। बारिश की कुछ बूंदे उसके चेहरे पर पड़ी। नींद तो उचट ही गयी थी वो खिड़की बंद कर बालकोनी में आ बैठा।

दो मंजिले के बने मकान में वो अकेला अपनी बीबी और दो बच्चों के साथ रहता था। वे चैन की नींद सो रहे थे। रात के ढाई बज रहे थे, पर हरिनाथ के सामने खड़े लहलहाते आम के पेड़ ने उसे सोने नहीं दिया। ऐसे ही एक रात घटित उस हादसे को याद कर उसकी आंखें भर आयीं।

बात उस समय की थी जब हरिनाथ जवान हुआ करता था। एक सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार का वो एकमात्र कमाऊ सदस्य था। घर में बूढ़ी माँ थी जो अधिकतर बीमार रहती थी। पिताजी के रहते ही दो बहनों की शादी हो गई थी। ताऊ का एक बेटा था, गणेश जो उन्हीं के साथ रहता था। वह ज्यादा पढ़ा लिखा नहीं था और इलाके की एक दुकान में काम करता था। व्यवहार और काम में काफी कुशल और नेक था। सभी उसकी तारीफ करते। लेकिन समय के साथ – साथ उसे बुरे लोगों की संगति लग गयी।  हरिनाथ इस बात से नाराज रहता और अपने भाई को समझाता, कभी – कभी डांट फटकार भी लगाता। उसकी मां ऐसा करने से मना करती पर वो किसी की नहीं सुनता।  हरिनाथ की माँ गणेश को बहुत प्यार करती थी। उस बिन माँ-बाप के बच्चे पर उनका स्नेह माता स्वरूप रहता। गणेश भी केवल माँ की वजह से ही उस घर में टिका था।

समय गुजर गया और गणेश ने एक नीची जाति की लड़की से शादी कर ली। घर में तूफान मच गया, हरिनाथ ने उसे घर से निकलने की धमकी दे दी। किसी तरह माँ ने समझा कर उसे मनाया। हरिनाथ इस बात पर राजी हुआ कि गणेश कोने में बने उस छोटे से एक कमरे में रहेगा और अपने खाने की व्यवस्था अलग करेगा। बात यही खत्म नहीं हुई। रोजाना कुछ न कुछ खट पट लगी रहती थी।  हरिनाथ को गणेश की बहू फूटी आंख न सुहाती। जिसका गुस्सा वह गणेश पर निकालता। इन झगड़ों से तंग आकर गणेश की पत्नी मायके चली गयी और यह धमकी दे गई कि जब तक जमीन का बंटवारा नहीं होगा वह नहीं आएगी। अब गणेश हर सप्ताह दुकान से फुरसत पाकर उसे मनाने जाता।

इधर हरिनाथ की माँ उसे कहती कि गणेश के हिस्से का जमीन उसे दे दे। पर हरिनाथ उसे सबक सिखाना चाहता था । उसने  माँ से कहा, “गणेश ने जो किया है उसकी यही सजा है । मैं यह जमीन उसे बर्बाद करने के लिए नहीं दे सकता।”

हरिनाथ और गणेश के पास एक आम का बगीचा था जिसमें दोनों भाइयों का हिस्सा था, लेकिन बहुत पहले ही हरिनाथ ने गणेश को उससे बेदखल कर दिया था और कहा कि जब तक किसी काम के लायक नहीं बन जाते इस बगीचे के तरफ देखना भी मत। गणेश को इस बात का कोई मलाल नहीं था। उसे न तो जमीन से मतलब था न ही आमों से। उसे बड़ी माँ के हाथों का प्यार ही लुभाता।

जेठ का महीना चल रहा था। महीने के अंत में गणेश अपनी ससुराल पहुंचा। उसकी पत्नी ने कहा, “यह क्या खाली हाथ चले आये, अपने बाग के आम कहाँ हैं ?”

गणेश ने कहा, “वो तो मैंने भैया को दे दिया।”

पत्नी गुस्से में उसे दुत्कारते हुए बोली, “अभी यहाँ से निकल जाओ। तुम शादी के लायक ही नहीं थे फिर भी मैंने तुमसे शादी कर ली । अपने जमीन – जायदाद प्यारे भाई की झोली में डाल दिए । मुझे मेरा हक चाहिए । जमीन, जायदाद, बाग़, बागीचा अन्न – फल सब ! पहले तुम बगीचे के आम लाकर ही दिखाओ ।”

गणेश कुछ देर सोच कर बोला, “ठीक है। मैं आम ला दूँगा तो तुम घर वापस चलोगी न ? बाद में मैं भैया से अपना हिस्सा भी ले लूँगा ।”

पत्नी ने हामी भरी ।

गणेश खुश होकर घर आया। बड़ी माँ के हाथ का खाना खाया और बगीचे की ओर चल दिया। उसने आम तोड़े और उन्हें समेट ही रहा था कि वहाँ हरिनाथ आ गया। उसे देखकर पहले तो गणेश को थोड़ा डर लगा लेकिन फिर खुद को सम्हालते हुए उसने कहा, “भैया, तुम्हारी बहू ने बगीचे के आम मंगवाएं हैं उसी के लिए ले जा रहा हूँ।”

हरिनाथ गुस्से से लाल – पीला हो गया । उसने जोरदार थप्पड़ गणेश के गालों पर जड़ दिए। वह गिर पड़ा। फिर उसने गणेश को लात – घूंसों से मारना शुरू किया और साथ में गालियां भी देता रहा। जब वह थक गया तो गणेश को वही बुरी हालत में छोड़ कर वापस आ गया।

शाम होने तक गणेश के वापस नहीं आने पर माँ ने हरिनाथ से पूछा। उसने अनमने ढंग से कहा कि होगा कहीं पड़ा हुआ। सूरज ढलते ही एक आदमी भागता हुआ आकर हरिनाथ को बताया कि गणेश बगीचे में बेसुध पड़ा है शायद उसे कुछ हो गया है। माँ ने भी सुना वो रोने लगीं। हरिनाथ की हालत भी अब खराब हो रही थी। उसे गणेश को बुरी तरह से पीटने का मलाल होने लगा।

हरिनाथ जब बगीचे में गणेश के पास गया तो उसने देखा गणेश के मुँह से झाग निकल रहा था और पास ही जहर की शीशी पड़ी थी।  हरिनाथ के पैरों से जमीन घिसक गयी। गणेश ने जहर पी कर खुदकुशी कर ली थी। आखिरकार जिंदगी के तमाम उलझनों को पार करता हुआ गणेश आत्म ग्लानि से भर कर घर के लोगों से ही हार गया था ।

इतने में आस पास के लोग भी आ गए और बात फैल गयी। हरिनाथ की माँ तक ये बात पहुंची तो वो अपना सुध बुध खो बैठी। गणेश की पत्नी को भी खबर पहुँची उसने बदला लेने के लिए पुलिस में रिपोर्ट लिखवाई कि हरिनाथ ने उसके पति को मार डाला। हरिनाथ को इसकी भनक लग गयी वह किसी तरह बचते बचाते वहाँ से भाग निकला और गणेश की लाश पुलिस ले गई। करीब दो सप्ताह बाद हरिनाथ गिरफ्त में आ गया। तीन महीने के बाद रिश्तेदारों की मदद से किसी तरह उसे जमानत मिली और वह जेल से बाहर आया। बाद में उसी आम के बगीचे को बेचकर हरिनाथ ने कोर्ट कचहरी को रफा दफा किया।

आज बरसों बाद उसे वह बगीचा और चारों तरफ बिखरे पड़े आमों के बीच बेजान गणेश याद आ रहा था। आज कोई नहीं जो उसकी जमीन के हिस्से का दावेदार हो… न माँ है, न ही गणेश और न ही आत्मा की शांति। बस है तो अदृश्य रूप में चारों तरफ फैला हुआ अपना पाप ! और आँखों से गिरते हुए आंसू !

2 thoughts on “ग्लानि”
  1. Valuable story which teaches us nice life lessons.
    It will surely help people to understand and do right and wrong things and to give value for what to be needed.

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