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 – सुरेन्द्र  कौर बग्गा

         आज  “राज्य सिविल-जज” प्रतियोगी – परीक्षा का परिणाम घोषित हुआ था । जिसमें  नेहा का ” सिविल- जज ” ( न्यायाधीश ) पद के लिए चयन हो गया था । घर में उत्सव जैसा माहौल था। पापा- मम्मी खुशी से झूम रहे थे, पर उसके मन का एक कोना उदासी में डूबा हुआ था ।
            आज उसे अपनी दादी माँ की बहुत याद आ रही थी जिन्हें उसके पापा- मम्मी बहुत पहले वृद्धाश्रम मे छोड़ आए थे । वे नेहा को बहुत प्यार करती थी । दादी माँ के जाने पर वह बहुत रोई थी, पर उस समय वह बहुत छोटी थी इसलिए कुछ कर नहीं सकती थी ।
           वह सोच रही थी कि अब तो वह जज बन गई है, क्या अपनी दादी माँ पर हुए अन्याय से उन्हें मुक्त करा पाएगी ?
         कल से नवरात्रि पर्व शुरू होने वाला था । हर साल मम्मी बड़े विधि-विधान से “माँ दुर्गा” की घट- स्थापना करती थी। शहर में चारों ओर “जय माता दी “की ही गूंज सुनाई देती थी।
                अगले दिन घर पर, घट- स्थापना के  मुहूर्त में नेहा अपनी दादी माँ को साथ लेकर दरवाजे पर आ खड़ी हुई थी और मम्मी से कह रही थी –  “मम्मी, आज से हम असली देवी माँ की पूजा करेंगे और नौ-दिनों के बाद भी वह यहीं रहेगी,  हमेशा – हमेशा के लिए हमारे साथ ।”
                     असली न्याय की शुरूआत उसके स्वयं के घर से हो चुकी थी ।
 – 343 विष्णु पुरी एने.
  इंदौर
मो. 9165176399
One thought on “न्याय ”
  1. वाह क्या बात है, अद्भुत न्याय का उदाहरण घर से ही

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