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 – नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’

 

नवरात्र के नवमी की सुबह प्रत्यूष उठते ही अपनी पत्नी से कहा, “प्रज्ञा, जल्दी से तुम देवी माँ का हवन करके तैयार हो जाओ डॉक्टर के पास चलना है बहुत मुश्किल से आज का अप्वाईमेंट मिला है ।”

“मैं हवन सवन कुछ नहीं करूंगी ।” प्रज्ञा गुस्से से बोली ।

“तुम हवन नहीं करोगी, पागल हो गई हो । हवन करोगी तब न देवी माँ हम पर सदा खुश रहेंगी हमारे घर में आकर सदा विराजमान रहेंगी ।”

“मामूली – सी मिट्टी की देवी माँ को खुश करने के लिए मैं हवन करूँ और जो  साक्षात् मेरी कोख में नन्हीं देवी माँ का रूप आई है उसे तो आप आज जान से मारने पर उतारू हैं । क्या ख़ाक देवी माँ इस घर पर प्रसन्न होंगी ।” कहते – कहते प्रज्ञा फफक कर कमरे में भाग गई ।

कुछ देर बाद वह तैयार होकर प्रत्यूष के सामने आकर खड़ी हो गई। प्रत्यूष ने उसे गौर से देखा । खूब रोने से उसकी आँखें एकदम लाल हो गई थीं, चेहरा मुरझाया हुआ था।

इसी प्रज्ञा ने जब सुना थी कि वह माँ बनने वाली है तो गुलाब की तरह खिल गई थी । खुशी के मारे उसकी खूबसूरती में और चार चाँद लग गये थे । पर प्रत्यूष को जैसे है पता चला की उसकी होने वाली अजन्मी संतान लड़की है तो गर्भपात के कीड़े ने उसके दिल दिमाग में तूफ़ान मचा दिया था और प्रज्ञा इसी दुःख में अंदर ही अंदर घुलती जा रही थी । माँ बनने के उसके सारे सपने धराशयी होने वाले थे ।

प्रत्यूष हाथ पकड़ कर बोला, “प्रज्ञा, तुम मुझसे नाराज हो ?”

प्रज्ञा ने प्रत्यूष के हाथों से अपना हाथ छुडा लिया, “प्रज्ञा, मुझे माफ़ कर दो मैं तो भूल ही गया था की मिट्टी की देवी माँ कई पूजा आरती और हवन करें से उपर बैठी देवी माँ खुश नहीं होती वह तो खुश होंगी तब जब हम उनके रूप में आने वाली अपनी नन्हीं बेटी को दिल से स्वीकार करे उसका स्वागत करें तुम इस बच्ची को जन्म दोगी, प्रज्ञा मेरी बच्ची को जन्म दोगी ।” प्रत्युष प्रज्ञा के दोनों हाथ पकड़ कर रुधे गले से बोला ।

“तुम सच कह रहे हों”

“हाँ, प्रज्ञा, अब तुम हवन करोगी न ।”

प्रज्ञा ने मुस्कुराकर हाँ में सर हिला दिया फिर प्रत्यूष का हाथ पकड़ कर उसके कदम पूजा घर की तरफ बढ़ने लगे ।

पंडित जी का सस्वर श्लोक उसके कानों में मिश्री घोलने लगा –

या देवी सर्व भूतेषु मातृरूपेण संस्थिता

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम :

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