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– नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’

 

छोटकू बाबू साहेब कब से चटोरी के बाबा केसर से पता नहीं का खुसर – फुसर कर रहे थे कि चटोरी की माई लाजवंती एकदम बेचैन हुए आंगन से ओसारी और ओसारी से आंगन कर रही थी. लगा कि उसके पेट में मरोड़ ने होलगी. चापाकल से गई, घर के पिछूती !टूटहिया प्लास्टिक की बाल्टी में पानी भर कर चली

वहां से आने के बाद भी वह हल्की नहीं हुई.

से हाथ मांज और हाथ – पैर धो फिर ओसारी में आई.

देखा, अब छोटकू बाबू साहेब खटिया से उठे हैं और हाथ जोड़कर बोले हैं, ‘‘भैया, हमारे घर में चिराग जलाना अब आपके ही हाथ में है. सही फैसला करिएगा . हमारे बाप – भाई के किये अहसान का बदला समझ के चुका देना .’’

तभी उनकी नजर लाजवंती पर पड़ी  . बोले , ‘‘ प्रणाम भौजी, मैं फिर कल आऊंगा .’’ कहकर वह चले गए .

केसर खटिया लाकर आंगन में बिछा उस पर पसर गया . लाजवंती अल्मुनिया के लोटे में पानी लेकर सिरहाने खड़ी हो गई, ‘‘चटोरी के बाबा, पानी पी लो .’’

वह लोटे में मुंह घुसा कर गटा – गट पूरा पानी पी गया . लग रहा था कि कितने सालों से प्यासा है. लोटा नीचे रख फिर वह पसर गया .

अमरूद्ध के पेड़ की छाया में वह आंखें बंद कर बस चुप चाप लेटा रहा. ठंडी हवा जोर से बहने लगी. पेड़ के कुछ सूखे पत्ते उसके ऊपर गिर गए. वह बिना बोले अपने माथे से पत्ते हटा नीचे फेंक दिया और लेटे – लेटे ही पैर के पत्ते नीचे गिरा दिया.

यह बोझिल वक्त लाजवंती के लिए बहुत मुश्किल भरा था. वह जल्द से जल्द सारी बातें जानना चाहती थी, क्योंकि एक घंटे से छोटकू साहेब यहां बैठे थे और उसके हाथ की पहली बार चाह पीए थे . वह भी बिना दूध वाली काली चाह नींबू डालकर!

वह उसी समय समझ गई थी कि जरूर कोई खास बात है, नहीं तो वह कभी उसके दुआर पर नहीं आए हैं . उनकी हवेली जाकर ही उनको परनाम पाती करना पड़ता था . माटी के अपने टूटहा घर में उनको बुलाने का सवाल ही नहीं था और बुलाती भी कैसे ? कहां वह गांव के सबसे बड़े जमींदार राजपूत और कहां वह तेली! उम्र में छोटे होने के कारण वह केसर को भैया और लाजवंती को भौजी कह तो देते थे मगर यही भैया – भौजी उनके यहां मजूरी करते थे .

खेत जोतना, बोना , और बोझा उठाना आदि केसर करता था तो लाजवंती उनकी हवेली में झाड़ू – बुहारी और बरतन मांजने का काम करती थी .

केसर ने देखा कि बारह साल की तीसरी बेटी कम्मो चूल्हा में लकड़ी डाल सुलगा रही है , जिससे घर में धुंआ भर गया था और पांच साल की बुचिया ढ़िबरी की मधिम पीली रोशनी में क ख ग याद कर रही है .

ज्यादा अंधेरा होते देख केसर उठ कर जाने लगा . तभी सिर पर बांस की टोकरी लिए बड़ी बेटी चटोरी और दूसरी सुगिया हंसते हुए आ रही थीं . दोनों ने टोकरियां नीचे रख दीं. चटोरी की टोकरी में एक छोटा तराजू और पत्थर के पाव, आधा और एक किलो के बटखरे थे .

तथा चार – पांच थोड़े खराब – खराब नेनुआ और सुगिया की टोकरी में टूटे – टूटे  आठ -दस गोबर के उपले थे .

‘‘लो बाबा, आज हम पूरे दो सौ रूपिया के तरकारी बेचे हैं . आप तो कभी एतना नहीं बेचते . ’’ चटोरी ने रूपए थमाते हुए कहा , ‘‘आज मंडी में किसी के पास नेनुआ नहीं था इसलिए हमने किलो पर पांच रूपिया जादा भाव चढ़ा दिया और देखो सब बिक गए .’’

हाथ में रुपए लिए केसर खुश हो गया और पूरी गहराई से उसने चटोरी को देखा . पांच फीट की लंबी गेहूंमना रंग और नाक एकदम सुग्गा की तरह खड़ी . अगर वह उसे अच्छी खुराक देता तो उसका शरीर और भर जाता . दुबली नहीं दिखती .

‘‘का देख रहे हो बाबा ?’’

‘‘तू बड़ी हो गई है .’’

‘‘हां बाबा , दीदिया को जल्दी से यहां से भगाओ . उनीस बरिस की हो गई और मुझसे बहुत झगड़ा करती है . ससुराल में सास के साथ कमर में लुगा खोंस कर लड़ाई करेगी .’’ सुगिया ने हाथ घुमा – घुमा कर कहा तो केसर हंस पडा  .

‘‘और तू अपनी सास को लाठी से मारना . मेरे बाद तो तेरा ही नंबर लगेगा, आखिर तू मुझसे दो साल ही न छोटी है . चटोरी ने सुगिया की चोटी खींच दी .

‘‘बाबा, मैं इतनी लड़ाकू जहाज हूं ? ’’ सुगिया ने मुंह फुला लिया .

‘‘मुंह फुलाने का काम बाद में करना . पहिले तुम ई बताओ गोइंठा ( उपले ) केतना रूपिया के बेची हो ? ’’ लाजवंती ने पूछा .

‘‘सौ रूपिया…..’’

‘‘एक सौ बीस रूपिया का गोइंठा सौ रूपिया में बेंच दी ? सीख अपनी दीदिया से धंधा कैसे करते हैं ?’’

‘‘माई, हमको ई काम अच्छा नहीं लगता है . हमरे माथा पर दसवीं कक्षा की परीक्षा है और तू गोइंठा बेचने का बोझा थमा दी . आज के बाद मुझसे ई काम मत कहना . चाचा साहेब आ गए थे, इसलिए तेरा धंधा आज मुझे करना पड़ा . अब नहीं करूंगी . लो रूपिया .’’ सुगिया रूपये दे बुचिया के पास किताब खोल कर बैठ गई  .

खाना बनाते समय लाजवंती के पेट में छोटकू साहेब की बात केसर से पूछने के लिए मन कुलबुला रहा था . लेकिन उसे बेटियों के साथ हंसते देख उसने कुछ पूछा नहीं और नेनुआ की तरकारी तथा रोटी बना सभी को खिलाने लगी .

मिट्टी के आंगन में अमरूद के गिरे पत्ते बुहार कर तीन – चार फटी चटाई बिछ गई . चारों बहनें उस पर लेट गईं .

केसर खाट पर लेटा था . खुले आंगन से चंदा मामा और खूब सारे तारों को वह एकटक देख रहा था . अमरूदके पेड़ से छन – छन कर आ रही उसकी चांदनी चारों बहनों पर पड़ रही थी . एक टक देखने से या मन के दुख निकालने के लिए उसकी आंखों की कोर से आंसू गिर रहे थे .

लाजवंती हाथ में कडुआ तेल लेकर उसके सिर पर रख दबाने लगी. तभी उसके हाथों में गिले पन का एहसास हुआ.

‘‘आप रो रहे हो का जी ?’’

केसर चुप रहा . आंसू पोंछ लिया .

‘‘छोटकू साहेब का कह रहे थे ? आप ओही बेरा से परेशान हैं . कह के मन हल्का करो .’’

‘‘चटोरी के माई, छोटकू साहेब बड़ी दूर के एगो बात कह के गए हैं, समझ में नहीं आता का करूं ? हमरे ऊपर उन लोगों के बहुते एहसान है . आज एहसान चुकाने की बारी आई है तो हमरे डेग (पैर) आगे बढ़िए नहीं रहा है.’’

‘‘कइसन बात उहां के कह दिए हैं, जो आप…’’

‘‘उनकी मलकिनी के गर्भ बार – बार गिर जा रहा है . गर्भ में कवनो बेमारी है . अगर उनका बच्चा कवनो औरत अपना पेट में रख लेगी तो वह माई बन जाएगी .”

‘‘ई कइसन बात जी ? उनका बच्चा कोई दोसर मेहरारू अपना कोखि में कइसे रखेगी ?’’ सिर दबाते हुए लाजवंती के हाथ रुक गए .

‘‘आज डाक्टर सब कुछ कर देता है . छोटकू साहेब अंगरेजी में इसका का तो नाम बता रहे थे, स…स…सरोगेट मदरा कि मदर . जो ई काम करेगी उसे खूब पइसा देंगे .’’

‘‘गांव के कवनो मेहरारुई काम नहीं करेगी .’’  लाजवंती ने दो टूक में अपना फैसला सुना दिया,  ‘‘छोटकू साहेब बम्बई में रहके पगलाए हैं का?’’

‘‘ऊ ई काम हमरे चटोरी…’’

‘‘का… ?’’ लाजवंती के हाथ से तेल की कटोरी छूट छन्न से नीचे गिर गई. कडूआ तेल मिट्टी फर्श पर गिरते सूख गया . बस जहां – तहां तेल का दाग बना रहा .

‘‘आप दोनों का मगज ( दिमाग ) एकदम खराब हो गया का…?” लाजवंती ने एकदम से केसर को झिझांड़ दिया .

‘‘तनी ठंडा दिमाग से सोच .’’ केसर ने उसे शांत किया, ‘‘गजेन्द्र सिंह मालिक बेऔलाद ही मर गए . बबन सिंह शादी के तीन साल बादे ट्रक से कुचा के मू गए .उनकी ही पत्नी से विक्रम सिंह (छोटकू साहेब ) बिआह किये अब ऊ माई भी बनने वाली है तो एतना झमेला हो गया है . जहां तुम खड़ी हो यह जमीन उन्हीं लोगों का है . जिसका पच्चीस सालों से उन्होंने एक रूपया किराया नहीं लिया है .

कम्मो के जन्म के बाद ई पूरा गांव हमको यहां से भगाना चाहता था कि हम निपुत्र हो गए हैं . उस समय गजेन्द्र मालिक हमरे पीठ पर खड़ा हुए थे और बेटा – बेटी में फर्क करने वालों को केतना बात सुनाए थे . अपने खेत से तरकारी तूर के तुमको बेचने का हुक्म वहीं न दिए थे . का तुम कभी उनकी तरकारी का पईसा दी हो?’’ केसर ने पूछा .

लाजवंती चुप चाप सुनती रही .

 

‘‘गांव की लड़कियों के लिए गजेन्द्र मालिक स्कूल खोलवाएं . चटोरी को पांचवा कक्षा में फर्स्ट आने पर पांच सौ एक रूपिया का इनाम दिए थे . बेचारे पचास साल के होते – होते में गुजर गए, नहीं तो उनकी कृपा से आज चटोरी अपना ससुराल में होती .

पहली बार छोटकू साहेब कुछ मांगे हैं और हम ना कइसे कहे?’’ केसर खामोश हो गया .

खटिया के नीचे माथा पर हाथ रख बैठी लाजवंती बस सुनती रही . उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या कहे.

‘‘मैं अपनी बेटियों को एतना सख्ती से रखता हूं तब तो ई लोग कवनो गलत राह पर नहीं गई हैं . ना त बिलोचन की बेटी कवन कांड की थी . छेदी धोबिया से ऊ ऐसी लटपटाई कि कुंआरे में उसका पेट रह गया था  .

बिलोचन उस बेटी को घाटी (बांस की मजबूत लकड़ी को इंसान की गर्दन के आगे- पीछे रख उसे जोर से दबाया जाता है, जब तक कि उसकी जान न निकल जाए .) देकर मुआ ही न दिया .

सरोगेट मदर का काम त डाक्टर के जरिये होगा . बस, दूसरे के बच्चे को अपने पेट में नव महीना रखना है .’’

‘‘कुछु मत बोलिए…चुप रहिए .’’ केसर की बात काट लाजवंती थोड़ा जोर से बोली, ‘‘छोटकू साहेब आपका माथा घुमा दिए हैं .’’

वह रात भर चंदा मामा को देखते, अपने भाग्य और गरीबी पर बिलखती रही कि उसकी गरीबी देखकर ही न छोटकू साहेब ई बात कह गए . कहां वह चटोरी की शादी के सपने संजो रही थी और आज बिना शादी के ही उसको ‘माई’ बनने का दिन आ गया है .

धान की तरह उस बीज को चटोरी की कोख में बोया जाएगा और फिर दूसरे के खेत (घर) में उसे रोपा जाएगा . हाय रे दुर्भाग्य! जटहा बाबा!

सुबह आंगन बुहारते चटोरी ने कहा, ‘‘माई, कल बाबा ठीके कह रहे थे . हमें एहसान चुकाना चाहिए . कुछ पइसा आ जाता तो घर की स्थिति ठीक हो जाती .’’

‘‘तू रतिया में सब बतिया सुन रही थी का…’’

‘‘जब कटोरिया छन्न से गिरी थी नू त हमरी अंखवां खुल गई थी . भेज दे हम…’’

लाजवंती का खून खौल गया . चटोरी के हाथ से झाडू छिन गाली देते दना दन उसने उसे तीन – चार झाडू मार दिए,  ‘‘जा…जा रंडीखाना खोल के बैठ जा…’’

‘‘भौजी…. यह क्या कर रही हो?’’ तभी छोटकू साहेब आ गए और झाडू लेकर फेंक दिया,  ‘‘मैं आपकी बेटी से कोई गलत काम करवाने नहीं जा रहा हूं . शहर में बहुत सारी लड़कियां और महिलाएं यह काम करती हैं . लेकिन मैं कोई रिस्क नहीं लेना चाहता, क्योंकि वह सब शराब – सिगरेट पीने के साथ दूसरे से संबंध भी रखती हैं .

जैसे शादी करने के लिए अच्छे कुल खानदान की लड़की हर कोई ढूंढता है वैसे ही मैं इस काम के लिए एक साफ सुथरी लड़की चाहता हूं . आप भले इसे यह काम मत करने दो पर गाली मत दो .

बबन भैया की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी पागल जैसी हो गई थी . मेरे साथ एक लड़की वकालत कर रही थी . हम दोनों शादी करना चाहते थे . लेकिन भाभी की हालत देख मुझे उस लड़की से माफी मांगनी पड़ी . आपको पता ही है हमारे राजपूत खानदान में विधवा की शादी नहीं होती . लेकिन मैंने सबको समझाया . मेरी शादी से सभी रिश्तेदार नाराज हैं .’’ कहते हुए विक्रम सिंह ( छोटकू साहेब ) ने हाथ जोड़ लिया, ‘‘मैं हाथ जोड़कर आपकी चटोरी को सिर्फ एक साल के लिए मांग रहा हूं . मैं चाहूं तो अपनी दंबगई दिखाकर आपकी बेटी को उठा ले जाऊं . यह पूरा गांव चूं तक नहीं बोलेगा . थाना, पुलिस, नेता और अखबार सब मेरी मुठ्टी में है . पर मैं आप सबके आशीर्वाद से बाप बनना चाहता हूं . मेरे घर का दीया आप जलाएंगी या बुझाएंगी आपकी म…’’ बोलते  – बोलते विक्रम सिंह की आंखें भींग गईं .

‘‘मैं मुंबई का वकील हूं . लाख रूपये मेरी फीस है, लेकिन आज आपके सामने एक याचक, एक भिखारी बन कर खड़ा हूं .’’

उनका दर्द सुनकर लाजवंती भींग गई. बोली, ‘‘चटोरी का कुछ गलत नहीं होना चाहिए .’’

‘‘भौजी, मैं वचन देता हूं . बच्चा होने के बाद इसे यहां सुरक्षित पहुंचा दूंगा . शामकी ट्रेन से जाना है . इसका सामान बांध दीजिए . अच्छा, इसका नाम चंदा है न ?’’  छोटकू साहेब ने चटोरी को देखते हुए पूछा .

‘‘अरे चाचा साहेब, दीदिया बहुत चटोरी है . टीन के डब्बा वाला अठनिया आइसक्रिम पहिले ई एतना चूस – चूस कर खाती थी कि इसका नाम चटोरी पड़ गया है .’’ सुगिया ने कहा तो गंभीर माहौल ठहाकों से गूंज गया .

गांव वालों को बता दिया गया कि चटोरी छोटकी मलकिनी को समहारने गई है .

 

मुंबई के ऊंचे – ऊंचे बिल्डिंग, बड़ी – बड़ी दुकानें, बाजार, चिकनी सड़कें और लोगों की बेहिसाब भीड़ आदि देखकर चटोरी की आंखें चुंधियां गईं .

चाचा साहेब का स्वर्ग जैसा घर देख वह खुशी के मारे झूम गई . गांव में उनके यहां हर सरस्वती पूजा में वीडियो पर फिलीम दिखाया जाता था . पूरे गांव वाले देखते थे . फिलीम में जैसे सुंदर फूलों से सजा बाग बगीचा, झाड़ फानूस, दुआरी पर एगो उजरा झबरा कुत्ता, आ बड़का  – बड़का दरवाजा – खिड़की वाला घर दिखाया जाता था, एकदम ओइसे ही महल था . टाईलस लगा फर्श एतना चिकन आ साफ था कि उसे लगा वह पानी पर चल रही है .

डॉक्टर ने चटोरी की सारी जांचें कीं . और फिर चाचा – चाची के लैब में तैयार हुए भ्रूण को एक महीन सी ट्यूब के जरिए उसकी कोख में प्रत्यारोपित कर दिया गया  . पहले उसे बड़ा अजीब लगा . लग रहा था पेट में कुछ अटक गया है .

चाचा  – चाची उसे पलंग पर से उतरने नहीं देते थे . काजू, किशमिश, मिठाई,दूध और फल आदि उसे इतना खिलाया जाता था कि वह दंग थी . उसने यह सब चीजें खाने के लिए सपने में भी नहीं सोचा था .

गांव में तो बस नून डाला गिला भात, पानीदार तरकारी और मोटी – मोटी रोटी खाती थी, लेकिन यहां का खाना कितना स्वादिष्ट और लजीज लगता .

‘साला ई काम त बड़ा अच्छा है . दिन भर पड़े – पड़े खाओ और पलंग तूड़ो .’ चटोरी मन ही मन खुश होती .

चाचा साहेब की चमकदार कार में बैठ वह डाक्टर के पास जाती . वह अपने घर के लैंड लाइन पर फोन लगाते और चटोरी माई, बाबा और बहनों से हंस – हंस कर खूब बतियाती,  ‘‘माई, हम बहुते मोटा गए हैं . यहां खूब अच्छा – अच्छा खाने को मिलता है .’’

नव माह होते ही उसकी डिलीवरी हुई और उसने एक लड़का और एक लड़की को जन्म दिया .

छोटकू साहेब लगा कि खुशी से पगला जाएंगे . उसी खुशी के झोंक में उन्होंने केसर के नाम वह घर लिख दिया जिसमें वह रहता था, साथ में एक बिघा खेत और दो लाख रूपये भी दे दिए .

केसर और लाजवंती को इतने धन मिलने की उम्मीद नहीं थी . बेटा भी होता तो उन्हें इतना धनवान नहीं बनाता जितना चटोरी ने बना दिया था .

चाची से दो बच्चे नहीं संभलते थे . छोटकू साहेब ने फोन करके केसर से चटोरी को कुछ और दिन रोकने के लिए कहा . वह मान गया .

चटोरी की छाती में इतना दूध उतरता कि दोनों बच्चे पी – पी कर निहाल हो जाते .

डेढ़ साल बाद वह अपने घर आई . उसे जींस और टॉप में देख सारे गांव वाले दांतों तले अंगुलियां दबा रहे थे . उसके बात करने का लहजा बदल गया था . पहले से ज्यादा सुंदर भी दिखाई दे रही थी . ब्यूटिशियन के द्वारा बनाए गए उसके सुंदर भौंहों को सारी लड़कियां छू – छू कर देख रही थीं . वह हंसती मुस्कराती रही .

अपने माटी के टूटहिया घर को उसने पहचाना ही नहीं . सिमेंट बालू का चार कमरों और बड़ा सा एक हॉल का अच्छा घर बन गया था . ऊपर छत भी थी . मूंडेर पर बैठ वह सड़क का नजारा देखेगी . बस, दुख था कि आंगन में लगा अमरूद्व का पेड़ कट गया था वहां डिनर टेबल लगी थी और दीवार में टी. वी. टंगा था .

किचन में कम्मो को गैस चूल्हा साफ करते देख उसे माटी का चूल्हा और घर में भरता हुआ धुंआ याद आ गए . माई – बाबा और तीनों बहनों ने अच्छे कपड़े पहने थे . बाबा खेती करते और माई ठाठ से घर में राज करती . उसे बहुत खुशी हुई कि चलो मेरे एक काम से मेरा घर परिवार आबाद तो हो गया .

रात में लाजवंती ने उससे धीरे से पूछा, ‘‘बिटिया, देह से तुम्हें कोई दिक्कत नहीं है न ?’’

‘‘ना माई , हम एकदम फीट हैं . चाचा – चाची हमको एतना भकोस के खिलाते थे कि का बताऊ .’’  कहकर चटोरी अपने कमरे में चली गई . ’’

लाजवंती उसे एकटक देखते सोचने लगी कि इसने दो – दो बच्चों को  जन्म दिया है फिर भी कहीं से शरीर ढ़ीला नहीं दिखता . ऊपर से और खूबसूरत लग रही है . गाल फुल गए हैं . एकदम चिकना गई है . इसी के जन्म के बाद हम केतना महीना कमजोर थे . सूख कर खटाई हो गई थी . छाती में दूध नहीं उतरता था . उपरिया दूध खरीदना बूते के बाहर था एहिसे इसे सतुआ घोर – घोर के पिलाती थी . इहे है गरीब और अमीर के खाने का प्रभाव!

सुगिया के मन में एक बार आया कि वह भी दीदिया वाला काम करे का? उसे भी खूब पइसा मिलेगा और वह भी उतना सुंदर दिखेगी .

लेकिन दूसरे मन ने उसे झटक दिया,  ‘दीदिया अगर शादीबाद माई बनती तो पूरे गांव में मिठाई बांटी जाती, लेकिन वह तो एक सरोगेट मदर बनी थी, जो गांव वालों की समझ से परे था . वह तो यही कहेंगे कि चटोरी नाजायज बच्चों की माई बनी है ! अगर यह काम गलत नहीं होता तो पूरे गांव और सारे रिश्तेदारों से क्यों छुपाया गया है?’

एक दिन चाची आई थी . चटोरी के बारे में पूछ रही थी . सुगिया के मुंह से निकल गया था कि दीदिया के जुड़वां बच्चे बड़े सुंदर….’

‘कवन दीदिया….’  चाची एकदम पीढ़ी छोड़कर उठ गई थी, ‘चटोरिया के बच्चा….’

‘अरे ना बहुरिया, एकरा कहने का मतलब है कि मलकिनी से दू – दू गो बच्चा नहीं समहरता है तो दिन – रात चटोरी उनको गोद में टांगे रहती है, इसलिए कोई भी कह देगा कि उसका बच्चा है .’ लाजवंती ने एकदम सच का परदा टांग दिया था .

यह बात मान चाची तो चली गई मगर लाजवंती गुस्से में सुगिया की दोनों चोटियां को बुरी तरह से मरोड़ दिया . वह दर्द से छटपटा गई . लेकिन वह तो एकदम अगिया बैताल हुई थी,  ‘तू अपनी ही दीदिया के इज्जत पर बट्टा लगा रही है रे ,मुअनी . आज के बाद ऐसा बोली त तोरा जबान राख लगा के खींच देंगे .’

‘‘तब रे सुगिया,  तू हमरा बिना यहां खूब असर – पसर के रही न .’’ पहले की तरह ही चटोरी ने प्यार से उसका माथा ठोंकते हुए पूछा .

‘‘हं दीदिया, मजे में थी . दीदिया, हम समझे थे कि तू यहां की गवंई भाषा भूल गई है क्योंकि दोपहर में तू मुहल्ले वालों के सामने कुछु ज्यादा ही गिटिर – पिटिर में एकदम शहर वालों की तरह बतिया रही थी .’’ सुगिया ने हंसते हुए कहा .

‘‘अरे, यार, मैं मुंबई से घुम कर आई हूं तो कुछ प्रभाव सब पर डालना जरूरी था न . वैसे भी मेरी गवई भाषा मेरी माई भाषा है इसी से तो मेरी पहचान है .

“अच्छा, ई बात छोड़ . जो मजा वहां है वह यहां कहां . हम तो कहते हैं अगर चाचा साहेब जैसा कोई आदमी सरोगेट मदर के लिए आए तो तू इस बार यह काम करना .  खूब अच्छा – अच्छा खाने को मिलता है ऊपर से ढेर पैसा भी!’’

‘‘नाही दीदिया, हम ई काम नहीं करेंगे.  हां, यह ठीक है कि तेरे कारण ही हमारी हालत सुधरी है. पर हम शादी के बाद माई बनेंगे . जब किसी से यह बात छुपाई नहीं जाएगी .

उस बच्चे की छठी बरही होगी . बबुआ – बुचिया को हम गोदी में लेकर दाल, भात, पूड़ी, खीर, पापड़, दनउरी और दो तरह की तरकारी खाएंगे और वहीं खाना पूरा गांव खाएगा . जैसे कमेसर भौजी का हुआ था .’’

‘‘तू अभी से ही मेहरारू जैसे बतियाने लगी .’’ कहते हुए चटोरी ने अपने शरीर से चिपकी टॉप को थोड़ा ढीला किया . लगा कि छाती थोड़ी भींगी है .

‘‘दीदिया, तेरा दूध अभी आता है का ?’’

‘‘वो…वो…’’ चटोरी हकला गई . फिर शांत होकर बोली, ‘‘अरे, नहीं रे, कभी – कभी ऐसा हो जाता है . डाक्टर दवाई दिया है .’’

‘‘दीदिया, ई दूध बड़ा कीमती होता है . ज्यादा दवाई मत खाना नहीं तो दूध सूख जाएगा . फिर अपने बच्चे में दिक्कत होगी . अच्छा दीदिया, तेरे पेट में दू – दू गो बच्चा था दोनों खूब लात मारता होगा .’’ सुगिया जानने के लिए बहुत बेचैन थी .

‘‘पता नहीं . हमने ध्यान नहीं दिया था .’’ पानी पीते हुए चटोरी ने लापरवाही से कहा .

‘‘अइसे कइसे दीदिया ? माई बनने का अनुभव बड़ा मीठा होता है . कमेसर भौजी बताती थी कि उनका बच्चा गिलहरी की तरह पेट के अंदर खूब दांए – बांए भागता था . जब जोर – जोर से लात मारता तो उनका रोआं – रोआं खिल उठता था . चेहरा मुसकुराने लगता था . वह हमेशा पेट पर हाथ रख बच्चे को सहलाती उससे खूब बतियाती . केवल भात – दाल खाने से ही भौजी का चेहरा बड़ा चमकता था . ई सब एहसास तुमको नहीं हुआ ?’’

‘‘ना . छोड़, यह बात . चल सोने .’’ चटोरी एकदम लापरवाही से उठ कपड़े बदल सो गई .

सुगिया आंख फांड़े उसे देखती रही, ‘दीदिया के मन में उन बच्चों के लिए तनिको मोह नहीं है.’ सोचते हुए वह सो गई .

एक साल होते – होते में मामा चटोरी के लिए एक रिश्ता लेकर आ गए . लाजवंती चाहती थी कि वह शरीर से कुछ और मजबूत हो जाए लेकिन मामा ने नहीं सुना, क्योंकि छोटकू साहेब के दिए हुए रूपये धीरे – धीरे खत्म हो रहे थे . साथ ही केसर को दारू पीने की लत लग गई थी . मामा समझदार थे और खरमास बाद चटोरी को लड़के वालों से दिखाने का फैसला सुना दिया . उसके पहले चटोरी की खास सहेली की शादी हो गई थी . शादी की छेड़छाड़ और सहेली को उसके पति के साथ देख उसका भी मन गुदगुदाने लगा था . खुद को दुल्हन बनने का सपना उसकी आंखों में भी तैरने लगे .

अचानक एक दिन छोटकू साहेब का फोन आ गया, चटोरी को उनके पास भेजने के लिए . उनके एक बिजनेस मैन एन. आर. आई. दोस्त थे . उनको सरोगेट मदर की तलाश थी . वह चटोरी से यह काम करवाना चाहते थे . छोटकू साहेब से दस गुना ज्यादा रूपये और गिफ्ट देने वाले थे .

चटोरी की शादी की बात सब भूल गए और योजना बनाने लगे कि आने वाले रूपये को कहां – कहां खर्च करेंगे .

वह जाने की तैयारी करने लगी .

‘‘दीदिया, तुझे अपना घर नहीं बसाना है?’’ सुगिया का मन दुख से भरा था .

‘‘सुगिया,  इस बात से माई – बाबा केतना खुश हैं . कम से कम इस काम से तुम लोग अच्छे से रहती और पेट भर खाती हो . दोनों छुटकी स्कूल जाती है और तू कालेज जाती है .’’ चटोरी ने उसका हाथ पकड़ समझाया .

‘‘बाबाखेती में अच्छा कमा ही रहे हैं, फिर? दीदिया, आखिर इस पड़ाव का ठहराव कहां है ? पैसा बनाने के चक्कर में अपने देह को इस तरह बरबाद करना क्या ठीक है ? मेरे सिर पर हाथ रख कर कसम खाओ कि तुझे शादी करने का मन नहीं है ?’’ सुगिया ने चटोरी का हाथ अपने सिर पर रख दिया, ‘‘सच बताना उस लड़के वाले के सामने जाने के लिए तुने सुंदर डिजाइन डलवाकर ब्लाउज नहीं सिलवाया है?’’

चटोरी का कलेजा अंदर तक भींग गया . आंखें छलछला गईं . मगर उसने आंसू निकलने नहीं दिया .

उसका हाथ नीचे कर खुशी – खुशी बोली, ‘‘भाक पागल, तू तो पूरा पागल है . कालेज जाने से बड़ी – बड़ी बातें बनाना सीख गई है . बाबा से कह देती हूं, वहां तेरी ही शादी कर देंगे .’’

और वह दुबारा चली गई .

जिस दिन सुगिया की शादी थी उस दिन पता नहीं क्यों चटोरी का मन नहीं लग रहा था . बार – बार उसकी आंखें बरस पड़तीं,  ‘सुगिया, मेरे एक बार सरोगेट मदर बनने से बाबा की महत्वकांक्षा बढ़ गई थी . वह और रूपये आने के इंतजार में थे .

शायद घर में किसी को पता नहीं है बाबा खुद चाचा साहेब के पास फोन करके बोले थे कि अगर वैसा काम कोई दुबारा करवाने आए तो उसे याद करेंगे . हमारे मोबाइल में ऐसा फंशन है कि जो भी बात की जाती है सब रिकार्ड हो जाता है . हम शादी करने के लिए पूरी तरह से तैयार और फीट थे लेकिन वह रिकार्ड सुनकर हमारे सारे सपने गंगा जी में बह गए .

तू कह रही थी कि माई बनना सुखद होता है जो लड़की शादी के बाद बनती हैं . तू ठीक कह रही थी . हमने जान बूझ कर चाचा साहेब के बच्चे से मोह नहीं रखा था . हमें पता था कि जिस बच्चे को हम जन्म देंगे ऊ कभी हमको माई नहीं कहेगा .

यहां आकर चाचा साहेब हमसे एगो सरकारी कागज पर दस्तखत करवाए थे कि उस बच्चे पर हमारा कभी अधिकार नहीं होगा .

उन्होंने पैसा दिया और हमने अपनी कोख में रखा हुआ उनका जीता जागता बच्चा दिया . जैसे दुकानदार पैसा लेकर सामान देता है .

सच कह रही हूं, दवाई खाने के बाद भी मेरी छाती में दूध आ जाते थे . उस दूध में इतना उफान रहता था कि मेरा मन एक दम बेचैन हो जाता . चाहती थी दोनों बच्चों को अपनी छाती से लगा अमृत से नहला दूं . पर चाहकर भी कुछ नहीं कर पाती थी .’  चटोरी सिर को दीवार से टिका कुछ देर के लिए खामोश हो गई . लेकिन आंखें एक धार से बहे जा रही थीं . ए.सी. की ठंडी हवा में भी लगा कि दम घुट रहा है . उसने पलंग पर से उतर कांच की खिड़की खोल दी .

ठंडी हवा का एक झोंका उसके तन को छू गया . आसमान में तारे टिमटिमा रहे थे . साइरन बजाती एंबुलेस की आवाज और उसकी जलती लाल बत्ती को देख उसने चौथी मंजिल से नीचे देखा .

सड़क उस पार प्रेग्नेंट मिसेज कुलकर्णी को स्टेचर पर लाद गाड़ी के अंदर ले जाया जा रहा था . उनके साथ सास थी . दूसरी गाड़ी पर पूरा परिवार था . दूर जाती हुई एंबुलेस की आवाज उसके कानों से टकराती रही .

फिर उसके मन की गांठ खुलने लगी,  ‘जानती है सुगिया, जुड़वां बच्चे के कारण मेरा भी पेट बहुत बड़ा हो गया था. उस समय मैं भी मिसेज कुलकर्णी की तरह स्टेचर पर लाद कर हॉस्पिटल पहुंची थी . मुझसे जरा भी चला नहीं जाता था .

मेरे दोनों बच्चे … ना ना… चाचा साहेब के बच्चे हमें इतने लात मारते थे कि उस लात खाने में एक अनोखा ही सुख था .एक अलग ही खुशी मिलती थी .

एक दिन ऐसे ही वह दोनों मेरे पेट के अंदर खूब फुर्र – फुर्र फुदक रहे थे . दाएं – बाएं धमा चौकड़ी मचाए थे . एक बारगी हम भूल गए कि यह मेरे बच्चे नहीं हैं . भूल से और माई बनने के सुखद अहसास से हम एतना रोमांचित और खुश थे कि भावातिरेक में बड़े से पलंग पर लेटे अपना पेट सहलाते उस बच्चे से हम खूब बतियाने लगे,  बबुआ, बुचिया,  आपको पता है हम आपकी माई हैं, ना ना ममी हैं . हमे ममी कहोगे न? हम तुम्हारा नाम गोपाल जी रखेंगे . वहीं जो माखन चोरा के खाते थे . अगर लड़की होगी न तो उसका नाम दुरगा जी रखूंगी . ठीक न मेरे, बबुआ, बुचिया !

‘चटोरी…’ . चाची एकदम जोर से चिल्ला पडी . उन्होंने सारी बातें सुन ली थी . मुझे खूब डांटा,  ‘हम अपने बच्चे को  सिर्फ तेरी कोख में रखने के लिए ही इतने सारे रूपये खर्च कर रहे हैं और तू इसे अपना बच्चा बनाने पर तुली है . भूल गई कि तू हमारे घर की नौकरानी है . आज से इस बच्चे से जरा भी मोह – ममता मत  रखना,  नहीं तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा . हम अपने बच्चे को हेल्दी रखने के लिए ही तुझे फल मेवा खिलाते हैं और कुछ नहीं . तू मुझे बच्चा देगी और मैं तुम्हें रूपये ! बस इतना ही नाता है हमारा और तुम्हारा . आगे से सचेत रहना . ’

उस दिन हम खूब रोये थे खूब!  सारे एहसास सारी ममता को हमने मार दिया, इसलिए लापरवाह रही बेपरवाह रही .

उन छः माह के बच्चे को छोड़ जब हम ट्रेन में चढ़े थे, तो लगा कि मेरे दोनों हाथ कट गए या दोनों आंखें अंधी हो गईं . आत्मा छिन – भिन हो गई . सारे रास्ते हम खून के आंसू रोए थे.’ मन ही मन बतियाते उन बच्चों को याद करते चटोरी की आंखें भींग गईं .

दीवार घड़ी ने चार बार घंटी बजाई . आसमान के चांद – तारे अपनी ड्यूटी पूरी कर घर जाने की तैयारी में थे . चिड़ियों का चहचहाना शुरू हो गया था . दिन की धूल और धुएं से भरी गर्म हवा ठंडी और सुगंधित बह रही थी .

ठंड से चटोरी को सिरहन होने लगी . वह खुद में ही सिमट बोल पड़ी,  ‘भोर हो गई!  सुगिया, तेरा अभी सिंदूर दान हो रहा होगा . दूल्हे मियां अपने घर से लाए सिंधोरा में से पीले सिंदूर से तेरी मांग बहोर रहे होंगे .तू खुश रह…’ रोकते – रोकते में उसकी हिचकी बंधी रूलाई बांध तोड़ कर फूट पड़ी .

पलंग पर बैठ वह बहुत देर तक रोती रही,  ‘सरोगेट मदर बनने का मेरा यह बिजनेस बन गया है, सुगिया . अभी ढाई महीना का बच्चा मेरे पेट में है और अभी से ही डाक्टर ने दूसरे आदमी से सेंटिग कर मुझे तीसरी बार सरोगेट मदर बनने के लिए बुक कर लिया है .और यह बात बाबा को पता है . वह एकदम खुल कर कह दिए हैं कि हम यह काम मन लगा कर करे . माई को भी अब अच्छे – अच्छे गहने – कपड़े पहनने में अच्छा लग ही रहा है .

दुबारा सरोगेट मदर बनने का जब हमें बुलावा आया था तब तो उसने एक बार भी मेरी राय नहीं पूछी . पहले की तरह हो हल्ला नहीं किया .  बस, यही कहा – रास्ते के लिए ठेकुआ निमकी बना देती हूं . इस बात से मुझे कितना दुख हुआ था तुझे क्या बताऊं ? माई मुझे इस बार रोक नहीं सकती थी ? मेरी शादी का हवाला देकर बाबा को समझा नहीं सकती थी? सुगिया, तू मान चाहे मत मान लेकिन बाबा के मन में कम्मो और बुचिया को मेरी तरह बनाने की खिचड़ी पक रही है. तू शुरू से ही पढ़ाई, नौकरी और शादी के फेर में रही थी, इसलिए वह तुझ पर हाथ नहीं आजमाए .

कम्मो और बुचिया की बात जिस दिन सच हो गई, ब्रह्नम बाबा की कसम ! उस दिन हम माई – बाबा से एतना लड़ेंगे कि वह कभी सोचे नहीं होंगे . हमारे अरमान आंसू में बिखर गए हैं, पर अपनी दोनों छोटकी बहन को अपने जैसा नहीं बनने दूंगी .

सच में सुगिया, इस पड़ाव का पता नहीं कहां ठहराव है ? नाही कोई ठिकाना है !

अच्छा छोड़, अब तू खोइंछा बदलवाने जनमासा में गई होगी . चल बहन, तू आबाद रह!

पांच बज गए अब तेरी विदाई होगी , अच्छा ठीक . अरे, मेरी लड़ाकू बहन सुगिया, तू ससुराल जाने के लिए इतनी  उतावली हो गई है कि मुझ दीदिया से अकंवारी भेंट भी नहीं करेगी क्या ?’ चटोरी ने दोनों हाथ फैला अपने सीने से समेटा जैसे महसूस हुआ सुगिया उसके गले लग बिलख रही हो . उसके भी आंसू गंगा की तरह बहने लगे .

 

नोट : इस  बहुचर्चित कहानी को कमलेश्वर स्मृति कथाबिम्ब पुरस्कार 2018, ( मुंबई ) से उत्तम कहानी का पुरस्कार प्राप्त है . 

2 thoughts on “नाही है कोई ठिकाना”
  1. नीतू सुदीप्ति नित्या की कहानी मार्मिक एवं हृदयस्पर्शी l बोलचाल की भाषा में लिखी गई है यह कहानी, अपनी पूरी जीवंतता के साथ प्रस्तुत है l इस कहानी को पुस्तक पुरस्कृत हो जाना महज संयोग नहीं l समाज परिवार में एक सकारात्मक संदेश देने वाली है यह कहानी, कई मापदंडों पर खरी उतरती है l
    नीतू जी को भविष्य के लिए हमारी हार्दिक
    शुभकामनाएं l
    सिद्धेश्वर

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