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– अम्बालिका ‘फूल

एक क्लाइंट से मिलकर मधु घर लौटी ही थी कि डाइनिंग हॉल में पापा टीवी देखते मिले | मधु भी वही सोफे पर धंस गई| थोड़ा रिलैक्स होने के बाद वो उठी ही थी कि उसके कानों में न्यूज़ के हेडलाइंस आए – ‘जानी मानी वकील मीरा देसाई ने अपने चाचा पर यौन शोषण का आरोप लगाया|’ मधु चौंक गई| ‘मीरा? ओ माई गॉड’ उसने मन ही मन बुदबुदाया| उसने पापा से टीवी का रिमोट लेकर रोकेट की तेज़ी से सारे लोकल चैनल छान मारे| ओह मीरा! उसने एक आह भरी और नहाने चली गई|

हाथ में चाय की कप लिए मधु अपने टेबल पर कंप्यूटर के सामने बैठ गई| उसे क्लाइंट के लिए रिपोर्ट लिखनी थी | पर उसका दिमाग जैसे कहीं अटक गया हो| आह! आखिर मीरा ने ये क्या कर लिया| नहीं, मुझे उससे बात करनी होगी| कहीं जोश में आकर वह कानून से पंगा न ले ले| उसके अंदर की ज्वालामुखी उसे भला बुरा सोचने का मौका नहीं देगी| वह है भी तो अपने जूनून की पक्की| यह सोचकर उसने मीरा का नम्बर मिलाया पर दूसरी तरफ से कोई रेस्पोंस नहीं मिला| मधु ने चाय की शिप ली और अपने काम पर ध्यान देना चाहा| लेकिन उसे कॉलेज के इनओगुरेशन का दिन याद आ गया जब उसने पहली बार मीरा को देखा था| साधारण कपड़ों में एक सांवली सी छरहरी लड़की मंच पर अपना इंट्रोडक्शन देने आयी और बहुत ही कम शब्दों में सबको बता गई कि वह एक निम्न मध्यम परिवार से है| गाँव छोडकर सिटी आने का उसका एकमात्र उद्देश्य शिक्षा है| उसके उस छोटे से परिचय ने प्रिंसिपल को भी प्रभावित किया था|

मधु यादों के भंवर में पीछे चली गई| आज भी उसे वह दिन याद है जब उसने मीरा से दोस्ती की थी| यूनिवर्सिटी में लॉन के बीचों बीच लगे पेड़ के चबूतरे पर बैठकर मीरा नोट्स बनाने में मग्न थी। उसके दोस्त कम थे या शायद उसने ही अपनी दोस्ती का दायरा समेट कर रखा था। फर्स्ट ईयर लॉ की स्टूडेंट थी। कॉलेज के पहले दिन से ही खुद को दूसरों से दूर रखती थी। मैंने उसे न ही कभी कैंटीन में बैठकर चाय समोसे खाते देखा न ही किसी झुंड में शामिल होकर हुड़दंग मचाते। इन्हीं कुछ जुदा हरकतों ने मुझे उसकी ओर खींचा। उस दिन मैंने फैसला कर ही लिया कि उससे दोस्ती कर के रहूंगी।

मैं चुपके से जाकर चबूतरे पर उसके पास बैठ गयी, ‘क्या लिख रही हो?’

वो सकपकाई, ‘ओह तुम! कुछ नहीं, बोलो।’

‘मेरा नाम जानती हो ?’ मैंने पूछा।

‘हाँ, जानती हूँ।’

‘मैं तुमसे दोस्ती करना चाहती हूँ।’

वो मुस्काई, ‘तुम तो दोस्त ही हो, साथ पढ़ने वाले सभी दोस्त ही है।’

मैं हंसी, ‘हाँ! पर, मैं तुमसे चिपके रहने वाली दोस्ती करना चाहती हूँ।’

वह खिलखिला उठी, ‘मैंने आज तक ऐसी दोस्ती नहीं की है मधु, इसलिए मुझसे इसकी उम्मीद मत करो।’

‘नहीं की है तो अब कर लो। और मैं उम्मीद के लिए नहीं आयी हूँ मोहतरमा ! मैं बड़ी जिद्दी हूँ।’

उसने उत्तर नहीं दिया।

‘ओके। तो अब से मीरा और मधु एकसाथ रहेंगे।‘

‘देख, लो मुझसे न निभे तो कहना मत।‘

उसने धीमे से कहा।

‘अच्छा, चलो दोस्ती के नाम चाय पीते हैं।’

‘मैं नहीं पीती।‘ उसका उदास सा जवाब मिला।

‘ठीक है, जूस पीना।’

‘नहीं, वो भी नहीं।’

‘अच्छा तो पानी? या उसके बिना रहती हो!’ उसके चेहरे पर हंसी की रेखा उभर आयी|

‘अब चलो भी।’ मैं उसे खींचते हुए कैंटीन ले गयी।

फोन के रिंग से मधु का ध्यान टूटा|

  • ‘हलो, मीरा ! यह क्या किया तूने?’
  • ‘क्यों क्या हुआ?’
  • ‘तू नहीं जानती है झूठा आरोप लगाने पर तू फंस सकती है और तेरा कैरियर बर्बाद हो सकता है|’
  • ‘और तू भी तो जानती ही है इसी दिन के लिए मैंने कानून से खेलने का काम सिखा है|’
  • ‘हाँ, मैं समझती हूँ| लेकिन अपना सब कुछ दांव पर लगा कर …’ आगे मैं कुछ नहीं बोल पायी|
  • ‘छोड़ इतना नहीं सोचते, इस वीकेंड मिलते हैं फिर जो दिल चाहे बोल लेना|’
  • ‘ठीक है|’

फोन रख कर मैं मीरा की हिम्मत का हिसाब लगाने लगी| गाँव में पली बढ़ी मीरा का जिगर हिम्मत से भरा था शायद इसलिए क्योंकि वह कभी सच से नहीं घबराती थी| सच जैसा भी होता उसे स्वीकार करने की क्षमता थी उसमें| वो या तो सीधा सपाट बात करती या तो न करती। उसे बातों को घुमाना नहीं आता। किसी दिन कॉलेज में नैना ने उसे कुछ कह दिया। मीरा ने बड़े ही शांति से उसे कहा कि वह जिस लड़के के साथ घूमती है वह लड़का मीरा के पीजी के चक्कर काटता है। ऐसे सपाट जवाब पे सबके मुँह बंद हो जाते थे। थर्ड इयर में एनुअल डे के दिन मैंने मजाक करने के ख्याल से मीरा से सवाल किया था कि उसका कोई बॉयफ्रेंड क्यों नहीं है| तो उसने कहा था, बॉय कभी फ्रेंड नहीं होते वो एनिमी होते हैं। उसी दिन मैं समझ गई थी कि इस लड़की ने अपने अंदर कुछ भयानक दबा रखा है|

मैं अक्सर मीरा के साथ होती। मेरे साथ रहकर भी मीरा नहीं बदली। वो कैंटीन नहीं जाती और किसी तरह की भीड़भाड़ में शामिल नहीं होती लेकिन फिर भी मुझे उसकी जमीनी बातें और तरह तरह के चीजों की जानकारी लुभाती थीं। बातें ज्यादा मैं ही किया करती और मीरा कभी कभार गलत सही का ब्यौरा दे देती थी। मीरा पेइंग गेस्ट में रहती थी। वो छोटे शहर से आई थी और उसके घर में माँ और दो भाई बहन थे । माँ सिलाई का काम करती थी| पिताजी को किसी बीमारी ने लील लिया था। भाई बहन पढ़ते। जमीन का एक छोटा टुकड़ा था जिसे चाचा ने देखभाल के नाम पर हड़प लिया था, जिससे थोड़ा बहुत खर्च माँ को देते थे। उसकी पढ़ाई का खर्च वो खुद ट्यूशन और स्कोलरशिप से निकाल लेती। उच्च शिक्षा की इच्छा उसकी माँ की नहीं थी लेकिन उसने जिद कर आगे की पढ़ाई की। न जाने उसके मन में क्या था जिसे वो दबाए जाती। ऐसा लगता जिस दिन वो ज्वालामुखी फट गई किसी का तो सर्वनाश होकर रहेगा।

फाइनल ईयर के एग्जाम के बाद वो घर जाने के बदले वही किसी ट्रस्ट में इंटरशिप करने लगी। इस दरम्यां रिजल्ट भी आ गए। मीरा ने बार आयोग में पंजिकरण भी करवा लिया और मीरा को डिस्ट्रिक कोर्ट में नौकरी भी मिल गयी। कॉलेज के अंतिम दिनों में मीरा मुझसे खुलकर बात करने लगी थी और इंटरशिप के दौरान मुझे उस हादसे की जानकारी मिली जिसने मीरा को कठोर बना दिया था। जल्द ही मीरा एक अच्छी वकील बन गयी| उसने शहर में अपना घर ले लिया और गाँव से अपने परिवार को ले आयी। उसने गाँव में

अपनी जमीन भी वापस ले ली लेकिन अब भी उससे बात करते हुए मुझे उसके अंदर की आग बुझी नहीं दिखती थी। मुझे याद था कि मीरा ने कहा था उसने जमीन वापस लेने के लिए लॉ पढ़ी है लेकिन अपने अस्मिता को दांव पर लगा कर अपनी माँ के साथ हुए अत्याचार का बदला लेगी यह उसने उजागर नहीं किया था।

तभी खाने पर बुला रही माँ की आवाज ने मधु को उठने पर मजबूर किया| खाना भी उसने बेमन से खाया| उसे मीरा की चिंता सता रही थी| वह नहीं चाहती थी कि एक होनहार लड़की का कैरियर और भविष्य बर्बाद हो| रविवार को मीरा से मिलने की योजना बनाते हुए मधु सोने चली गई|

आज सुबह से ही मधु बेचैन थी| वह मीरा से मिलने उसके घर जा रही थी लेकिन उसे यह चिंता सता रही थी कि वह उस धुन की पक्की लड़की को कैसे समझाएगी या समझा भी पायेगी या नहीं| डोर बेल बजते ही मीरा की मां ने दरवाजा खोला|

‘नमस्ते आंटी|’

‘खुश रहो बेटा, बैठो मीरा आ रही है| मैं चाय बनाती हूँ|’ आंटी किचन में चली गई|

मैं ड्राइंग रूम में बैठ गई|

‘और मेरी तकलीफ पर ही मैडम को वक्त मिलता है|’ मीरा की ठोस आवाज कानों में आयी|

‘ओह मीरु, तू भी न! छोड़ सब कुछ यह बता क्या है ये सब? तू क्या नहीं जानती, क्या हो सकता है तेरे इस फैसले से|’

‘अच्छा, चल मेरे कमरे में| माँ, चाय मेरे कमरे में भिजवा देना|’ माँ को आवाज लगाती मीरा मधु को अपने कमरे में ले गई|

‘देख मधु, मैं जानती हूँ मैंने कानून को छेड़ा है| पर, तू बता इस उम्र में माँ पर क्या गुजरेगी?’

‘यही तो मैं तुझसे पूछना चाहती हूँ, तूने कभी सोचा है यदि तुझ पर कोई कारवाही हो जाए तो माँ का क्या होगा?’

‘अरे, तू बहुत घबराती है| कुछ नहीं होगा मुझे| आखिर इतने दिन मैंने इस लाइन में ऐसे ही झक नहीं मारा है| सही को गलत और गलत को सही करने के सारे पैंतरे आ गये हैं तेरे इस दोस्त को|’

‘अच्छा! यही वह मीरा है जिसकी सच्चाई और सादगी ने मुझे दोस्ती करने पर मजबूर किया था|’

माँ चाय ले आयी|

‘अरे, तुम क्यों आ गई माँ, मोहन को भेज देती|’ मीरा ने माँ से कहा|

उसकी बात का जवाब न देते हुए श्रीमती देसाई मधु से बोली, ‘बेटी, मैं नहीं जानती यह लड़की क्या करना चाहती है| मुझे कानून और न्याय से भी कोई वास्ता नहीं है| मुझे तो बस इसकी सलामती की फ़िक्र है| अब क्या जरूरत है गड़े मुर्दे उखाड़ने की| तुम ही समझाओ इसे|’

‘पर माँ, उसे उसके किये की सज़ा तो मिलनी चाहिए|’ मीरा ने उबलते हुए कहा| वही ज्वालामुखी जिसे मैं महसूस करती आयी हूँ उसकी आँखों से उफन रही थी| ‘आंटी, आप आराम कीजिये मैं इसे समझाती हूँ|’

मीरा गुस्से से आग हुई जा रही थी|

‘तो फिर आगे क्या सोचा है तूने?’ मैंने मीरा से पूछा|

‘सोचना क्या है| कस्टडी में लिया गया है उस बास्टर्ड को| अब कोर्ट में देखूंगी उसे| अब इस मामले में मुझे बात नहीं करनी मधु| मेरी जिंदगी का मकसद उसे सज़ा दिलाना है चाहे मैं बर्बाद ही क्यूँ न हो जाऊ|’

मैं समझ गई इसे बहकाना मुर्खता है| ‘ठीक है, मेरी जरूरत हो तो बताना| तू जो भी करेगी मैं तेरे साथ ही खड़ी हूँ|’

‘जानती हूँ मधु!’ कहते हुए वह मेरे गले से लग गई|

आज कोर्ट में मीरा के केस की सुनवाई थी| मैं निकल ही रही थी कि फोन की घंटी बजी|

‘हलो !’ मीरा की माँ की आवाज थी|

‘आंटी आप, बोलिए|’

‘बेटी, मुझे भी अपने साथ ले चलो|’

‘पर आंटी मीरा …’

‘उसे मैं समझा दूंगी|’

‘ठीक है आंटी, आप तैयार रहिये| मैं आपको पिक कर लूंगी|’

हम कोर्ट पहुंचे तो वहां लोकल न्यूज़ चैनल वाले भी मौजूद थे| कटघरे में मौजूद चाचा को देखकर आंटी घबरा गई| मैंने उनका हाथ अपने हाथ में ले लिया| अपने घर के हालात पर बातें करते हुए एक दिन मीरा ने बताया था कि पिताजी के जाने के बाद उसके चाचा ने उनकी जमीन हड़प ली और माँ का शोषण करते रहे। जिसे मीरा ने अपनी आंखों से देखा था और माँ को हर पल मरते देखा। मीरा के बालमन में वो पल एक सदमे की तरह समा गया था। यही एक वजह थी कि मीरा ने लॉ पढ़ी। अब वो चाचा को उसके किए की सबक देना चाहती थी।

मीरा के पास दलील कम थे और चाचा के वकील ने उन्हें बचाने का सारा इंतजाम किया हुआ था| जज फैसला सुनाने ही वाले थे कि आंटी खड़ी हो गई और उन्होंने कुछ कहने के लिए जज से अनुमति मांगी| मीरा ने मेरी ओर देखा| मैं भी अचम्भित थी|

कटघरे में खड़ी आंटी ने अपना बयान दिया कि उनके पति की मौत के बाद उनके देवर श्री किशोर देसाई ने उन्हें अपनी जमीन से बेदखल कर दिया था| बच्चे छोटे थे और उनके पास कोई सहारा नहीं था| श्री किशोर ने खर्चे देने के नाम पर अपने गलत इरादों को हवा दे दिया और उनका शारीरिक शोषण करना शुरू कर दिया| बच्चे और बिरादरी के कारण वो चुप रही| लेकिन आज वह कोर्ट के सामने इस बात की गवाह बन कर खड़ी है|

सारे मामले को समझते हुए जज साहब ने किशोर देसाई को हवालात की सज़ा सुनाई| मीरा पर जुर्माना लगाया और 6 महीने के लिए उसकी वकालत की डिग्री पर प्रतिबन्ध लगाई| लेकिन मीरा खुश थी| सबसे ज्यादा ताज्जुब इस बात का हुआ कि आंटी अपना बयान देते हुए जरा भी नहीं डरी| जबकि मुझे और मीरा को इसी बात का डर था कि आंटी ये सब नहीं झेल पाएंगी| लेकिन आज मुझे पता चला कि नारी सशक्त ही होती हैं उसे बनाना नहीं पड़ता| वह अगर चुप रहती है तो केवल किसी वजह से|

मीरा ने माँ को गले लगा लिया और मुझे बोली चलो चाय पीते हैं| उसकी आवाज में पूर सुकून था। मैं समझ गयी ज्वालामुखी फटकर शांत हो चुकी है।

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