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– नरेंद्र कौर छाबड़ा

 

इस वर्ष बड़ी भीषण गर्मी पड़ रही थी। दिन तो अंगारे से तपते रहते ही थे रातों में भी गर्मी और उमस से चैन नहीं मिलता था। सोचा इस लिजलिजे और घुटन भरे मौसम से राहत पाने के लिए कुछ दिन पहाड़ों पर बिता आते हैं।
अगले सप्ताह ही पर्वतीय स्थल की यात्रा पर निकल पड़े। दो-तीन दिनों में ही मन में सुकून सा महसूस होने लगा था ।वहां का प्राकृतिक सौंदर्य, भरे भरे पहाड़ ,गर्व से सीना ताने खड़े दीर्घता सिद्ध करते वृक्ष, पहाड़ों की नीरवता में हल्का सा शोर कर अपना अस्तित्व सिद्ध करते झरने मन बदलाव के लिए पर्याप्त थे।
उस दिन शाम के वक्त झील किनारे टहल रहे थे। एक भुट्टे वाला आया और बोला –” साब, भुट्टा लेंगे, गरम-गरम भूनकर मसाला लगा कर दूंगा “.।
सहज ही पूछ लिया–” कितने का है ?”
” पांच रुपए का ”
“क्या पांच रुपए में एक भुट्टा? हमारे शहर में तो दो रुपए में एक मिलता है, तुम तीन ले लो…”
“नहीं साब पांच से कम में तो नहीं मिलेगा”
” तो रहने दो….” हम आगे बढ़ गए।
तभी हमें सुनाई दिया भुट्टेवाला कह रहा था–” पहाड़ों पर घूमने का शौक तो रखेंगे, हजारों रुपए खर्च करेंगे, अच्छे होटलों में रुकेंगे पर दो रुपए के लिए झिक झिक करते हैं। कंगाल कहीं के…….”

 

नोट : यह लघुकथा महाराष्ट्र बोर्ड की दसवीं कक्षा के हिंदी पाठ्यक्रम में पिछले 4 साल से पढ़ाई जा रही है।

One thought on “कंगाल”

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