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रघुराज सिंह कर्मयोगी

 

गीत

 

छंद के बंध बेसुरे हों, सुर बिखर रहे गलियारों में।
धुआं धुआं पैबंध लगे, कुछ, टूट रहा परिवारों में।
पवन झरोका खाय देहरी, मां छोड़ी वृद्धाश्रम में।
सांसे’ रोती रही’ धरा पर, पिता पडे़ शीर्षासन में।

पद चिन्हों को हटा सुतों ने, बांट दिया दीवारों में।
किरचे’ किरचे’ कृतज्ञता, कुछ टूट रहा परिवारों में ।1

नेह कलश में नेह रिक्त, राखी के बंधन टूट गए।
जन्म दिवस, निर्धन भाई, पावन रिश्ते छूट गए।
केक न काटा साथ साथ, ताया ताई बुआ दादी।
बैठ कार में चले गए, होटल में नगदी बरसा दी।

स्वर्ग प्रयाण करे कोई,  चूल्हे न जलें परिवारों में।
परंपरा सब दरक गईं, कुछ टूट रहा परिवारों में। 2

रामू काका, बुधिया काकी, अब ये नाते दूर हुए।
त्याग, तपस्या और हबन, राम नाम सब दूर हुए।
भावी से जोरा जोरी, कंकड़ की गोटी नहीं रही।
शैशव कहीं खो गया, ढूंढू, गुइयां – गुइयां नहीं रही।

बड़ के नीचे कोल्हू चलते,गुड़ खाते अख़बारों में।
होली गीत रात भर गाते,कुछ टूट रहा परिवारों में। 3

मम्मी पापा करें नौकरी, वक्त नहीं है अपनों को।
दादा-दादी लगते भारी,धाय पालती बच्चों को।

आती धीरे-धीरे पीछे ,पोरों से पलक गुदगुदाती।
अब तो कार्यालय से आकर,सोफे में धंस जाती।

रीता पड़ा समर्पण तर्पण, स्वारथ भाव हजारों मेें।
मोह माया का चक्रव्यूह,कुछ टूट रहा परिवारों में। 4

 

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