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– सुशील कुमार ‘नवीन’

 

कविता 

 

हारीं तुम नहीं चन्द्रिके,
हारा वो हर शख्श है,
जिसने सदा तुम्हें टोका
बढ़ते कदमों को पीछे मोड़ा,
प्रगति पथ पर बन कर रोड़ा।

जमाना औरों के लिए सुखदायी था,
पर तुम्हारे लिए ये सदा खराब रहा,
हल्की सी हंसी भी, तीर ज्यों चुभी
सांस भी सोच समझकर लिया,क्योंकि,
भले घर का मेडल, तुम्हारे ही नाम रहा।

वक्त न कभी बुरा था, न कभी होगा,
वक्त को पार, सदा वक्त ने ही किया है,
कमी तुम में न थी, न कभी होगी
कमी सोच में थी, जो पहचान गए,
तभी तो आज दिल से सलाम किया है।

आसान नहीं, गिरि शिखर को पाना,
सहज नही, समुंद्र को पार जाना,
ये देश तुम्हारे आंसुओं से स्तब्ध है,
सौ दरवाजे पार कर, मिला ‘नवीन’ ये उपहार है,
जीत नहीं तो क्या हुआ, जीत से बढ़कर ये हार है।

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