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– डॉ. सच्चिदानंद प्रेमी

 

जब प्राणों में मलय पवन धुन-

छेड़े सौरभ गीत !

तब मेरे प्रिय निलय-कुंज में-

आना मेरे मीत !

जब गाँठ जोड़कर हिरना-हिरनी बन-उपवन में घूमे,

आंखों में पावस ऋतु छलके मन में मधुरितु झूमे;

मृग नयनों में मृग-नयनी की-

छाय अहरह प्रीत !

तब मेरे गीतों में आना मेरे बिछड़े मीत !

जब रात उनिन् अलस वधू के मुख का घूंघट सरके,

पावस की माबस में जग के पीर दामिनी दमके;

 बाट जोहती सजी रंगोली-

 माने अपनी जीत !

तब भावों में अंगड़ाई में आना मेरे मीत !

पहन जनेऊ वर इठलाए दुल्हन लाज लजाए,

अमराई के हरे टिकोरे होरी हिल-हिल गाए;

स्वर सरगम निज पंचम सुर में-

तान उठे मधुगीत !

तब मेरे अंगने में आना-आना मेरे मीत !

 

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