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  • नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’

   ‘‘आज हम दोनों का मैट्रिक का रिजल्ट आने वाला है, ’’ निम्मी ने कहा ।

  ‘‘हां, निम्मी, आज हमारा रिजल्ट आने वाला है, क्यों न आज मंदिर चला जाए?’’ सिम्मी बोली

  ‘‘हां, अच्छा विचार है, ’’ निम्मी ने कहा।

फिर दोनों मंदिर चली गईं । वहां से आने के बाद दोनों स्कूल गईं ।

  ‘‘वाह, आज तुम दोनों बड़ी खुश लग रही हो, क्यों?’’ रमा ने पूछा ।  ‘‘क्यों नहीं ? आज हमारा रिजल्ट आने वाला है ।’’ निम्मी बोली । तभी एक दूसरी लड़की उनके पास आई और बोली,‘‘मान गई तुम दोनों को । इस बार भी पूरे स्कूल में तुम दोनों अव्वल आई हो । ’’

  ‘‘यानी हम दोनों मैट्रिक के परीक्षा में पास हो गईं ?’’ निम्मी ने पूछा ।

दूसरी लड़की बोली,‘‘अरे, पास ही नहीं हुई, सबसे ज्यादा नंबर लाई हो ! तुम दोनों की दोस्ती की दाद देनी पड़ेगी । ऐसा कोई भी क्षेत्र नहीं, जिसमें तुम दोनों अव्वल न आई हो! चाहे पढ़ाई हो, खेल हो या कुछ और तुम दोनों ने अपनी दोस्ती की मिसाल कायम कर दी । भगवान न करे कि तुम्हारी दोस्ती को किसी की नजर लगे ।’’ कह कर वह चली गई ।

निम्मी, सिम्मी और रमा तीनों स्कूल के अंदर गईं । दूसरी तरफ से उनके टीचर आ रहे थे । तीनों ने उनको नमस्कार किया ।

 ‘‘सर, हम पास हो गई हैं ?’’ सिम्मी ने पूछा ।

‘‘हां, सिम्मी, तुम और निम्मी बहुत अच्छे नंबर लाई हो ! आगे पढोगी न ?’’

‘‘हां, सर, यह भी पूछने वाली बात है । हमने इसी स्कूल से अपना और आपका नाम रोशन किया है और आगे भी इसी कालेज में पढ़ कर आपका नाम रोशन करेंगी । अभी तो सभी क्षेत्रों में धमाका करना है। आखिर हमें अपनी दोस्ती की मिसाल जो कायम करनी है।’’

  रमा वहीं खड़ी थी। यह सब सुनकर वह जल रही थी। वह उनकी दोस्ती से बहुत जला करती थी। उसके मन में एक बात आने लगी कि अब इनकी दोस्ती को दुश्मनी में बदलना ही पड़ेगा। ये बहुत अपनी दोस्ती की मिसाल कायम कर रही हैं। अब इनको अलग करना ही पड़ेगा।

निम्मी और सिम्मी अपना रिजल्ट लेकर चली गईं। कुछ दिनों बाद उन दोनों का आई. एस. सी. में एडमिशन भी हो गया। दोनों साइंस पढ़ने लगीं।

   रमा पीछे थी इसलिए उसे आर्ट्स लेना पड़ा। वह दोनों सहेलियों को अलग करने के लिए कोशिश करने लगी।

  सौभाग्य से एक दिन निम्मी अकेले बागीचे में बैठी मिल गई। वहीं रमा भी जाकर बैठ गई।

बोली, ‘‘आज तुम अकेली आई हो क्या?’’

‘‘हां, सिम्मी को कुछ घर पर काम था, इसलिए वह नहीं आई।’’

‘‘सिम्मी तुम्हारे बारे में…। जाने दो छोड़ो।’’

‘‘क्या मेरे बारे में? बताओ ?’’

‘‘अरे,जाने दो ना, वह तुम्हारी दोस्त है। कुछ कह दूंगी तो तुम उससे कह दोगी।’’

“बताओ न रमा, सिम्मी मेरे बारे में क्या कह रही थी ?’’निम्मी जानने के लिए एकदम बेचैन हो गई।

“नहीं, तुम गुस्सा हो जाओगी।”

“नहीं होऊँगी । बताओ।’’

“वह एक दिन मुझसे मिली थी .उसने कहा कि मेरे कारण ही निम्मी परीक्षा में ज्यादा नंबर लाती है। वह पढ़ने में एकदम कमजोर है। परीक्षा में मैं ही उसे दिखाती हूं तो पास होती है।”

यह सुनते ही निम्मी गुस्से से लाल होकर उठ गई, “क्या ? सिम्मी ऐसे बोल रही थी, मुझे विश्वास नहीं होता।’’

“अब तुम मानो या न मानो। वह तो यही कह रही थी। लेकिन हां, तुम यह सब उससे कह मत देना कि रमा ने कहा है ।”

निम्मी ने किताब उठाई और बोली, “जा रही हूं अभी उससे पूछने।” कह कर वह जल्दी – जल्दी चली गई।

रमा मनही मन खुश थी। तभी सिम्मी आ गई। बोली, “अरे रमा, निम्मी कहां है?”

“पता नहीं कहां है? अरे, बैठे तो सही।’’

सिम्मी बैठ गई।

“बुरा न मानना सिम्मी, पर निम्मी तुम्हारी बहुत बुराई कर रही थी।”

“क्या निम्मी मेरी बुराई कर रही थी ? तुम होश में तो हो ना?”

“मैं हूं। पर तुम नहीं हो। वह तो और भी कुछ कह रही थी कि सिम्मी ने मेरी देखा देखी साइंस ली है। उसे कुछ नहीं आता।”

“वह ऐसा बोल रही थी और क्या कह रही थी?”

“बहुत बुराई कर रही थी। तौबा – तौबा!”

सिम्मी उठकर खड़ी हो गई और गुस्से में बोली,“वह बड़ी अपने आप को तीस मारखां समझ रही है न अभी उसे बताती हूं।”

“अरे, मेरा नाम मत लेना।” कुटिलता से मुस्कुराते हुए रमा ने कहा।

वह बहुत खुश थी ।

सिम्मी चली गई।

दूसरे दिन क्लास में निम्मी – सिम्मी अलग – अलग बैठीं। दोनों ने एक दूसरे को देखा भी नहीं। उसी समय रमा आई। दोनों को अलग बैठा देख खुश हो गई।

उसने निम्मी के पास जाकर कहा, “निम्मी, इस प्रश्न का उतर बताओ ना।”

“मैं क्या बताऊँ? मैं तो किसी दूसरे का देख कर पास जो होती हूँ ।”

इतना सुनते ही सिम्मी गुस्से से लाल हो गई,“निम्मी, जबान संभाल कर बात करो।”

तभी लेक्चरर आ गईं । दोनों चुप – चाप बैठ गईं । उसी दिन से दोनों के बीच मन मुटाव रहने लगा। जब कभी रास्ते में उनका सामना हो जाता तो रास्ता बदल लेतीं। अब वह एक दूसरे की शक्ल भी देखना पसंद नहीं करती थीं।

उनकी दोस्ती टूटने के बारे में धीरे – धीरे सभी को पता चला गया। उन लड़कियों को जो उनसे ईर्ष्या करती थीं इस बात से उन्हें बहुत खुशी हुई। अच्छी लड़कियों ने उन्हें बहुत समझाया पर दोनों नहीं मानीं। वे झुकने को तैयार नहीं थीं।

जांच परीक्षा में दोनों बुरी तरह से फेल हो गईं । यह देख टीचरों और उनके माता – पिता को बहुत चिंता होने लगी।

एक दिन निम्मी के पापा कॉलेज की एक शिक्षिका के पास गए जो मुख्य लेकचरर थीं।

वह बोले, “मैडम, मेरी बेटी निम्मी आप के ही कॉलेज में पढ़ती है। पता नहीं उसे क्या हुआ है जो इस बार फेल हो गई। आप तो जानती ही हैं उसकी सिम्मी के साथ दोस्ती टूट गई है।”

“हां, मैं भी बहुत परेशान हूं। दोनों को मिलाने के लिए कोई न कोई उपाय करना ही पड़ेगा।”

निम्मी के पापा आश्वासन लेकर घर चले गए।

एक दिन रमा को निम्मी मिल गई। वह बोली,“अब सिम्मी से दोस्ती कर लो। क्यो इतनी नाराज हो?”

“नहीं करूंगी उससे दोस्ती, ” कहकर वह चली गई।

रमा को अब पश्चतावा होने लगा कि क्यों मैंने इनकी दोस्ती तुड़वा दी। अब इनको फिर से मिलाना पड़ेगा ।

दूसरे दिन क्लास लेने के बाद लेक्चरर ने जाते हुए कहा, “निम्मी, सिम्मी, तुम दोनों मेरे चेंबर में आओ।”

उनके पीछे दोनों जाने लगीं, लेकिन उनमें कुछ बात नहीं हुईं।

दोनों चेंबर में पहुंची। लेक्चरर ने पूछा,“क्या तुम दोनों दोस्ती की परिभाषा जानती हो ?”

निम्मी – सिम्मी ने ना में जवाब दिया।

मैडम दोनों को लेकर खेल के मैदान में गईं। निम्मी और सिम्मी दुश्मनी भूल कर एक दूसरे को आश्चर्य से देखने लगीं।

मैडम ने एक स्थान पर खड़े होकर एक मुठ्ठी बालू उठाया और मुठ्ठी ऊपर उठाकर धीरे – धीरे उसमें से बालू को नीचे गिराने लगीं।

निम्मी और सिम्मी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था। वह दोनों  कभी मैडम को देखतीं तो कभी एक दूसरे को। उन्हें इस प्रकार उत्सुक देख कर मैडम ने सारा बालू गिरा कर हथेली उनके सामने फैला दी और बोलीं, “कुछ तुम दोनों को समझ में आया?”

उन दोनों ने नाकारात्मक उत्तर दिया। इस पर मैडम हथेली में चिपके बालू को दिखाते हुए बोलीं,“हथेली में चिपके बालू को देख रही हो, दोस्ती भी बिल्कुल इसी प्रकार की होती है। हमारे जीवन में अनेक दोस्त बनते हैं, बिछुड़ते हैं पर सच्चे दोस्त इस हथेली में चिपके बालू की तरह हमेशा साथ रहते हैं। सुख – दुख में काम आते हैं। अगर किसी से दोस्ती करनी चाहिए तो इस हथेली के बालू की तरह हमेशा साथ निभाना चाहिए।”

मैडम ने दोनों को समझाया कि यहीं सच्ची दोस्ती का अर्थ है। अगर कोई तुम दोनों के बारे में उल्टी – सीधी कह देगा तो तुम मान जाओगी? तुम दोनों अपनी दोस्ती की मिसाल कायम करना चाहती थी,मगर क्या हुआ ?”

इतना सुनने के बाद निम्मी – सिम्मी की आंखों में आंसू भर आएं । वे अपनी गलती पर पछताने लगीं। दोनों ने एक दूसरे को देखा। उनकी आंखों में पहली जैसी ही दोस्ती की चमक और प्यार की झलक थी। दोनों गले लग गईं।

“अब मुझसे लड़ोगी नहीं न?”निम्मी ने पूछा।

“तुम भी मुझसे कभी झगड़ा न करना।” सिम्मी बोली।

दोनों ने मैडम के पैर छूते हुए कहा,“मैडम, आज आपने हमारी आंखें खोल दीं। आज हम दोस्ती का मतलब और रहस्य समझ गईं। हम हमेशा एक दूसरे का साथ निभाने का वचन देते हैं।”

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