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  • लक्ष्मीनारायण प्रधान ‘लक्खु’

 

उसके सिर को गोद में लिए वो छाती पीट – पीट कर रो रही थी।

“मांजी, आप चुप हो जाइए… प्लीज… चलो, सिर गोद से हटाइये हमें बाटल लगाना है।”

दो नर्स आई और फटाफट अपना काम करने में लग गईं ।

“मांजी, इतना क्यों रही हैं… ठीक हो जाएगा तुम्हारा लड़का बिल्कुल चुप हो जाइए।”

“सिस्टर,  मैं तुम्हारे पैर पड़ती हूँ…  मेरे बेटे को बचालो।”

“अरे, बाबा कह दिया न… ये भाई साहब, जरा इस मांजी को कृपया बाहर ले जाइए।”

एक दिन मैं हास्पिटल उसे देखने गया। वह लड़का पूर्ण रूप से ठीक हो गया था। मजे से पलंग पर बैठकर मां द्वारा लाए अंगूर खा रहा था।

“बड़ा बेवकूफ है तू… मां ने थोड़ा सा क्या डांट दिया तूने तो एक दम से जहर ही खा लिया…  मालूम है तेरी मां कितनी रो  तड़प रही थी तेरे लिए । कैसा है तू…“

उसने अपनी मां की ओर तनिक देखकर कहा,

“इस बुढ़िया ने तो मुझे तंग कर रखा है… अगर इसने ज्यादा ही मुझे कुछ कहा तो मैं भाग जाऊंगा… आऊँगा ही नहीं…”

“क्यों भाग जाएगा ? तेरे वियोग मे बेचारी तेरी मां मर जाएगी । जानता नहीं तू…”

“मर जाए… मुझे क्या करना है…”

उसकी चचंल आँखें और कठोर आवाज स्पष्ट संकेत कर रहीं थीं कि उसके दिल में जरा भी दया भाव नही है।

फिर मेरी नजर बरामदे में गयीं।

देखा उसकी मां स्टोव पर चाय बना

रही थी ।

उसकी आँखेँ रोरो कर सूज गई थी चेहरा काला पड़ गया था और उसकी उन सुजी हुई आँखों में और काले पड़े चेहरे पर अपने बेटे के ठीक होने की खुशी झलक रही थी।

 

  • बैतूल मध्यप्रदेश

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