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– लक्ष्मीनारायण प्रधान लक्खु

 

वह दरवाजे की चौखट से सट कर खड़ा एक कीमती खिलौने से उसको खेलते हुए देख रहा था। कुछ देर तक वो

उसके आनंद में अपना मनोरंजन करता रहा। तत्पश्चात दिल में एक नन्हीं सी भावी मासूम खुशी जागी और उसे लेकर वो अपने घर की ओर भागा।

“मेरा ब्लाउज फट गया है। सील – सील कर पहन रही हूँ… आजकल – आजकल कहते हुए इतने महीने हो गए …”

वह गुस्से से थैली में से आलू और प्याज निकाल कर टोकरी में पटक रही थी।

“क्या करूँ… पैसे बचें तब तो लाऊं… मंहगाई कितनी है तुझे मालूम है। इस छोटी सी मजदूरी में मैं क्या क्या लाऊँ…? तुझे क्या जरा एक दिन बाजार जाकर देखना और तब पता चलेगा… चली चिल्लाने…”

“क्या मैं चिल्ला रही हूँ ? मैं कहती हूँ एक ब्लाउज कितने में  आती है ? चीज हजार दो हजार की तो नहीं है। और मैं कहती हूँ कैसी तुम्हारी आँख है ! मेरा फटा ब्लाउज तुम्हें दिखता नहीं… मुझे क्या तुम्हें ही नाम धरेगें…”

“अच्छा ठीक है… अब बंद कर अगले हफ्ते ला दूँगा।”

पति – पत्नी दोनों आपस मे झगड़ रहे थे और दूर खड़ा वो मासूम निगाहों से कभी अपनी मां को तो कभी पिता को देख रहा था।

अब कोई खिलौना उसके जेहन मे नहीं था।

  • बैतूल मध्यप्रदेश
  • मो. नं. – 9399892514

 

 

 

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