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– सुरेन्द्र कौर बग्गा

रामसहाय जी दस वर्ष पूर्व सरकारी नौकरी से रिटायर  हो चुके थे।कुछ समय पहले ही उनकी पत्नी  का निधन हो गया था।वह अपने इकलौते बेटे और बहू के साथ रहते थे।

प्रतिमाह एक तारीख को वह सुबह दस बजे ही  अपनी पेंशन लेने के लिए बैंक पहुंच जाते।बैंक का कैशियर उनसे कहता- “दादा बैंक साढ़े दस बजे खुलता है आप इतनी जल्दी क्यों आकर बैठ जाते हो?” वह धीरे  से कहते- “बेटा,वापस पैदल घर पहुंचने में आधा घंटा लगता है।एक तारीख को जब घर जाकर पेंशन के पूरे पैसे बहू के हाथ में रखता हूँ तब मुझे खाना मिलता है।यही क्रम कई वर्षों से चला आ रहा था।

अचानक देश में कोरोना के कहर के कारण  मार्च के अंतिम सप्ताह से  “लाॅक -ड़ाउन” लगा दिया गया।सारे बैंक बंद हो चुके थे।सीनियर सिटीजन को घर से बाहर नहीं निकलने के सख्त निर्देश थे।ऐसे में रामसहाय जी पेंशन की राशि कैसे ला सकते थे?

धीरे-धीरे खाने की थाली के साथ-साथ बहू के ताने भी शुरू हो गए।वह बड़बड़ाते हुए कहती – “कितनी बार कहा कि पेंशन अकाउंट का एटीएम कार्ड इश्यू करवा ले पर सठिया गए हैं , किसी की बात मानने  को राजी ही नहीं होते।” वह बेचारे  चुप्पी लगा जाते।

अब लाॅक- ड़ाउन की अवधि बढ़ने के साथ-साथ रामसहाय जी की सुविधाओं में भी कटौती होने लगी।दो माह बाद उनको कमजोरी के लिए दी जाने वाली ताकत की दवाइयाँ खरीदना भी बंद हो  गई ।बिना  दवाइयों के उनकी कमजोरी बढ़ रही थी।बैंक जाकर पेंशन न ला पाने के कारण मन बहुत व्यथित था। लेकिन  क्या करते उनके  पास बैंक से पेंशन के पैसे निकालने का कोई उपाय ही नहीं था ।

रात के ग्यारह बज चुके थे।उन्हें बहुत बैचेनी हो रही थी ।शरीर बड़ा अशक्त लग रहा था।घर के सभी लोग सो चुके थे उन्होंने अपने कमरे का दरवाजा खोला और बाहर आंगन में आ गए।आंगन में बंधे घर के डाॅगी मोती का दूध का कटोरा आधा भरा था, शायद उसे भूख नहीं होने से उसने आधा दूध बाकी छोड़ दिया था। रामसहाय जी ने बड़ी ललचायी नज़रों से दूध के कटोरे की ओर देखा।पिछले दो महीनों से उन्होंने दूध का स्वाद  तक नहीं चखा था।कांपते हाथों से उन्होंने दूध का कटोरा उठाया और एक ही साँस में गटागट कर पी गए। पैसों के अभाव में  वे आज अपने ही परिवार के लिए मूल्यहीन हो चुके  थे ।

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