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– डॉ. राजश्री तिरविर

 

गजल 

 

क्यों यार उसे अपना मैं प्यार समझ बैठीं

ये भूल हुयी उसको जो यार समझ बैठीं।

 

देता वो’ सभी को ही, आदत से सदा धोखा

फिर क्यो मैं’ उसे अपना दिलदार समझ बैठीं।।

 

क्यों दूरी’ मुझे उसकी लाचार बनाती है।

अब प्यार को’ ही अपनी मैं हार समझ बैठीं।।

 

बातें न कभी मीठी उसकी मैं’ समझ पायीं

वो प्यार भरी दिल की बौछार समझ बैठीं।।

 

क्यों खेल रहा था वो भावों से’  मेरे खुलकर

मैं राज उसे अपना संसार समझ बैठीं।।

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