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-नीतू सुदीप्ति ‘ नित्या’

शहर के सबसे धनी सेठ दीनानाथ के घरे आजु देवाली के खूबे चहल – पहल रहे . उनुकर पंचतल्ला अलीशान बंगला ‘मालती पैलेश’ के भुकभुकिया बवलन से सजावल जात रहे . दू – चार गो नोकर माटी के दीया बारे खातिर तीसी के तेल में रुआ के बात्ती डुबा – डुबा के रखत रहन स .

सांझि खा लछमी आ गनेश जी के पूजा होखे के रहे . दीनानाथ के घरही में पहिलका आ दोसरका ताला प कपड़ा के होलसेल के बड़ – बड़ दू गो दोकान रही स .

पूजा में ख़ास – ख़ास एकावन गो दोस्त दोकानदारन के आवे के नेवता दिआइल रहे . ऊ सभ लोग खातिर घीव के मोतीचूर के लड्डू बनल रहे आ गंहकिन के बाटे खातिर डालडा के .

मलमल के कुरता आ पियरी धोती पहिनले, माथा प रोरी के टीका लगवले दीनानाथ पूजा के आसनी प बइठल रहन . उनुकरे बगल में उनुकर मेहरारू मालती भी लाल रंग के बनारसी साड़ी पहिनले सोना के गहना से लदाइल बइठल रही . उनुकर बड़का बेटा राहुल पूजा के सरजाम जुटावत रहन . छोटका बेटा रवि दोकानदारन के स्वागत में  लागल रहन .

पंडीजी पीपा के सेनुर में घीव मिला के ओकरे से दोकान के पोताइल देवाल प ‘स्वस्तिक’ के चित्र बनवले . फेरु ‘ॐ’, ‘शुभ – लाभ’ आउर ‘पन्दरहवा मंतर’ लिखि के जोर – जोर से मंतर पढ़ि के गनेस जी आ  लछमी जी, कपड़ा नापे वाला मीटर, खाता, बही, कलम आउर बड़का -बड़का दू गो गल्ला के पूजा करवावे लगलें . 

चानी आ माटी के गनेस – लछमी जी मखमल के पीयर – पीयर गोटा चढ़ावल झालर वाला वस्त्र पहिनले कमल के फूल प बइठल रहीं जा . सभ लोग हाथ जोरि के ऊ दूनों भगवान से धन आ बुधी मांगत रहे . गनेस जी का चरन प फल, मेवा आ लड्डू चढ़ल रहे आ लछमी जी के चरन प ढ़ेरिखा चानी के सिक्का आ नोट चढ़ल रहे .

आरती कइला का बाद जब परसाद के रूप में ऊ एकावनो दोकानदार के बड़का – बड़का डिबा में एक – एक डिबा घीव के लड्डू दिआए लागल, त ओह में भरले लड्डू के एगो डिबा कम हो गइल .

दीनानाथ के डरे राहुल के होंठ प फेफरी परि गइल, “बाबूजी, लड्डू से भरल एगो डिबा कम हो गइल .”

दीनानाथ खीसी भूत हो गइलें . बाकिर सामने मेहमान लोग रहन एही से ऊ उपरिये मन से सांत भइले .

ऊ गनेश जी के घीवे के लड्डू से भोग लगवले रहन . ओकरे के ऊ अंतिम दोकानदारन के देले आ मन में खीस आ होंठ प सूखल मुसुकी भरि के सभ दोकानदारन के बिदा कइलें . 

जब सभ केहू चलि गइल त उनुकर परा गरम हो गइल, “कवन साला चोर बा, जवन हमार एगो डिबा घीव के लड्डू चोरा लेलस हम ओकरा के ज़िंदा ना छोड़ब .”

“अगर हमनी के ओही लड्डू से गनेश जी के भोग ना लगवले रहतीं जा, तs आजु हमनी के नाक कटि जाइत .” मालती भी खिसिआइल रही .

दसो नोकर हाथ जोड़ि के गिड़गिड़ात रहन स, “मालिक, हमनी के मोतीचूर के लड्डू नइखीजा चोरवले . कवनो दोसर अदिमी चोरवले बा .”

“छोड़ीं ना बाबूजी, एगो डिबा लड्डू चोरी हो गइल त का भइल ? लीं, परसादी खाईं आ ख़ुशी से देवाली मनाईं .” रवि बाबू – माई के परसादी देत कहले .

हरियर लान में दीनानाथ मेहरारू आ बेटन के जवरे छुरछुरी, चरखी आउर कुछु बम – पड़ाका छोड़ि के कपड़ा बदले घर के भीतरे चलि गइले . 

ऊ आपन कमरा में जाते रहन कि माई – बाबू के छोटहन कमरा से उनुका हँसे के आवाज सुनाई देलस . ऊ खिड़की से झांकि के देखलन . ई देखि के उनुकर गोड़ के नीचे से एक हाथ जमीन सरकि गइल कि चोरी गइल ऊ भरल लड्डू के डिबा सामने टेबुल प खुला पड़ल बा . खीस के मारे उनुकर खून खउल गइल .

तबहीं माई के बोली सुनाइल, “केतना साल बाद आजु ई घीव के लड्डू हमरा खाये के मिलल बा . जरुर ई रउआ के बबुआ देले होई हमरा खातिर .” 

“ना, हम चोरा के लिआइल बानी .” बाबू लड्डू खाते कहलें . 

“चोरा के !”

“अरे, गते से बोलs, ना त केहू सुन लीही .”

“बाकिर रउआ, का जरुरत रहे अपने घर में लड्डू चोरावे के ?” माई हैरान होके पुछली .

“ई हमार एकलउता बेटा हमार सभ कारबार हमरा से छीन के खुदे सेठ बनि गइल आ हमरा के पागल होखे के हाला उड़ा के घर में बइठा दिहलस .

आजु गनेस जी के आ लछमी जी के सोना के झुलुआ प झुलावत रहे बाकिर आपन बुढ़ माई – बाबू के सूते खातिर दू गो टूटल खटिया देले बा . हमनी के अपनहीं घर में हर चीज खातिर मोहताज हो गइल बानी स आ अपने बेटा – पतोह के आगा हाथ पसारे के पड़ेला . हमनी के मीठा बहुते पसन रहे एही से ऊ एगो डाक्टर से कहवा के हमनी दूनों कोई के चीनिया के रोगी बना दिहलस कि हमनी के रोज – रोज खीर, सेवई आ मिठाई के फरमाइश ना करिजा . लइकाई में हम दीनू के आपन हिस्सा के मिठाई खिया देत रहलीं, बाकिर आजु….” 

“छोड़ीं ना, आजु तेवहार के दिन ई कइसन बात कहे लगनीं ! लीं, लड्डू खाईं .” बाबू के आंखि में आवत लोर के देखि के माई उनुकर बात कटली .

कुल्हि बात सुन के दीनानाथ के आंखि से झरs – झरs लोर गिरे लागल . उनुकर गोड़ मन भर भारी हो गइल .

ऊ गते – गते दरवाजा का ओर बढ़लें . लड्डूचोर से माफ़ी मांगे खातिर .

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