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गतांक से आगे …

(2)

 

सँवरी के बाबू खेत बेंचि के एक लाख रूपिया लइका के बाप छग्गन केदे दिहले आ बाँचल रूपिया से बिआह के सभ सामान जुटावे लगले।

बिआह होखे में पनरह दिन बाँचल रहे। तीनों सखी अकेला में बइठिके बतिआवत रही।

‘‘सँवरी, तूँ त पनरह दिन खातिर बाडू। बिआह के बाद ससुरा गइलाप हमनी के इयाद करबू नू ?’’ पमली पूछली।

‘‘ऊ त जटहे बाबा जानत बाड़े। हमार मन ससुरा में कइसे लागी। तहरालोग के साथे खेलल-कूदल, लड़ाई-झगड़ा सभ इयाद आई। तहरा लोग के फोटो देखि-देखि के मन बहलाइब।’’ सँवरी उदास हो के कहली।

‘‘आछा ई बतावऽ जब तहार बिदाई होई त तूँ रोवबू कि ना ? हम त ना रोअब।’’ बारली कहली।

‘‘जब तहरा लोग से अलग हटब त रोआइये नू छूटी। रोकाई भला ?’’ सँवरी रोआँसा हो के कहली।

‘‘आछा कतना रोअबू ? कम कि ढे़र ? काहें कि लोग कहेला, जवनलइकी विदाई घरी जादे रोवेलीसन ऊ अपना माई – बाबू के जादे चाहेली सन। जवन लइकी कम रोवेली सन, ऊ अपना दुलहा लगे जाये के बचैन रहेली सन।’’ पमली सुनल-सुनावल बाति कहली।

‘‘ई सभ आधा दिमाग के लोग कहेला। जवना लइकी में जेतना शक्तिरही ओतने नू रोई, अउर का ?’’ बारली झझुआ के बोलली।

‘‘अब तू लोग इहे बतिआवत रहबू कि कवलेज में जाके नाँवो लिखइबू ?’’ सँवरी बात काटत कहली।

‘‘हँ पमली, आई0 ए0 में नाँव लिखाता। तूँ साइंस लेबू नू ?’’ बारलीपमली से पूछली।

‘‘ना बाबा ना, हम साइंस फाइंस ना लेब अंग्रेजी –हिसाबसे हमरा बड़ा डर लागेला। हिन्दिये से पढ़ब। तूँ साइंस लेबू का ? पमली पूछली ।

‘‘हम त साइंसे लेब आ अलगे से हिसाबो लेब।’’ बारली कहली।

फेर, तीनों सखी खुसुर-फुसुर क के हँसि–बतिया के घरे आ गइली।

सँवरी के माई सँवरी के अब एने ओने जाये से मना क दिहली।

पमली आई0 ए0 आ बारली आई0 एस0 सी0 में नांव लिखवा लिहली।

दूनों विषय एके कवलेज में पढ़ावल जात रहे। लइका-लइकी सभ साथे पढ़त रहले। दू चार दिन पमली आ बारली संगे-संगे कवलेज गइली लोग। फेनु सँवरी के बिआहे में बाझि गइली लोग। एक देने खुशियो रहे आ दोसरका देने दुखों रहे कि सँवरी अब साथ छोड़ि के चलि जइहें।

सुरूआते लगन में सँवरी के बिआह केसर का साथे खूब धूम-धाम सेहो गइल। पमली आ बारली केसर का साथे खूब हँसी मजाक कइली लोग।

बिदाई में पमली सँवरी के एगो खूब नीमन मैचिंग कलर के साड़ी उपहारदिहली आ बारली उनुका दुलहा केसर के अंगुरी में एगो सोना के अंगुठीपहिरा दिहली। सँवरी अपना माई से भेंट अँकवार करत खूब बिलिख-बिलिख के रोवली आ उनुकर माई अपना बेटी खातिर डहकत रहि गइली।

सँवरी के घर के एगो नियम रहे कि बियाहे बेटी के बिदाई किरिसनाजी के मंदिर से होई आ ससुरार से पहिले बेरि बेटी पहिले ओइजे अइहें, तब अपना घरे अइहें।

सँवरी अपना माई – बाबू से भेंट क के केसर का संगे मंदिर गइली।

साथे-साथे पमली आ बारलियो रही।

सँवरी अवरी केसर गेंठी जोड़वले मंदिर में जा के किरिसना जी केपरनाम कइले लोग। ओह घरी पमली आ बारली खूब रोअत रही लोग।

सँवरी दउरि के दूनों जानी के अंकवारी में भरि के रोवे लगली। ओह घरी ओह लोग के रोपल गुलाब के फूलों  उनुका से मिले खातिर मचलत रहे, जइसे कहत होखे, हमहूँ सँवरी के अंकवारी भरब।’

ओह लोगन के रोवते बड़ी देर हो गइल त केसर आपन पगरी ठीक करत कइले,‘‘अब रोअल बंद करीं जा आ अपना सखी के गाड़ी में बइंठाईं जा।’’

पमली आ बारली सँवरी के हाथ धइले गाड़ी में बइठवली लोग। सँवरीगाड़िये में से आपन लगावल ओह दूनों गुलाब के गोड़ लगली। हँकरत नजरसे देखली। जुदाई के लोर ढरकि गइल।

बारली हाथ जोरि के केसर से कहली,‘‘जीजा जी, हमार सँवरी हमनीके परान हई। इनिकर खेयाल राखब।’’

‘‘रउवा हमनी के दिल ले जात बानी छीन के। ई कवनो गलतियो क देसुभुल के त माफ करब जीजा जी।’’ पमली दूनों आँखिन से ढरकत लोर पोंछत कहली।

गाड़ी खुल गइल। सँवरी केसर का संगे नया दुनिया के नया जिनगीके राह पर गोड़ बढ़ा दिहली। बारली, जवन कहले रही कि हम ना रोअबि उहे सँवरी के गइला का बाद डहकि – डहकि के लोर ढरकवली।

‘‘मत रोअऽ बारली, एतना काहे रोवत बाडू ?’’ पमली उनुकर लोर पोछत समुझवली।

‘‘सँवरी के सभ बाति इयाद पड़त बा, अब ऊ कब अइहें, पमली ?’’ बारली रोवते पूछली।

‘‘अबहीं त जाते बाड़ी, अब त सवा महीना बादे नू लउकिहें।’’पमली कहली।

‘‘अतना दिन बाद।’’

‘‘हँ हो। इहे नू अपना समाज के रीति-रिवाज बा।’’ दूनों जानी भारी मनलिहले अपना घरे गइली लोग। सँवरी के ससुरा जायेसे पमली आ बारली के मन तनिको ना लागत रहे। एक-क दिन एक-क बरिस अस लागत रहे।

‘हमनी के सखियारो बड़ा अजीब रिश्ता बा, कबो झगड़ा करावेला तकबो प्यार बरिसावेला। एकरा से आछा रहित कि हमनी के सखिये ना रहिती जा। बिआह के बाद अतना तड़पे के त ना नू पड़ित। जब सखियारो कइनी जा त कतना खुश रहीं जा, अब सँवरी से बिछुड़ गइनींजा त कतना दुख होता।’ एक जानी सोचत रहली। ई बिआहो बड़ा अजीब चीज बा, एकरा कारन सभ नाता रिस्ता तूर के लइकी के दोसरा जगह जाये कि पड़ेला।

ओहिजा रहे के पड़ेला । आपन माई – बाबू , भाई – बहिन, सखी-सहेली के छोड़ि के दोसरा के आपन सास-ससुर, मरद, देवर, ननद आ गोतिनी माने के पड़ेला। परिचित समाज छोड़ि के एकदम अनजान आ अपरिचित समाज में जाके ओकरा के आपन बनावे के पड़ेला। लइकियो के जिनगी हद बा।’

दोसरकी जानी कहली,‘‘छोड़ऽ ना बारली, सभ लइकिन का साथे इहे होला।हमनी के सोचला से का नियम बदला जाई ? हमनी के अपना सवारथ खातिर सँवरी के बिआह ना करावल चहती जा, बोलऽ ? अब हमनी का अकेले रह गइनी जा। सँवरी त ससुरा से अइहें कुछ दिन रहिहें आ फेनु आपन घर – दुआर सँभारे चलि जइहें  । फेनु अपना दुलहा आ लइका-फइका में बाझि जइहें अबकहँवा सखी आ कहँवा माई – बाबू ? ऊ सभ भुला जइहें,नून – तेल आ लकड़िये उनुका याद रही। देखलू ना उनकर माई कतना रोवत रही ? पहिले पहिल बेटी के बिआह-बिदाई करे में माई-बाबू के करेज फाटि जाला। हमनी का इहे मनाईं जा, कि सँवरी ससुरा में रचि बसि जासु। खुशी-खुशी रहसु। अब तूँ पढ़ाई प धेयान दऽ।’’ पमली बारली के समुझवली।

‘‘त का सँवरी के भुलाये के पड़ी ?’’ बारली आँखि से लोर गिरावतकहली।

‘‘ढ़ेर ना त कम भुलाहीं के पड़ी।’’ पमली के आँखि भर गइल।

एने सँवरियो के ससुरा में मन ना लागत रहे। उनुका आपन सइंया तमिललें बाकिर जान से पियारी सखी लोग छुटि गइली। ऊहो एह लोग से मिले खातिर तड़पत रही।

पमली आ बारली कवलेज जात रही, त सँवरी के इयाद कम आवत रहे।बाकिर घरे अइला प ऊहे लउके लागत रही।

नया साल प सँवरी लगे कार्ड भेजली लोग। सँवरी के खुशी के ठेकानना रहे। केसर कार्ड देखि के खूबे हँसले।

सँवरी कार्ड के बदले कार्ड आ चिट्ठी भेजली।

चिट्ठी पढ़ि के बारली कहली,‘‘असहीं सँवरी खुश रहसु, भगवान सेइहे प्रार्थना बा।’’

‘‘एही खुशी खातिर नू बिआह होला । देखऽ, त सँवरी जीजा जी के साथेकतना खुश बाड़ी। पमली चिट्ठी पढ़ते चहक उठली।

सवा महीना के बाद सँवरी अपना छोटका भाई का साथे नइहर अइली। ओनिये से ओनिये पहिले मंदिर में गइली। जब ई बात पमली आ बारली सुनली लोग त हाली हाली तेयार होके मंदिर का ओर दउर गइली लोग। जब पहुँचली लोग, ओह घरी सँवरी मंदिर के चउकठ के गोड़ लागत रही।

देखते अँकवार पसार देली आ दूनों जानी हहुआ के अँकवारी में बान्हिलिहली लोग। पमली आ बारली के लोर से सँवरी के बेलाउज भींजत रहे आ सँवरी के लोर से ओह लोग के कान्हा सराबोर होत रहे।

लोर थमल त बारली पूछली,‘‘हमनी के इयाद ना आवत रहे तहरा ?’’

‘‘इयाद त आवते रहे, बाकी का करीं ? अपना जीजा जी से पुछिह, हमकतना रोवत रहीं तहरा लोग खातिर।’’ तबले उनुकर माई आवत लउक गइली। ‘‘आछा पहिले आपन लोर पोछल, देखऽ माई आवत बिया।’’ सँवरी कहली आ उनुका अँकवारी से बहरीअइली।

सँवरी माई – बाबू के गोड़ छुअली आ माई का संगे घरे चले के पहिले कहली,‘‘माई, तू बाबूजी संगे घरे चलऽ हम पीछे से आवत बानी।’’

बाबू दूनों बक्सा उठा के भोला का साथे चल दिहले। माइयो ओह लोगके पीछे लाग गइली।

‘‘तूँहू लोग चलऽ लोग घरे।’’ सँवरी पमली आ बारली से कहली। बाकिरबारली के आँखिन में अबही ले लोर भरल रहे। उनुकर लोर देखि के सँवरी पूछली, ‘‘काहे हो, अबहीं ले रावते बाडू ?’’

‘‘ना हो खुशी के लोर ह, ठटात नइखे । तू साड़ी पेन्हले आ सेनुर कइले कतना सुन्नर लागत बाड़ू। बुझाता कि जीजा जी के चुपके – चुपके खूब मिठाई खियावत रहले हा।’’ बारली आपन लोर पोछत हँसि के कहली।

‘‘बिआह के बाद सभे सुन्नर लागेला, बुझलू ? आछा, ई बतावऽ हमरागुलाब के सेवा कइलू हा लो कि ना ?’’ सँवरी गुलाब के हरियर कचनार पतई छुअते पूछली।

‘‘सेवा ना करतीं जा त अतना झँगाठ ना भइल रहित।’’ पमली एगोगुलाब के फूल तूरि के सँवरी के बड़का जूड़ा में लगा दिहली आ कहली,‘‘अब तू अवरू सुन्नर लागे लगलू, बाकिर हमार नजर ना लागी।’’

इहे बात बतियावते हँसत-मुस्कात पमली, बारली सँवरी के घरे पहुँचगइली। सँवरी के छोट बहिन बिमली एगो छीपा में पूड़ी-खीर ले आके खाये के दिहली।

तीनों सखी एके में खाये लगली आ ससुरा के बात बतियावे लगली।

‘‘जीजा जी ना अइले हा, दिदिया ?’’ पूड़ी देत बिमली पूछली।

‘‘बाद में अइहें।’’ सँवरी कहली।

‘‘अबहीं तू लोग खा के अपना घरे जा लोग। सँवरी के तनी आराम करेद लोग।’’ सँवरी के माई पमली आ बारली से कहली, ‘‘राह के हारल थाकल बिया। ससुरा के बात बाद में बतिअइह लोग।’’

‘‘घबड़ा मत चाची, हऊ सभ बात ना पूछब जा।’’ पमली गते से कहलीबाकी चाची त सुन लेली, ‘‘हँ,नू  हमरे से मजाक करे चललू हाँ, हमरा सभ बुझात बा।’’ चाची बोल देली।

पमली आ बारली मन जँतले कसहूँ घरे गइली बाकिर दिल में हुद-हुदी समाइल रहे कि सँवरी से भरपेट बात ना बतिअवनी जा।

दोसरा दिन सँवरी अपना ससुरा के खाजा-मिठाई पमली आ बारली के खाये के दिहली। गुलाब के पौधा भीरी तीनों जानी खात-बतिआवत रही।

‘‘ससुरा में सभ केहू आछा बा नू सँवरी ?’’ बारली पूछली।

‘‘हँ, सभ लोग ठीक बा। बाकी अतना जल्दी केहू के चाल सुभाव थोड़ेबुझाई, अबहीं त हम सोनवे गइनी, फेनु चनिये जाइब, आ फेनु माटिये – गिलवे जाइब।’’ सँवरी हँसते कहलीं।

‘‘आ केसर जीजा जी कइसन बानीं ?’’ पमली दाँत से मिठाई काटतमुस्कात आँखि जाँत के पूछली।

‘‘ऊहों के ठीके बानीं, बाकी तनी खिसियाह हईं।’’ सँवरी हँसी चोरावतेकहली।

‘‘बस, ठीके बानी ? बहुते आछा नइखीं ?’’

‘‘ना हो, बहुते आछा बानीं।’’ सँवरी खिलखिला देली।

‘‘आछा सँवरी, हम सुनले बानी कि बिआह भइला का बाद दूनों परानी‘हनीमून’ मनावे कतहीं दोसरा जगहा जालन, तूँ कहँवा गइल रहू ?’’ पमली सँवरी के खोद के पूछली।

अबहीं सँवरी कुछ बोलिती, तब ले बारली टुभुकि देली,‘‘इहे कुल्हिपूछल जाला, फेनु इहो पूछि लीहऽकि हनीमून में का – का कइल जाला ?’’

‘‘हँ पूछबे करब, एकदम पूछब।’’ पमली चटसे जवाब देली।

एतना प बारली उठ गइली, कहली, ‘‘तूँ अब बइठि के इहे सब पूछतरहऽ। हम जात बानी।’’

सँवरी हाथ पकड़ि ले ली, ‘‘तूं काहें खिसियात बाडू ? आखिर कबोना कबो तूं हू त अपना दुलहा का संगे ‘हनीमून’ मनइबे करबू।’’

‘‘एकदम ना, आ हाल-फिलहाल त हम बिआह करब ना। जब तक अपना गोड़ प खाढ़ ना हो जाइब।’’ बारली हाथ छोड़ावत कहली।

‘‘सँवरी बतावऽ ना, कहँवा गइल रहू हनीमून मनावे ?’’ पमली फेरु जीदकइली।

‘‘अरे, जाइब कहँवा, रोज राति के बंद कमरा में हनीमूने नू मनेला।’’ सँवरी हँसते कहली।

‘‘बस इहे।’’

‘‘बस ना त का टरक। अब अहथिर भइलू नू ?’’ बारली चीढ़ गइली।

‘‘अबही कहँवा अहथिर भइल बानी, अबही त एगो अउर बात पूछे केबा। बतावऽ सँवरी, सरकारी हनीमून आ प्राइवेट हनीमून केकरा के कहलजाला ?’’ पमली सँवरी से फेरू पुछली।’’

‘‘तूँ हू पगला गइल बाड़ू का ? इहे सभ पूछल जाला ?’’ सँवरी पमली केतनी डँटली।

‘‘तब का पूछल जाला, ई सभ बात सखिये से ना पुछाई तब के बताई,माई ?’’ पमली ई बात जाने खातिर उबिआइल रही।

‘‘त सुनऽ, सरकारी ‘हनीमून’ ऊ कहाला जब लइका लइकी के बिआहहो जाला। घर-समाज के लोग दूनों के एक रिश्ता के डोर में बान्ह देला।’’

‘‘आ प्राइवेट हनीमून ?’’

‘‘प्राइवेट हनीमनू ऊ ह, जवना में कुंआर लइका-लइकी सबका से लुका – छुपी के मिलेलन आ बिआह का पहिलही सभ कुछ क लेलन। बाकी एह में दूनों के बदनामी होला। अपना तन-मन के आगि बुझावे खातिर बिना समुझले बुझले ऊ एह मैदान में कुदि जालन, जेकर नतीजा बहुत खराब होला।

‘‘माने कि सरकारी भा प्राइवेट दूनों मेंहनीमून मनावे के तरीका एके बा।बाकी सरकारी सभ बरदास करेला प्राइवेट केहू ना बरदास करे। खाली एकचुटुकी सेनुर बिना। समुझलू ?’’ सँवरी पमली के माथा ठोकली,‘‘समुझ मेंआइल बुद्धू ?’’

‘‘हँ आइल। बाकिर बारली काहें कान प हाथ धइले बाड़ी ?’’ पमलीहँसते हँसत पुछली।

‘‘ताकि हमरा दिल – दिमाग में ई सभ खराब बात ना आवे।’’ बारली कान प से हाथ हटा के कहली।

‘‘ई सभ खराब बात ह ?’’ पमली पूछली।

‘‘तब का एही से नू समाज बिगड़त बा।’’

‘‘समाज एह से नइखे बिगड़त बुद्धू।’’

‘‘तब ?’’

‘‘एकर सही जानकारी नइखे एह से बिगड़त बा, रानी जी। बुझाइल ?कवनो बात के सही जानकारी हो जाला त आदमी सोच समुझ के कवनो कामकरेला। ना त हहुआइल रहेला।’’

‘‘चुप रहऽ। तू ही हहुआइल होखबू।’’

‘‘देखत नू बाडू, सँवरी। इनिका के समुझावत काहे नइखू ?’’ बारली सँवरीसे कहली।

‘‘काल्हु समुझाइब, बारली। अबही त रामायन शुरूए भइल बा।’’ सँवरीकहली आ पमली के चूँटी काटि के हँसे लगली।

 

 

 

(3)

 

सँवरी के नइहर अइला जब एक महीना भइल त केसर अपना ससुरारीअइले। उनुका के देखि के सँवरी खुशी के मारे झूमि गइली। ना त उनुकाइयाद में ऊ सुखाइल जात रही। सँवरी केसर के गोड़ छूअली। कमरा में ओहघरी केहू ना रहे। केसर गते से उनुका के आपन करेजा से लगावते पूछले, ‘‘तब हमरा बिना मन लागत रहे ?’’

‘‘इचिको ना।’’ सँवरी कहली आ केहू के आवे के आहट सुनि के जल्दीसे हटि गइली।

नयका पाहुन के अइला से माई-बहिन के काम करते-करते डाँड़ दुखगइल रहे। बाकिर सँवरी खूब सजि-धजि के केसर के आगा-पीछा डोलेलगली।

दोसरा दिन बिमली, पमली आ बारली के लिआवे उनुका घरे गइली।

सँवरी चाह बनावत रही। आवते पमली उनुका के पीछे से पकड़ि केहंसते पूछली,‘‘तब सखी, काल्हु नीमन से सूतलू नू ? ना त पहिले तहरानीने ना लागत रहे।’’

‘‘तब का, हेतना दिन के बाद त काल्हु सइंया के बाँह में अपना आपकेबेचि के सूतल रहनी हा।’’ सँवरी चाह में इलाइची डाल, मुसुकाते गते सेकहली, तले बारली उनुका प खीसिया गइली,‘‘तू हमनी कुँआर लइकी केसामने असहीं बोलत बाड़ू। सचो बिआह होला के बाद लइकी मुंहफटहा होजाली सन।’’

‘‘आछे बारली, खिसिया मत… खिसिया मत…। चलऽ सँवरी, जीजाजी के लिआवल मिठइया खिआवऽ। सभ अपने खइबू ?’’ पमली बात पलटली।

सँवरी मिठाई देत फेरू पमली से हँसी कइली,‘‘पमली, आजु तू बड़ासुन्नर लागत बाड़ू। मन करत बा तहरा के चूमा ले लीहीं।’’

‘‘अरे बाप रे, तू हमरा के चूमा काहे लेबू ? जीजाजी आइले बानीं। जाकेउकां के लऽ। उहो एक सई आठ बार।’’ पमली मिठाई खाते हँसि के बोलली।

‘‘हेतना हाली में त मुँहे दुखा जाई। बुझाता एहिजा से तहरा के जलदियेभगावे के पड़ी।’’

‘‘अरे बाप रे बाप ! के ई झंझट में पड़ी। एगो त बिआह करे खातिरहोतना तिलक दहेज द। फेनु दोसरा के सास, ससुर, मरद, देवर आ ननदमानऽ। दहेज में मिलल सामान के उपयोग दिन में ससुरार के लोग करेलाआ लइकी के उपयोग राति में लइका करेला । माने कि लइका के दूनों हाथमें लड्डू रहेला।’’ पमली खिलखिला के कहली।

‘‘इहे लड्डू खाये खातिर तसभ लइकी ललचाली सन।’’ सँवरी पमली के गाल प चूँटी काटि के हंसतेकहली। फेरू बोलली,‘‘जा, जीजाजी से बतियावऽ लोग।’’

पमली-बारली खुशी से केसर लगे जाके उनुका के परनाम कइली जा।

‘‘रउवे लोगिन सँवरी के सखी हईं जा ?’’ केसरो दूनों जानी के परनामकरते पूछते।

‘‘हँ, एकदम पकिया सखी।’’ बारली कहली।

‘‘बइठीं जा। ई घर में त हमरा से बोले-बतियावेवाला केहू हलहीं नइखे।बिना साली के ससुरारी ना सोभेला। हमार छोटकी साली त हमरा से लजातरहल बाड़ी। अब रउवे लोग आके हमार मन लगाईं जा।’’ केसर बइठतेकहले।

‘‘निहचिन्त रहीं जीजाजी, जब तलुक रउवा रहब, हमनी के रोज आकेराउर मन लगाइब जा।’’ पमली बइठते कहली। साथे बारली भी बइठि गइली।

‘‘रउवा लोग पढ़ेनी जा ?’’ केसर पूछले।

‘‘हँ। आई0 ए0 में हम।’’ पमली कहली।

‘‘आई0 एस0 सी0 में हम।’’ बारली बोलली।

‘‘रउवा लोग कॉलेज में पढ़ेनी जा, त पेयार करत होखब जा ?’’ केसरमजाक कइले।

‘‘जीजाजी, हमनी के कॉलेज पढ़े जानी जा, पेयार करे ना। आ जबतकले हमनी के कॉलेज के कवनो लइका से पेयार करब जा, तबहीं कॉलेजगइल सफल होई। अइसे ना ?’’ बारली चट से जवाब देली।

‘‘ना तऽ।’’ केसर अपने लजा गइलें।

‘‘जीजाजी, रउवा कतना पढ़ल बानी ?’’ पमली पूछली।

‘‘हम त बी0 ए0 पास बानीं आ नोकरी करत बानीं।’’ केसर घमंड सेकहले।

तबहीं सँवरी ओहिजा चाह-बिस्कुट लेके अइली। केसर के चाह के कपधरावते उनुका से पूछली, ‘‘बतिअइनीं हमार सखी से ?’’

‘‘तहार दूनों सखी बड़ा लजात बाड़ी।’’ केसर चाह लेते कहलें।

‘‘ई दूनों जानी ना लजाली जा। ई लोग त हमरा से अइसन-अइसनमजाक करेली जा कि हम पानी-पानी हो जाइला।’’ सँवरी पमली आ बारलीके चाह देते आ खुद चाह के कप लेले केसर लगे बइठते कहली।

‘‘सँवरी,बिस्कुट खा ना। बड़ा बढ़िया बा।’’ बारली बिस्कुट खाते कहली।

‘‘अरे, पहिले हमरे के खाये दीहीं ।ना त बाद में ई हमरा के खाये लगिहें ।’’ केसर एगो बिस्कुट उठावते सँवरी के ताकते कहलें।

‘‘तब हमनी के जात बानी जा, जीजाजी काहे से कि रउवा अभी सँवरीके खाये के मन करत होई।’’ पमली खाली कप रखते कहली।

‘‘देखनीं नू, पमली का कहली हा।’’ सँवरी केसर से कहली।

‘‘ना जी अभी ना, राति में खाइब।’’ केसर के बात प पमली-बारली लजागइली।

‘‘आछा, तीनों सखी में कबो झगरा भइल बा की ना ?’’ केसर अपनाओंठ तरे खइनी रखते पूछले।

अबहीं सँवरी कुछ कहती, तब ले पमली कह देली,‘‘जब तकले हमनीके झगरा ना करेनी जा, तब तकले हमनी के खने ना पचेला।’’

‘‘आछा… रूकीं आवत… बानीं।’’ केसर मुंह में थूक भरले बहरी चलिगइले।

‘‘पमली, तू झूठ काहे कहलू हा ?’’ सँवरी पूछली।

‘‘ना त इहां के हमनी के बीच झगरा करवा देब।’’ पमली दुआरी देनेताकते गते से कहली।

‘‘हँ, ई तू बात दिमाग के कहलू हा।’’ बारली पमली के बड़ाई कइली।

‘‘रउवा लोग जब तकले झगरा ना करेनीं जा, तब तकले खने नापचेला ?’’ आवते केसर कहले आ ठठा के हँसे लगलें।

‘‘रउवा सभे बतिआईं। हम जात बानीं।’’ सँवरी कहि के जूठा कप ले के चलि गइली।

‘‘तब जीजाजी, बिआह में रउवा खूब दहेज मिलल हा नू ?’’ बारली पूछली ।

‘‘कहँवा खूब मिलल हा। हम त पूरा ठगा गइनीं। हमरा लेखा कमासूतलइका के खाली एक लाख रूपिया आ थोड़की सा सामान मिलल हा। हमरेसंघतिया के चार लाख रूपिया आ खूबे सामान मिलल हा।’’ केसर नाकीधोअते कहलें।

‘‘त काहें ना रउवा पेयार क के बिआह कइनीं हा। खूबे मिलीत।’’ पमलीकहली।

‘‘पेयार हम एगो लइकी से कइले रहली, बाकिर ओकर बाप एगो रूपियाना देत रहे।’’ केसर अपना मन के बाति कहि देलें।

‘‘माने कि रउवा पेयार के रूपिया पे तउलले रहनीं हा ? इ कइसन पेयार ह ?’’ बारली कहली त केसर अचकचा गइले । बोलले, ‘‘अब भर उमिर पेयारे ना नू काम करी ? खाहूँ के त कुछु चाहीं।’’

‘‘त का एक लाख रूपिया में रउवा जिनिगी भर खा लेब ?’’ पमली सवालदगली।

‘‘ऊ त बिआहे घरी खत्म हो गइल…।’’

‘‘तब आगे…।’’

‘‘ससुरारी बड़ले बा। ओइसे अभी त राजदूत मिलले नइखे आ जवनसामानों मिलल बा उहो सभ घटिये बा…।’’ केसर लगले दहेज में मिललसामान के सिकाइत बतियावे।

बारली झूठो आपन घड़ी देखते उठ गइली, कहली,‘‘आछे जीजाजी,हम जात बानी। गणित के टिसनी पढ़े जाये के बा।’’

‘‘हमहूँ जात बानी।’’ जवरे पमली भी उठि गइली।

‘‘आवत रहब जा।’’ केसर कहले।

दूनों जानी हँ कहि के चलि गइली।

सड़क प बारली पमली से कहली,‘‘देखऽ लू नू, जतने दहेज मिलल,ओतने कम मिलल के रोअल।’’

‘‘हँ देखऽ नी। बाकिर ई बात सँवरी से जन कहि हऽ।’’ पमली बोलली।

‘‘एतना बोका थोड़े बानीं।’’ बारली कहि के अपना घर देने चलि गइली।

सँवरी अयनक के सामने खाड़ हो के बाल झारत रही। पीछे से केसरआके उनुका के पकड़ि लेले आ आपन ठोड़ी उनकर कान्हा प रखते कहलें, ‘‘आजु तू बड़ा सुन्नर लागत बाडू।’’

‘‘छोड़ीं ना, केहू देख लीहीं।’’ सँवरी अपना के छोड़ावते कहली।

‘‘छोड़ देब त कबो पकड़ऽबो ना करब। कह देत बानीं। का तहारमाई-बाबू जानत नइखन कि उनुकर दमाद उनका बेटी जवरे का करेलन।’’

‘‘जाने के त सभे जानेला। बाकिर खुलेआम त केहू कुछ ना नू करेला ?’’

‘‘तहार बार बड़ी करिया आ लहरदार बा। मन करत बा, एहिसे बन्हाइलरहीं।’’ केसर सँवरी के डाँड़ तक घना बार केचूमि के कहलें।

‘‘तब रउरा हमार चोटिये में बन्हा जाइब।’’ सँवरी हँसते केसर से अलगेहो गइली।

ऊ केसर केलेके पमली आ बारली का घरे घूमे गइली। आवे घरीपमली के माई केसर के हाथ में एक सइ एकावन रूपिया आ बारली के माईदू सइ एकावन रूपिया दिहली।

घर आके केसर सँवरी प लगले रंग झाड़े,‘‘कहत रहलू हा कि हमारसखी बड़ा अमीर बाड़ी। बाकिर हमरा मिलल का, बस, चार सइ दू रूपिया।सबसे अमीर त बारली बाड़ी। बाकिर उनकरो माई भिखारी अइसन हमराके दू सइ एकावन रूपिया धरा देली हा।’’

एतना बात प सँवरी के देहि में आगि लाग गइल,‘‘जेतना हमार दूनों सखी के माईसे भइल हा, ऊ ओतना दिहली हा जा। बारली रउवा के बिआहमें सोना के अंगुठी ना देले रहली ?’’

‘‘हूँ, सोना के अंगुठी देले रही। खाली नांव खातिर। एकदम हलुक रहे।हम त सोचले रहनीं कि हमरा फुल पैंट-कुरता के कपड़ा मिली। बाकिर गइलसभ बेकार भइल।’’ केसर झंझुआ के कहलें।

‘‘त कोई हियाँ इहे सोचके का रउवा जाइला कि ऊ हमरा के कपडा़ –लतादिहें ? राउर संघतिया त हमरा के मुँह देखाई में पांच गो रूपियो ना दिहलेरहलें जा।’’ सँवरी पलटि के जवाब देली।

‘‘चलत बाड़ू हमरे प हँसे। चलनी दूसे सूपली के जेकरा में सहस्सर गोछेद।’’ केसर खखुआ के कहलें।

सँवरी बाति आगे ना बढ़वली, आ आँखि में लोर भरि के चुप हो गइली।

बिमली ई सभ बात सुनि ले ली। जाके पमली-बारली से कहि दिहली। ई सुनिके दूनों जानी के बड़ा दुख लागल। बारली, बिमली के लेमचूस दे के चेता देलीकि ई बात कोई से जन कहिहऽ। बिमली लेमचूस खाते घर चलि गइली।

‘‘हमरा विस्वास नइखे होत कि जीजाजी अइसे कहब। हमनी के अतनाउहां के मान-आदर कइनी हा जा, आ बदला में…!’’ पमली दुखी मन सेकहली।

‘‘देखऽ, जीजाजी जवन कपड़ा के बाति कहले बानीं, ऊ हमनी के पइसामिला के दे दिहल जाई । ना त उहाँ के हरमेसा सँवरी के ओरहन देब ।’’ बारलीकहली।

‘‘अब त उहाँ के हमरा जीजाजी कहे के मन नइखे करत।’’ पमलीखीसिया के कहली।

‘‘ई तू का कहत बाड़ू ? कतनो त हमनी के सँवरी के सखी हईं जा,बाकिर उहाँ के उनुकर सोहाग हईं। कबो ई बाति मत कहिहऽ, ना त सँवरीके बहुते दुख लागी। जीजाजी होली तकले रहबे करब। कपड़ा कीनि के होली के दिन उहाँ के दे देबे के । अब तू खीसिया मत।’’ बारली पमली केसमुझवली।

केसर के ससुरारी अइला जब दस दिन भइल, त ऊ अपना घरे जायेके कहलें। बाकिर सासउनुका के होली तकले रोक लिहली। उनुका रूकतेदेखि के सँवरी खिलि गइली।

पमली-बारली बाजार जाके एक हजार रूपिया मेंकेसर खातिर फुलपैंट आ कुरता के कपड़ा कीनली जा।

होली के दिन केसर सँवरी, पमली, बारली आ बिमली के जवरे खूबेहोली खेलले। होली खेलला का बाद पमली आ बारली रंगीन कागज से मढ़लएगो डिब्बा में फुल पैंट-कुरता के कपड़ा केसर के देते कहली,‘‘लीं जीजाजी,हमनी के तरफ से होली के तोफा।’’

‘‘धन्यवाद।’’ केसर डिब्बा लेते खुशी से कहले।

बिहान भइला केसर सँवरी से कहले,‘‘सँवरी, हमार सामान सरियादीहऽ। काल्हु घरे जाइब।’’

‘‘आछे।’’ सँवरी उदास मन से कहली। फेनु पूछली,‘‘आछा, काल्हुपमली आ बारली रउवा के का देले रहली हा जा ?’’

‘‘का जाने। देखत बानी।’’ केसर कहि के डिब्बा खोलि के देखलें आ फुलपैंट-कुरता के कपड़ा देखते खुशी से झूमि गइले,  ‘‘अरे बाह! बढ़िया कपड़ा बा। महंगा होई। हमरा के कपड़ा देबे के कहींतूहे त ओह लोग के ना नू कहलू हा ?’’ केसर सँवरी पर शके तकलें।

‘‘हम काहें कहे जाइब। ऊ दूनों जानी अपने चल्हाँक ह। बाकिर कपड़ाआछा बा।’’ सँवरी कपड़ा देखि के कहली।

‘‘कहीं हम एहिजा से जाइब त हमरा प्रेम रोग मत हो…।’’

‘‘कवनो रोग के नाँव मत लीहीं।’’ सँवरी केसर के ओंठ प हाथ रखतेकहली।

‘‘अरे, हमरा प्रेम रोग होई, तबे नू तहरा लगे हम हाली से आइब।’’केसर सँवरी के हाथ हटावते मुसुकाते कहले।

‘‘तब जात बानीं माई से कहे…।’’

‘‘कवन, प्रेम रोग के बाति…?’’ केसर सँवरी के बात काटि के हँसि से पूछले ।

‘‘ना रउवा काल्हु जाये वाला।’’ सँवरी हंसि के माई लगे चलि गइली।

ऊ माई से केसर के जाये वाला बात कहलीं। माई केसर के बिदाई देबे खातिर इंतजाम करे लगली।

भोरही केसर के कपड़ा रूपिया देके बिदाई दिआइल।

‘‘आछे माईजी, बाबूजी, हम जलदिये सँवरी के लेबे आइब।’’ केसर कहिके सास-ससुर के गोड़ छुअले आ चलि गइले।

सँवरी मने-मन उदास हो गइली। पमली-बारली उनुका घरे अइली।

एने – ओने  ताकि के बारली सँवरी सेपूछली, ‘‘संवरी, जीजाजी कहवां बानी ?’’

‘‘चलि गहनीं।’’ सँवरी गते से कहली।

‘‘ओहि से मुरझाइल बाडू ।’’ पमली हँसि के कहली।

‘‘देखऽ, आजु हमार बिआह के फोटो साफ होके आइल हा।’’ सँवरी दूनों जानी के एलबम देते कहली।

पहिले फोटो देखे के फेर में पमली-बारली अपने में हाला करे लगलीजा।

‘‘देखऽ, तू लोग चुप-चाप फोटो देखऽ जा। हाला जन करऽ।’’ सँवरीतनी खीसिया के बोलली।

‘‘तहरा जीजाजी के इयाद में रोआई छूटत बा त जाके चादर तान केसूतऽ।’’ बारली हँसते कहली।

फोटो देखला के बाद पमली कहली,‘‘सँवरी, हमनी के चार-चार गोफोटो ले लेत बानी जा।’’

‘‘आछे, ठीक बा। अभी हमार माथा मत खा लोग…।’’

‘‘हमार फूलकुमारी, तू आंखि बंद क के चुपचाप सूतऽ, आ जीजाजी केइयाद करऽ। हमनी के जात बानी जा।’’ पमली –बारली, सँवरी के एगो चदरदेके हँसते चलि गइली। केसर के गइला के बाद सँवरी के इचिको मन नालागत रहे आ केसर के अपना घरे मन ना लागत रहे।

दू महीना बाद ऊअपना माई से कहलें,‘‘माई, तोरा ढेर काम करे के पड़त बा नू।’’

‘‘हँ, हम जानत बानीं कि तू का कहल चाहत बाड़े। तोर ससुर बिआहमें त राजदूत देबे से हटि गइल रहे, बाकिर अबकी दोंगा में हमरा राजदूतमिले के चाहीं। तू कान खोलि के सुनि लें।’’ माई बरतन मइसते कहली।

‘‘माई, ऊ लोग दीहें…?’’

‘‘दीहें काहे ना। जब उनुकर बेटी के नरेटी चिपाई त जरूरे दीहें। तूअपना ससुर से राजदूत के बात कहले रहलऽ ?’’ बाऊजी पूछले।

‘‘ना, कहले ना रहलीं हा, बाऊजी। बाकिर कहल चाहत…।’’

‘‘आगे मस्तानी आ पीछे पछतानी। सँवरी के पेयार में गिरफ्तार रहे ईछोकड़ा। सुन ले, केसरा, अपना मेहरारू के अँचरी से बन्हाइल मत रहिहें। जेतना लेबे के होई सँवरी से कहि-कहि के अपना ससुर से मँगिहें ।’’ माई केसर के बात काटि के खिसिया के कहली।

क्रमशः

 

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