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– नीतू सुदीप्ति ‘नित्या

 

ओझा प्रकाशन

जमशेदपुर भोजपुरी साहित्य परिषद

विजय पर्व

(भोजपुरी उपन्यास )

उपन्यासकार : नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’

प्रकाशक : जमशेदपुर भोजपुरी साहित्य परिषद्

होल्डिंग नं . 102, जोन नं . 11,

बिरसानगर, जमशेदपुर . 831019, (झारखंड)

प्रथम संस्करण : मई,2018

सर्वाधिकार :© नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’

ई.मेल : [email protected]

VIJAY PARV

A Bhojpuri Novel by Nitusudipti‘nitya’

सर्वाधिकारसुरक्षित :

यह पुस्तक या इसका कोई भी भाग लेखिका की लिखितअनुमति के बिना पूर्णयाआंशिकरूपसेइलेक्ट्रानिकअथवायांत्रिक (जिसमें नाटक /फिल्म/सीरियल/फोटोग्राफिकरिकार्डिंग/ पीडीएफ फारमेट भी सम्मिलितहै) अभिलेखनविधिसेयासूचनासंग्रहतथापुन: प्राप्तपद्धति (रिट्रीबल) अथवाअन्यकिसीभीप्रकारसेपुन: प्रकाशित, अनूदित या संचारित नहीं किया जासकता।

समर्पण

दिल्ली के दामिनी के जवरे

विश्व के ओह तमाम लइकिन के

जे सँवरी, पमली आ बारली के रूप में

गुजर गइल बाड़ी जा

आ अब आपन अधिकार

ले आपन भविष्य सुधारत बाड़ी जा

सादर समर्पित

प्रकाशकीय

जमशेदपुर भोजपुरी साहित्य परिषद् के प्रकाशन क्रम के आगे बढ़ावत  53वाँ फूल के रूप में पहिला बेरि महिला रचनाकार श्रीमती नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’ के उपन्यास ‘विजय पर्व’ अपने सभे का सोझा बा। ई उपन्यास सन्  2005  से  2015  तक ‘संवरी’ नाम से भोजपुरी-हिन्दी के साहित्यिक पत्रिका ‘निर्भीक संदेश’ में धारावाहिक प्रकाशित होत खूबे ख्याति हासिल कइलस। अब ऊ मामूली बदलाव के साथ अपना उपरोक्त नामकरण से एक बेरि फेनु पाठक वृंद का सोझा परोसल गइल बा। उमेद बा, पाठकगण एकर भरपूर स्वाद लीहें आ बेहिचक आपन बेलाग प्रतिक्रिया परिषद् भा रचनाकार के पता पर जरूर भेजिहें।

 नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’ सन्  1997  से साहित्यिक लेखन कार्य शुरू कइलीं आ बहुते कम समय में ई भोजपुरी आ हिन्दी के साहित्यिक क्षेत्र में खूबे ख्याति अर्जित कइली। नीतू के रचना देश भर के कई प्रमुख पत्र-पत्रिकन में प्रकाशित होत रहल बाड़ी स। एह पुस्तक के पहिले इन्हिकर दूगो हिन्दी कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुकल बा। ‘नित्या’ जी एगो संवेदनशील रचनाकार बाड़ी। समाज में हो रहल नारी उत्पीड़न के रोज नया-नया घटना इन्हिका से देखल ना गइल तब सन्  1999  में विवश होके आपन धारदार कलम उठवली आ ‘संवरी’ उपन्यास लिखे के क्रम शुरू कइलीं। इहे ‘संवरी’ के रूप में इन्हिकर साहित्यिक पौध आज ‘विजय पर्व’ बनि के फेड़ अस खाढ़ बा। अंत में, परिषद् के ओर से ओह तमाम लोगन के प्रति आभार व्यक्त करत बानी, जेकर कवनो ना कवनो तरह के सहयोग एह पुस्तक प्रकाशन में मिलल बा।

 इति शुभम्।

 डॉ0 अजय कुमार ओझा

( डॉ0 निर्भीक जयंती )

21 मई, 2018 ई.

प्रधान सचिव, जमशेदपुर भोजपुरी साहित्य परिषद्

भूमिका

तेरे माथे पे ये आँचल तो बहुत ही खूब है लेकिन

तू इस आँचल से इक परचम बना लेती तो अच्छा था।

– मजाज़

अँचरा से परचम बनल ‘सँवरी’ उपन्यास के ‘विजयपर्व’ के रूप में  देख के मन निहाल हो गइल।पिछला दस बरिस ले भोजपुरी पत्रिका ‘निर्भीक संदेश’ में नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’ के ‘सँवरी’ नाँव से जवन उपन्यास किश्त –दर –किश्त पढ़े के लगातार मिलल आज ओही छोट-छोट टुकड़न से संवरल संपूर्ण उपन्यास ‘विजय पर्व’ एगो बड़ संदेश लेके अवतरित भइल बा। एह दुनिया के आधी आबादी माने लइकिन आ मेहरारून के दुनिया अब कमजोर नइखे। ई अपना भूमिका आ हक के निर्णय ले सकतिया ओकरा खातिर लड़ सकतिया।

औरत हूँ मगर सूरत – ए – कोहसार खड़ी हूँ,

इक सच के तहफ्फुज के लिए सबसे लड़ी हूँ।

– फरहत जाहिद

‘विजय पर्व’ के संपूर्णता से पढ़के नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’ के रचनाशीलता परबहुत विश्वास जागता। मेहरारून आ लइकिन के सामाजिक-सांस्कृतिकआ आर्थिक समस्या, ओकर पीड़ा आ बेबसी, एह सभ के प्रतिसंवेदना आ जागरूकता खातिर लेखिका के लगे बहुते बारीक दृष्टिबा। आजो समाज में लइकिन के केतना रूप आ आयामन में उत्पीड़न सहे के पड़ेला, टूटे आ जुड़े के पड़ेला आ सम्मान के जीवन खातिर गहन संघर्ष करे के पड़ेला, एकर चित्रण बा ‘संवरी’, ‘पमली’ आ ‘बारली’ के जीवनगाथा। उपन्यास में समाज के दकियानूसी सोच, मेहरारून लइकिन के प्रति कट्टर पूर्वाग्रह, शोषण के विभिन्न रूप सभ उजागर हो रहल बा। भारतीय समाज में जवान होत आ आपन जिनगी गढ़त लइकिन के जीवन में कतना विकट चुनौती होला एकर बहुत सटीक चित्रण उपन्यास ‘विजयपर्व’ में लेखिका कइले बाड़ी।

पितृसत्तात्मक समाज में मेहरारू हर काल में शोषित, पीड़ित आसंघर्षशील रहल बाड़ी। समाज के शक्ति सदैव पुरूषन के हाथ मेंरहल आ ऊ कवनो ना कवनो हथकंडा अपना के मेहरारून के मान-मदर्नकरत रहलन। शोषक – शोषित के जवन घिनावन बेवस्था भारतीयसमाज के खोखला करत रहल ओकरा भीतर कइएक उपबेवस्थाबा । जइसे ‘मालिक-मजूर’, ‘स्वामी-गुलाम’, ‘पूँजीपति-श्रमिक’, ‘स्त्री- पुरूष’ आदि। सब बेवस्था त खुल्लम-खुल्ला उजागर आ अपना पूरा संरचना के साथे एकरा में स्त्री-पुरूष के ‘शोषित-शोषक’ उपबेवस्था बहुते कुरूप आ छल-प्रपंच से भरल बा। एह में बहुत घातक साजिश आ गहीर चाल चलल गइल बा। संबंधन आ रिश्तन के सुन्नर डोर में बान्ह के, ओह रिश्तन में प्यार आ संवेदना के महिमामण्डित क के मेहरारून के देह, मन आ धन के शोषण कइल जा रहल बा।

मेहरारून के कोमलता आ संवेदना, जे ओकर सबसे बड़ शक्तिहोला, ओकर सुन्दरतम विशिष्टता होला – ओही प साजिशी आक्रमण कइल गइल बा। साँच बात त ई बा कि प्रेम आ संवेदना सम्मान के सहोदर होले जो एक-दोसरा बिना रह ना सकेले। विडम्बना रहल कि पुरूष नारी के खाली प्रेम-संवेदना के देवी बना त दीहलस। बाकिर, सम्मान न समर्पित कर सकल ओकरा मात्र ‘भोग्या’ मान लिहलस।

देह के शुचिता के आगे नारी-सम्मान के कवनो आधार ना मनलस, देह से बेसी नारी के कवनो अस्तित्व ना बुझलस। एह सच्चाई के मखमली शब्दन आ रिश्तन के नांव से ढाँपे के कोशिश कइल गइल बाकिर साँच त साँच होला – ऊ आपन कुरूप चेहरा उघाड़िए देवेला –

औरत अपना-आप बचाए तब भी मुजरिम होती है।

औरत अपना-आप गँवाए तब भी मुजरिम होती है।।

बहुते संतोष आ खुशी के विषय बा कि हर काल में, खास कके शिक्षा तकनीक के दौर में पुरूष काफी हद तक समझदार, सजग आ सचेत हो रहल बाड़न। सूरत–ए-हाल बदले में समय लागी । शोषक से सहयोगी बने के बीच के रास्ता बहुत कठिन आ उबड़ – खाबड़ होला। बाकिर, जब मुसाफिर तैयार होला त मंजिल जरूरे मिलेला।

नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’ के ई उपन्यास एह सुन्दर बदलाव के संकेतदेता तबे त बिटेस के खिलाफ बारली के भाई, बाबूजी आ भाई के दोस्त लोगिन के जमात भी एह स्थिति के बदल डाले के बीड़ा उठवले बा। नीतू के उपन्यास ‘विजय पर्व’ समाज आ इन्सान में आस्था जगावता, आशा के किरण के संकेत देत बा। ‘गरिमावादी’ दर्शन के दीया जरावत एह उपन्यास के भोजपुरी साहित्य में प्रवेश, एह बात के घोषणा बा कि मेहरारू अपना पर होत जुल्म, अपमान, बंधन आ शोषण के पहचान कर लेले बाड़ी। अपना पीड़ा आ बेबसी के प्रति जागरूक हो के तैयार हो रहल बाड़ी एह बरअक्स आपन नयकी भूमिका में – नया तकनीक आ जुगत के साथे। नारी के कलम से नारी के पीड़ा आ साहस के गाथा ‘विजयपर्व’ भोजपुरी गद्य साहित्य के नयकी ऊर्जा आ दृष्टि से समृद्ध करी – आशा बा नीतू के अगिली रचना आउर मोट, मजिगर आ भाषा के कसावट के साथे आई।

अनुजा नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’ के लेखनी के बहुते बधाई आ ढेरेशुभकामना। असही इनकर लेखनी निरंतर चलत रहो… माईभाषाभोजपुरी के अंचरा भरत रहो।

बहुत शुभकामना !

डॉ0 संध्या सिन्हा

सह सचिव

( जमशेदपुर भोजपुरी साहित्य परिषद )

आपन बात

बंद आंखि से देखल सपना जब हकीकत बनि के पूरा हो जाला त अनघा खुशी होला। आजु उहे खुशी हमरा मिल रहल बा – धारावाहिक उपन्यास ‘सँवरी’ के नया नांव ‘विजय पर्व’ के किताब रूप में छपल देखि के। ई खुशी बहुते अनमोल बा।

1999  से  2002  के बीच ई उपन्यास लिखाइल रहे। हम एकरा के हिन्दी से भोजपुरी में बहुते बार अनुवाद कइली।  2005  से ‘निर्भीक संदेश’ में ‘सँवरी’ शीर्षक से छपे लागल। छपे के प्रक्रिया बहुते धीम रहे। बाकिर पूरा हो गइल  2015  में।

हम  1997  से लिखत बानी। छोटे-छोटे कहानी–कविता। टी0 बी0 आ अखबार में हरमेशा दहेज हत्या से मरल-जरल लइकी के खबर, कुंआर लइकी के माई बन जाए के आ ओकरा बाद आत्महत्या के खबर आ लइकी-मेहरारू के इजति लूट जाए के खबर खूबे छपात आ देखावल जात रहे। आजो बदस्तूर ई जारी बा। हम बहुत संवेदनशील बानी। ई सभ खबर देखि-पढ़ि के हमार रोआँ-रोआँ सिहर जात रहे आ मन में खूबे बेचैनी मचल रहत रहे। पाशविक स्थितियन के शिकार लइकिन हमरा मन में आगि लगवले रहत रहिसन। लोर बनि के आपन-आपन सवाल के तलवार हमरा प भिड़वले रहत रहिस। उहनिए के दुख से व्यथित हमरा कलम से आगि जइसन बात निकले लागल।

हम सच कहत बानी – ओइसन जहरीला संवाद लिखे में हम मने-मने खुदे डेराइल रहीं बाकिर एगो लेखक के कहल बात कि ‘लेखक बवाल से ना डेराये’ से मन थिर भइल रहे।

हम आदरणीय श्री सुरेश कांटक जी के धन्यवाद देत बानी। उहें के तेरह बरिस पहिले ई उपन्यास के ‘निर्भीक संदेश’ के चउखट तक पहुंचवले रहीं। ‘सँवरी’ छपे में बड़ा देर होत रहे आ हमार घबराहट बढ़ल जात रहे। अजय भइया (निर्भीक संदेश के सम्पादक) हमरा के धीरजा धरावत रहनीं कि चाहे कुछु हो जाए हम एकरा के पूरा छापिए के रहब। उहां के आपन वादा पूरा कइनीं। हम आदरणीय डॉ0 अजय ओझा जी के हृदय से आभारी बानीं। हम आभारी बानीं डॉ0 विष्णुदेव तिवारी जी के जेकरा बहुमूल्य सुझावन से ‘विजय पर्व’ के वर्तमान रूप निखारे में बहुत मदद मिलल। हम कृतज्ञ बानी आदरणीया दीदी डॉ0 संध्या सिन्हा जी के, जे एह उपन्यास पर आपन विद्वतपूर्ण भूमिका लिख के हमार मान बढ़वले बाड़ी। अंत में, अपना पाठक लोग के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त करत बानी, जे धारावाहिक रूप में ‘संवरी’ के दस बरिस ले पढ़ल।

अब हाथ जोरि के विनती बा अपने सभ से कि एह ‘विजय पर्व’ प आपन नेह-छोह बनाईं आ एकरा प आपन बेलाग प्रतिक्रिया दीहीं ताकि भविष्य में हमार कलम से कुछु आउर बढ़िया रचना निकले।

2002  के ही ऊ समय रहे जब लखनऊ के डाक्टर हमरा के छव महीना के मेहमान बतवले रहे। हमरा दिल में सुराख (छेद) बा एकरा वोजह से। हमरा भिरी समय कम रहे आ ई उपन्यास पूरा करे के रहे। रात दिन लिखि के एकरा के हम हाली से हाली पूरा करत रही ई सोचि के कि यदि हम मरि जाइब तऽ जवन बात हम कहल चाहत बानी ऊ सब हमरा जवरे चलि जाई। एही से राति के  12  बजे लिखल बंद करत रहीं आ  3  बजे भोर से फेनु लिखल शुरू करत रहीं। शायद ई हमरा अनवरत लेखन के ही चमत्कार रहे कि आजो हम खाढ बानी। अब त हमरा खुद से ई वादा बा कि हमार नाता जइसे दवाई से मृत्यु तक रही, ओइसे कलमो से रही।

 एह उपन्यास में जेतना जगह कहाउत के प्रयोग भइल बा ऊ सभ हमरा माई के कहल ह। उहां के सादर परनाम करत श्रद्धांजलि।

आगे श्री नारायण के जइसन मरजी।

नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’

19 . 10 . 2017( दीपावली )

(1)

सँवरी, पमली आ बारली तीनों सात-आठ बरिस के छोट-छोट लइकीरहीं। ऊ तीनों एक दोसरा के सखी रही। ओह लोग के बीच ऊँच-नीच के कवनो भेद-भाव ना रहे। खाली सखियारो रहे एक दोसरा खातिर। खेल-कूद, पढ़ाई-लिखाई आ खाना-पीना सभ एके जवरे होत रहे। अइसन सखियारो देखि के सभे कहे कि ई बड़ हो के खूबे नाँव कमइहें स।

एक दिन पमली खेलते खेलत कतहूं से गुलाब के दू गो पौधा उखाड़ केले अइली। सोचली, कतहीं लगा दीहीं। ऊ ई बाति सँवरी आ बारली केबतवली। बारली सोंच के कहली,‘‘नदी किनारे किरिसना जी के मंदिर बा नू, ओहिजे बगल में हमनी के जमीन बा ओह में फूल के खूब गाँछी लागल बा। काहें ना ओहिजे ई गुलाब के पौधा लगा दिहल जाउ, जब एह में फूल खिली त भगवान जी पर चढ़ावल जाई।’’

सँवरी, पमली के ई बाति ठीक लागल। तीनों जानी मंदिर गइली। जमीनखोनली आ बारली नदी में से पानी ले अइली। आ खुशी-खुशी दूनों गुलाब के पौधन के लगा दिहली।

पौधन के लगा के बारली कहली, ‘‘ई पौधा हमनी के सखियारों केनिशानी होइहें स, काहे कि हमनी तीनों मिलि के एकनी के लगवनी हा जा।जइसे – जइसे ई गुलाब के पौधा बड़ हाइे हें स, ओइसे -ओइसे हमनी के सखीयारों बढ़ी आ खूब गहिरा होई, ठीक नू ?’’

  ‘‘आजु से हमनी के एहिजे खेले के।’’ सँवरी कहली।

  ‘‘अब एकनी के देख-रेख हमनिये के करे के पड़ी।’’ पमली कहली।

ओही दिने से ऊ तीनों सखी ओह गुलाब के दूनों पौधन के सेवा मिलिजुल के करे लगली।

पनरह दिन बाद ओह में नया-नया टूसा निकलि आइल। टूसा देखि केतीनों जानी खूबे खुश भइली कि हमनी के लगावल पौधा लागि गइल।  गते – गते दिन कटत गइल। कुछ दिन का बाद ओह लोग के सेवा के फल लउके लागल। दूनों पौधन में तीन-तीन गो गुलाब के कली निकलि आइल।

ओह कलियन के देखि के तीनों जानी के खुशी के ठिकाना ना रहे। तीन-चार दिन बाद ऊ कली खूब सुन्नर-सुन्नर फूल बनि गइली स। लाल-लाल आ पीयर-पीयर गुलाब के फूल फुलाइल त बड़ा सोभत रहे। पमली के मन फूलन प लोभा गइल। मन कइलस कि एगो तूर लीहीं बाकिर बारली मना क दिहली,‘‘ना ना, तूरऽ मत, खिले द। ई हमनी के सखियारों के निशानी ह। असहीरहे द। खूबे बढ़े द।’’

   ‘‘काहे ना एह फूलन के काल्हु किरिसना जी प चढ़ा दीहीं जा। कुल्हमिला के छव गो फूल बा। तीनों आदिमी एगो लाल एगो पीयर फूल चढ़ा देबे के।’’ सँवरी खुश होके कहली।

   ‘‘ई बात ठीक कहलू हा। किरिसना जी हमनी के आसिरबादो दीहें।आखिर उहों के त सुदामा जी के संघतिये रहीं।’’ पमली फूलन के सुहरावते कहली।

   ‘‘ठीके त बा। काल्हु जन्माष्टमी ह। किरिसना जी के जन्म दिन। काल्हुजन्माष्टमी भूखे के आ इहे फूल चढ़ावे के। अबहीं ले हमनी के कवनो परब नइखी जा भूखल। अपना-अपना माई से पूछि लेबे के।’’ बारली अपना मन के बाति कहली।

दोसरा दिने तीनों जानी नहा धो के नया-नया फराक-सलवार पहिन केकिरिसना जी के मंदिर में गइली आ एक- एक गो लाल-पीयर गुलाब के फूल तूरि के किरिसना जी प चढ़ा के पूजा कइली। तीनों जानी मने-मने प्राथनों कइली, ‘हे किरिसना भगवान, जइसे रउवा सुदामा जी के संघतिया रहीं, ओसहीं हमनियों के एक दोसरा के सखी हईं जा। हमनी के सखियारों हरदम बनवले राखब। कबो अलगा जनि करब।’’

एकरा बाद तीनों जानी मिलि बाँटि के हलुआ खइली।

एही तरे दिन कटत गइल। खेलत-कूदत सेयान होखे लागल लोग।जइसे-जइसे गुलाब के दूनों पौधा बढ़त गइले स ओइसे-ओइसे ओह लोग के सखियारों बढ़त गइल। सँवरी, पमली आ बारली बड़ होखे लगली।

अब ऊ तीनों सोलह बरिस के सेयान लइकी हो गइली। रोज लेखाकिरिसना जी के मंदिर प पूजा करे गइली। पहिले ही लेखा ऊ दूनों गुलाब के पौधा खूब फूलाइल रहे सँवरी, पमली आ बारली एक-एक गो लाल – पीयर फूल तूरि के किरिसना जी के चरन प चढ़वली आ घीव के दीया बारि के एके साथे आरती उतरली।पूजा कइला के बाद गुलाब के भीरिये आपन-आपन पूजा के डोलचीध के बइठली आ बतियावे लगली।

   ‘‘जब से ई गुलाब के पौधा लगवले बानी जा, तब से एकर फूल किरिसनाजी के चढ़ावत बानी जा।’’ पमली गुलाब के पतई छुअते कहली।

  ‘‘आउर आगहूँ चढ़ावते रहब जा। ई किरिसना भगवान के किरिपे नू हकि हमनी केसखियारों अबही तक ले बनल बा, ना त छोटपन के सखियारोबड़ भइला प खतम हो जाला।’’ सँवरी कहली।

  ‘‘हमनी के सखियारों त बुढ़ारी तक ले चली।’’ बारली परसादी देतेकहली।

  ‘‘अब हमनी के बड़ हो गइनी जा। हमनी में समझदारी आ गइल।’’ सँवरी परसादी हाथ में लिहले आ मुँह में डालते कहली।

   ‘‘लागत बा, तू बिआह के तइयारी करत बाड़ू। एही से बड़ लेखा बोलतबाड़ू।’’ बारली हँसते कहली।

  ‘‘हमार बाबू त अठवें क्लास से लइका खोजत बाड़न । बाकिर मिलबेना कइल। माई मनो क देलस कि मैट्रिक क लीही ओकरा बादे बिआह होई। हम मैट्रिक पास होईं चाहे फेल, ओकरा बाद हमार बिआह होइये जाई।’’ सँवरी कहली।

   ‘‘त का तूं हमनी से दूर चलि जइबू ?’’ पमली पूछली।

   ‘‘धत् पागल। बिआह के मतलब ई थोरे भइल। ससुरा से अइबे करब।’’ सँवरी पमली के हाथ पकड़ि के कहली।

   ‘‘तब तहार बिआह जलदिये हो जाई। काहे से कि हमनी के दसवाँ मेंपढ़ते बानी जा आ पाँच-छव महीना में मैट्रिक के परीक्षा होइये जाई।’’ बारली उदास हो के कहली।

   ‘‘हँ, अबकी के लगन में बाबू हमरा के पार कइये दीहें। ऊ त बिआहखातिर रूपियों जुटावत बाड़न। कहेलन कि सँवरी तनी अउरी साफ रहित त कबे एकर बिआह हो जाइत। दू-चार गो लइका वाला हमरा के देखबों कइलन स बाकिर ऊ ढेरिखा तिलक आ दहेज के सामान मांगत रहन स। बाबू के भीरी अतना हइये नइखे, दीहें कहँवा से।’’ सँवरी आपन देह निरेखत कहली।

   ‘‘गोर-साँवर त अदिमिये नू होला। का बिना रूपिया आ समान लेलेबिआह ना होला।’’ बारली पूछली।

   ‘‘तू हूँ एकदमे पागले बाड़ू। आजु-काल्हु बिआह करे खातिर लइकी केमाई-बाबू भीरी खूबे रूपिया चाहीं, तबे ऊ अपना बेटी के बिआह क सकिहें। ना त कुँआर बेटी के घर में बइठा के रखिहें। रूपिया बिना कतने माई-बाबू आ बेटी जहर खा के मरि जात बाड़े। इहे हमनी के समाज के नियम भइल बा आजु–काल्हु।’’ पमली समुझवली।

   ‘‘तब काहें सभ केहू दहेज ना लेबे के भासन देवे ला ? अइसे होई त हमबिआहे ना करब।’’ बारली खीसिया के कहली।

  ‘‘तूं लोगन के बाति अब छोड़ि द। जहिया बिआह करे के होई, ओह घरीसेचिहऽ। अबहीं अपना पढ़ाई प धेयान द। कहेलू कि बड़का पुलिस अफसर बनब। ओकरा खातिर सभ विषय में जादा-जादा नंबर ले आवे के पड़ी।’’ पमली कहली।

   ‘‘हम त बड़का पुलिस अफसर बनबे करब, तू का बनबू ?’’ बारलीपमली से पूछली।

   ‘‘हमहूं मास्टरनी बनि जाइब।’’ पमली मुसुका के कहली।

   ‘‘त हम का बनब ?’’ सँवरी पूछली।

   ‘‘तू बबुआ – बुचिया के माई बनिहऽ।’’ ई कहि के पमली आ बारली एकेसाथे हँसे लगली।

   ‘‘अपने मास्टरनी आ पुलिस अफसर बनबू लोग आ हमरा के…।’’ अतना कहि के सँवरी, पमली आ बारली के चोटी खींचे लगली।

   ‘‘हमनी तीनों में से केहू के त बबुआ – बुचिया के माई बनही के पड़ी।’’ कह के पमली ठहाका लगवली।

   ‘‘रूकऽ, तहरा के अबहिये बतावत बानी।’’ सँवरी कहली।

   ‘‘ऊ अबही बाद में बतइहऽ, पहिले हलुआ खियावऽ। बड़ा जोर से भूखलागल बा।’’ पमली पेट टटोलते कहली।

   ‘‘एकदिन भूखल बाडू़ त अतना भूख लाग गइल ? आ जवन रोज होतनाखालू।’’ सँवरी हँसते कहली।

   ‘‘पमली, घबड़ा मत, अइसे त कृष्ण जन्माष्टमी के दिने राति में हलुआखाइल जाला, बाकिर हमनी के दिन में हलुआ खा लेब जा, त हरज थोड़े होई। किरिसना भगवान जानत नइखीं कि छोट-छोट लइका लइकिन के भूख कुछ जादे लागे ला।’’ बारली कहि के हँसे लगली।

   ‘‘माने कि तूं अबही छः महिनवे बाड़ू का ?’ सँवरी हँसते पूछली।

   ‘‘तहरा कोरा में बइठि के छः महिनवा का दू महिनवा बन जाईं।’’  हँसते-हँसत बारली अपना घरे से ले आइल फल-हलुआ देते कहली।

ऊ दिन बीत गइल।

गते-गते परीक्षा के दिन नियराये लागल। तीनों जानी पढ़े आ इयाद करेमें जीव जान से लागि गइल। बाकिर रोज एक बेर भेंट जरूर क लेसु। तीनों के माई लोग के मन में ई बात आवे कि एह तीनों के बीच झगरा करवा दीही।बाकिर सोचत रही लोग कि कुँआरे भर नू, बिआह भइला के बाद कवनकहँवा जाई के जानत बा, अपने छूटि जाई।

एही बीचे मैट्रिक के इंतहान शुरू हो गइल। सँवरी, पमली आ बारलीसबसे पहले मंदिर गइली। फेरू घर के बड़ लोग के आसिरबाद ले के परीक्षा देबे गइली।जब परीक्षा खतम भइल त आपन-आपन प्रश्न – पत्र देखा के एक दोसरासे पूछली, ‘बतावऽ तूं का लिखलू हा ?’

एक दिन परीक्षा के कमरे में तीनों जानी में मुँह फुलउवल हो गइल। एगो प्रश्न के उत्तर खातिर।बाकिर बाद में पता चलल कि केहू ओह प्रश्न के उत्तर लिखले ना रहे।ना त परीक्षा देत घरी आछा-आछा सखी-सहेली के बीच झगरा आ कुटिस हो जाला, खाली एगो प्रश्न के उत्तर खातिर !

एही तरे परीक्षा आछा से निबट गइल। माथा प से बड़का बोझ हटल।ना त परीक्षा के तेयारी के समय में तीनों में केहू के खाहूं के सुध ना रहत रहे।

अब त खूब झूठ-साँच एने ओने के बात बतिआवे के छूट हो गइल।

एने सँवरी के बाबू सँवरी के बिआह करे खातिर लइका खोजे में आपन कतने जूता तूरि देलन। ऊ सँवरी के बिआह हाली से क के गंगा-जमुना नहाये के फेर मे रहन।

 तीन महीना बाद मैट्रिक परीक्षा के नतीजा आइल। सँवरी थडडिवीजन, पमली सेकन्ड डिवीजन आ बारली फस्ट डिवीजन से पास कइली।

तीनों जानी पास भइली एह से खूबे खुश रहली। ओह लोग के गोड़ भुइंया ना परत रहे। घरहूं के लोग खूब गदगद रहे।

तीनों जानी पास भइला के खुशी में किरिसना जी के मंदिर में परसादीचढ़ा के एक दोसरा के मुँह में खियवली आ गुलाब के छाँह में आ के बइठली।

  ‘‘चलऽ आछा भइल कि हमनी के जइसन पढ़े में रहनी जा, ओइसनपासों हो गइनी जा।’’ सँवरी खुश हो के कहली।

  ‘‘बाकिर हमरा फस्ट आवे के चाहत रहे।’’ पमली मुँह लटका के कहली।

  ‘‘अरे, सेकन अइलू नू ? बारली फस्ट अइली, काहे कि ई बहुते तेजरही। हम त खूबे खुश बानी कि तीनों सखी आछा से पास हो गइनी जा। ना त का होइत जदी अँटकले रहितीं जा ?’’ सँवरी ई बाति कहि के गुलाब के दू गो फूल तुरली आ पमली-बारली के जूड़ा में लगा देली।

  ‘‘तूँ थड आइल बाड़ू तबो अतना खुश बाडू ? हमरा से जरनी नासमाइल हा ?’’ बारली सँवरी से पूछली।

  ‘‘जटहा बाबा के कीरिये हम काहें जरीं ? जे जेतना पढ़ल , ओतना नबंरले आइल। हम फेले हो जइती त का हमार बाबू फेनु से परीक्षा दिअइतन ? एक दम ना। आखिर थर्ड डिवीजन के डिगरी हमरा मिलल नू ? अब का चाहीं।’’ सँवरी बोलली।

  ‘‘तब, तू आगे पढ़बू नू ? आ पमली तूं ?’’ बारली एगो गुलाब के फूलसँवरी के जूड़ा में लगावते पूछली।

  ‘‘ना बारली, अब हम ना पढ़ पाइब। पढ़े के मन त बड़ले बा, बाकिरबाबू मना क देले। कहत बाड़े कि घर-गिरस्ती के लूर ढ़ंग सीखऽ।’’ सँवरी कहली।

  ‘‘तहरा घर के लोग अतना जल्दी तहार बिआह काहें करे के फेर मेंबाड़ें ?’’ बारली पूछली।

  ‘‘ई त आपन-आपन मरजी ह, बारली। केहू अपना बेटी के बिआहछोटहने में क देला, केहू बड़ भइला प।’’ सँवरी कहली।

  ‘‘हम त पढ़बे करब, बारली।” पमली हँसते – हँसत कहली।

  ‘‘आछे, हम घरे जात बानी। काल्हु हमरा के देखेवाला आवत बा लोग।तूहूं दूनों जानी आ जइहऽ लोग।’’ सँवरी कहते उठली।

  ‘‘तहरा त ससुरार जाये के बड़ी मन करत बा हो, काहें ?’’ पमली सँवरीके हाथ पकड़ि के हँसी कइली।

  ‘‘जब हमार नंबर लागी तबेनू तहरो लोग के लागी।’’ सँवरी हँसि केचलि गइली।

तीनों जानी ओह दिन अपना पास भइला के मिठाई पूरा महल्ला केबँटली।

दोसरा दिने सँवरी के देखे खातिर लइका वाला अइले लोग। सँवरी केमाई-बाबू के करेजा धड़-धड़ करत रहे। का जाने सँवरी पसन पड़ी कि ना ?ओह लोग के परान सांसत में पड़ल रहे।

सँवरी जब पसन आ गइली त सभे केहू के जीउ में जीउ आइल। सँवरीके हाथ में पाँच सइ एक रूपिया मिलल। सभके गोड़ लागि के जब घर के भीतरी अइली त बारली उनुका के छेड़ली।

  ‘‘का हो हमार रानी, साड़ी में त बड़ा सुन्नर लागत बाड़ू। अब लजाइलछोड़ि के तनी हमार जीजा के नाँव बतावऽ।’’

  ‘‘देखऽ तू मजाक क के हमरा के तंग मत करऽ।’’ सँवरी अपना मन केखुशी छिपावते झिड़िकली।

 ‘‘आछा जी, हमनी के रउवा के तंग करत बानी जा ? आ ऊ जब करिहेंतब ?’’ पमली सँवरी के गाल प चूँटी काटते कहली।

 ‘‘ऊ के ?’’ सँवरी पूछली।

 ‘‘ऊहे, हमनी के जीजा जी, आ तहार होखे वाला सइँया, बतावऽ बतावऽउनुकर नउँवा बतावऽ।’’ बारली फेनु पूछली।

 ‘‘माने कि अबही हमार बिआहो ना भइल आ तू लोग केसर के हमारसइँयो बना दिहलू लोग।’’ सँवरी लजाते कहली।

 ‘‘सँवरी आ केसर के जोड़ी त बड़ा मिली। अब त हमनी के तहरा के ‘केसर बो’ कहब जा। तब आजु से राति कइसे कटी ?’’ पमली आ बारली सँवरी के केसर के नाँव ले ले के लजवावत रही।

तबहीं सँवरी के माई ओहिजा हँसते-हँसते अइली आ बोलली,‘‘आछे तनी चुप चाप रहऽ लोग, लेन-देन के बाति होता।’’

तीनों जानी कान लगा के सुने लगली।

लइका के बाबू कहत रहले,‘‘बहोरन जी, बिआह में कवनो किसिमके कमी ना होखे के चाहीं।’’

  ‘‘ना छग्गनजी, कवनो कमी ना होई ।पहिले – पहिल त हम बेटी बिआहतबानी। रउवा सिकाइत के मोका ना मिली।’’ सँवरी के बाबू बहोरन कहले।

  ‘‘तब त ठीके बा। एक लाख रूपिया आ पचास हजार के पुरहर सामानदे दीहीं, जवना से कि हमार घर-आंगन भरि जाए। गोतिया-देयाद आदेखेवाला के करेजा दहलि जाव। टी0 वी0, फ्रीज आ एगो राजदूत त जरूरी बा।’’ छग्गन कहलें।

सँवरी के बाबू त अतना रूपिया आ सामान के नाँव सुनि के चकरायेलगले। पसेना पोछि के कहले, ‘‘हम त सुनले रही कि लइकी पढ़ल-लिखल रहेली स, त हतना तिलक ना देबे के पड़ेला।’’

  ‘‘ना ना रउवा गलती सुनले बानीं। लइकी कतनो सुन्दर आ पढ़ल रही,ओकरा बिआह में तिलक-दहेज देवही के पड़ी। आखिर हमरो बेटा बी0 ए0 पास बा। ठठे नइखे । पढ़ावे में पइसा लागल बा। कंपनी में तीन हजार रूपिया के महीना पावेला। ओकरा आगे ई सभ का बा ? बहुते कम बा।’’ छग्गन आपन बाति कहले।

  ‘‘देखीं, हम अतना नइखीं दे सकत। एक लाख रूपिया आ घरेलू सामान दे देब। राजदूत मोटर साइकिल देबे के सकान नइखे छमा करीं।’’ हाथ जोरि के बेचारा बनि के सँवरी के बाबू कहले।

बारली ई सभ बात सुनली त ना रहाइल। कहली,‘‘ई अपना बेटा केबिआह करत बाड़ें कि बेचत बाड़ें ? एक लाख रूपिया में हमार एगो बेट्टा! लेबऽ त लऽ ना त जा।’’

पमली बारली के डांटि के चुप करवली।

  ‘‘आछा त ठीक बा, एमे एगो चवनियो ना कम होखेके चाही। बिआहके दिन हम पंडी जी से देखवा के बता देब।’’  लइका के बाप छग्गन अतना कहि के चलि गइले।

सँवरी के घर में खुशी छा गइल। बाकिर बाबू के कपार भारी हो गइल।

बारली के मन में बेर – बेर एके बात खटकत रहे।‘आखिर दहेज काहें दिआता ? सँवरियो त पढ़ले बाड़ी। का इनिका पढ़े – खाये में रूपिया नइखे लागल ?’

 

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