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नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’

पहले इशिता सड़क अकेले पार करती थी, पर अब उसके दोनों हाथ व्हील चेयर पकड़े रहते हैं। व्हील चेयर पर बैठे उसके पति नरेन हाथ आगे कर गाड़ी रोकने का इशारा करते हैं। तब वह झट से उनकी व्हील चेयर लेकर सड़क पार करती है।
मेन सड़क पार करने में इशिता की हालत बिगड़ जाती है। दूसरे लोग तो जल्दी से पार हो जाते हैं। पर वह जब सारी गड़ियाँ निकल जाती हैं और दूर तक कोई गाड़ी आती नहीं दिखती तो वह झट से कुछ तेज चल कर आधी सड़क पार करती है। फिर दूसरी तरफ से गाड़ियाँ पार हो जातीं तब आधी सड़क पार करतीं।
“तुम सड़क पार करने में कितना डरती हो ?” सड़क पार होने के बाद नरेन ने पीछे मुड़कर कहा।
“सच में बहुत डर लगता है। ऐसा लगता है कि जैसे गाड़ी मेरे शरीर पर ही चढ़ जाएगी। बड़ी –  बड़ी गाड़ियों को देख तो मैं और डर जाती हूँ। आप साथ में रहते हैं तो हिम्मत बँधी रहती है कि चलो पार हो जाऊँगी।“

दोनों बातें करते – करते स्कूल गेट के पास आ गये। तभी इशिता के पर्स में रखा मोबइल बजने लगा। कंधे से झूल रहे पर्स में से उसने मोबाइल निकाला और स्क्रीन पर आ रहे नाम को देख काटते हुए बोली, “पापा का फोन है। आपको क्लास में पहुँचाकर उनसे बात करूँगी।“

“तुम्हारे पापा तुम्हें अपने पास बुला रहे हैं न…” नरेन का चेहरा उतर गया।
“नहीं तो,” इशिता साफ झूठ बोल गयी, “यह आपसे किसने कहा दिया ? वह तो ऐसे ही हाल – समाचार जानने के लिये फोन करते हैं। आप क्लास में चलिए,” इशिता व्हील चेयर पकड़े नरेन को नवीं कक्षा में ले गयी।

सारे छात्र – छात्राओं ने उसे आया देख खड़े होकर गुड मार्निग सर बोला।
इशिता भी अपने कंधे से एक थैला निकाल एक  – दो बड़ी – बड़ी नोट बुक लेकर और खुद पढ़ने स्कूल की बगल के कालेज में चली गयी। वह बी. ए. फर्स्ट इयर में थी।
एक पीरियड खत्म होने के बाद वह आयी और नरेन को दसवीं कक्षा में ले गयी। फिर खुद अपनी क्लास में आयी।
पैतालीस मिनट होने के बाद मैडम इतिहास पढ़ा ही रही थीं। तभी इशिता खड़ी होकर बोली, “एस्क्यूज मी मैम, नरेन जी को आठवीं कक्षा में छोड़ने जाना है और उनकी दवा का भी समय हो गया है। मैं जाऊँ ?”
“हाँ जाओ।“

पाँच – सात मिनट बाद वह लौट कर आयी। मैडम उसी के इंतजार में अभी तक क्लास में थीं। उसे कुछ नोट्स देकर उन्होंने कहा, “इशिता, तुम बहुत संघर्ष कर रही हो। मुझे तुम पर गर्व है।“
“मैम, ऐसी कोई बात नहीं है।“ वह हल्के से मुस्करायी।
“विपरीत परिस्थितियों में हँसकर जीना कोई तुमसे सीखे।“ मैडम उसकी पीठ थपथपा कर चली गयी।
उनके पीछे सारे लड़के – लड़कियाँ भी चले गये। पर इशिता क्लास में ही रही तीसरे परियड के इंतजार में।
कुछ लड़कियों ने बताया कि आज मनोविज्ञान के सर छुट्टी पर हैं। इसलिए वह भी बाहर चलकर मस्ती करे। पर इशिता ने यह कहते हुए जाने से मना कर दिया कि कुछ देर में नरेन को सातवीं कक्षा में ले जाना है। भूगोल के सर अचानक कहीं चले गए हैं इसलिए उनकी जगह वही पढ़ाएँगे।
क्लास में सिर्फ वही थी। नोट्स पढ़ने ही वाली थी कि तभी उसका मोबाइल बजा।
“हाँ पापा, बोलिए…”
“बेटा, तुम ठीक हो न ? अभी तो तुम कालेज में होगी और नरेन को इस कक्षा से उस कक्षा में घुमा रही होगी ?”
“जी…”
“बेटा, क्यों इतनी मेहनत कर रही हो ? चली आ हमारे पास। तुम्हें इतना संघर्ष करते देख मेरी आत्मा रोती है। ऐसा कब तक चलेगा ? आजा बेटा, सब छोड़ के हमारे पास ! हम तुम्हारी दूसरी शादी करवा देंगे। भरत से तुम प्यार करती थी न। वह तुमसे शादी करने के लिए तैयार है। आ जा…” पापा सिसक पड़े।
बिना जवाब दिए इशिता ने फोन काट दिया, पर उसका दिल बहुत भारी – भारी हो गया था। तभी चौथे पीरियड की घंटी लगी। आँखों की कोर से आँसू पोंछ वह नरेन को सातवीं कक्षा में पहुँचाने गयी। उसकी सूरत देख वह ताड़ गये।
“इशिता, तुम रो रही थी ? अपने पापा की बात मान जाओ। चली जाओ उनके पास।”

इशिता एकदम नरेन की आँखों में ताकती रह गयी। कैसे इन्होंने मेरी चोरी पकड़ ली। वह कुछ बोली नहीं और चुप – चाप उन्हें कक्षा में पहुँचा कर आ गयी।

बाहर हरे – भरे मैदान में उसकी सारी सहेलियाँ गुनगुनी धूप में बैठी हँस खिलखिला रही थीं। उन्होंने उसे पुकारा। वह फीकी मुस्कान के साथ हाथ हिलाकर क्लास में आ गयी। 

उसका मन कर रहा था कि वह खूब चीख – चीख कर रोये। अपने दर्द को आँसुओं के सहारे बाहर निकाल दे। जो उसके दिल में कुँडली मारकर बैठ और उसे तोड़ रहा है। नरेन ने उसे रोते हुए देख लिया तो उन्हें कितना दुख होगा। नहीं वह नहीं रोयेगी। क्लास में वह अकेली खिड़की के पास बैठी थी। उसने सिर को दीवार के सहारे टिका दिया और रोकते – रोकते भी आँखों से बिन बादल की बेतहाशा बारिश होने लगी। आँसू गिर रहे थे और उसकी पिछली जिंदगी के पन्ने फड़फड़ाने लगे…।

पढ़ाई में कमजोर इशिता, बस पापा की जिद और सर्टिफिकेट पाने के लिए इंटर की देहरी लाँघने जाती थी। उसके ख्वाबों में बी. कॉम. में पढ़ने वाला हैंडसम भरत ही घूमता रहता। आँखें बंद कर वह उसके साथ सपनों का महल सजाती – सँवारती। वह भी उसके मूली जैसे गोरे बदन, धनुषकार भौंहें और झील – सी नीली आँखों पर मर मिटा था।

एक दिन रास्ते में इशिता के पापा की मुलाकात उनके दोस्त की पत्नी और बेटे से हो गयी। वह उनसे पाँच – छः साल बाद मिल रहे थे। अभिवादन के बाद दोस्त की पत्नी को सादी साड़ी में देख अपने मास्टर दोस्त के अचानक हार्ट अटैक से गुजर जाने का उन्हें पता चला। उन्हें बहुत दुःख हुआ। पर यह जानकर खुशी हुई कि अपने पापा की अनुकंपा के आधार पर इकलौते नरेन को उनकी नौकरी मिल गयी। अब वह इसी शहर में नौकरी कर रहा है। नरेन ने पैर छूकर उनका आशीर्वाद लिया। पापा कि नजरों में वह उनका भावी दामाद नजर आया। उन्होंने माँ – बेटे को अपने घर पर आमंत्रित किया।
इशिता की माँ को भी नरेन पसंद आया और नरेन तथा उसकी माँ को इशिता एक नजर में भा गयी। लेकिन इशिता ने नरेन को फूटी आँख भी पसंद नहीं किया। कहाँ वह अट्ठारह – उन्नीस साल की रूप – यौवन से भरपूर लंबी और तीखे नाक – नक्श की बहुत खूबसूरत लड़की थी। वहीं नरेन सत्ताईस – अट्ठाईस साल का थोड़े नाटे कद का साँवला था। ऊपर से उसके सिर के बीच के बाल उड़ गये थे और गंजा दिख रहा था। इशिता पर तो वज्रपात हो गया। उसने माँ से कह सीधे – सीधे शादी से इंकार कर दिया।

मगर कड़क पापा आपे से उखड़ गये, ‘मैंने तुम्हारी बहनों को जिस खूंटे से बाँधा वह बँध गयीं और तुम अपनी पसंद के लड़के से शादी करोगी। यह मेरे जीते जी नहीं हो सकता। बाइक पर घूमने वाले उस भरत के पास है ही क्या ! बाप की दौलत पर मौज करता है। कल को उसका बाप उसे घर से निकाल देगा तो वह कटोर लेकर भीख माँगेगा। सुंदर चेहरे का क्या आचार डालना है। सुंदर चेहरे को जब भूख लगेगी तो उसे भी कुदाल चलानी पड़ेगी। नरेन मेरा देखा – सुना अच्छा लड़का है। सरकारी नौकरी है। घर – द्वार सब है। ऊपर से इकलौता है। अब क्या चाहिए ? इस घर का दामाद नरेन बनेगा नहीं तो तुम मेरा मरा हुआ मुंह देखोगी ।’

माँ– बहनों ने इशिता को खूब समझाया और उसकी शादी नरेन से हो गयी ।  नरेन इशिता को जी जान से चाहता था। पर वह मन ही मन उस पर खफा रहती। सिर पर गंजापन दिख रहे और नाटे पति के साथ रास्ते में चलते हुए उसे बड़ी शर्म आती। सहेलियों ने हूर के साथ लँगूर कह – कह कर उसकी खूब खिल्ली उड़ाई । वह मन ही मन नरेन को ‘चंडूल’ कहती। नरेन अपना नया नामकरण जान कर भी उस पर जान छिड़कता रहा। वह इशिता को आगे पढ़ाना चाहता था। जिस स्कूल में वह पढ़ाता था उसमें कालेज भी था। उसने उसका बी. ए. में एडमिशन करा दिया। वह पढ़ने में कमजोर थी। अतः उसकी पढ़ाई में वह भरपूर मदद करता। इशिता के न चाहते हुए भी उसके पैर भारी हो गए। सास ने खूब धूम – धाम से उसकी गोद भराई करवाई। पर किस्मत से उनकी खुशियाँ देखी नहीं गयीं।

एक रात आठ – नौ बजे नरेन ट्यूशन पढ़ाकर बाइक से घर लौट रहा था कि अचानक बाइक की हेड लाइट खराब हो गयी और अँधेरे में वह बिजली के खंभे से टकरा कर गिर गया, तभी तेज रफ्तार से सामने से आ रही जीप उसके दोनों पैरों पर चढ़ गयी। दोनों पैर चूर – चूर हो गए और जीप वाला भाग खड़ा हुआ। डॉक्टर ने नरेन के दोनों पैर घुटने तक काट दिए। माँ और इशिता पर दुखों का पहाड़ टूट गया। लोगों ने यही कहा कि आने वाले बच्चे का नसीब अच्छा है जो नरेन की जान बच गयी।

पर माँ को जबर्दस्त सदमा लगा कि अब उनका बेटा अपने पैरों पर नहीं चल पाएगा। वह अपाहिज हो गया। दूसरे के रहमो करम का मुहताज रहेगा। इसी सदमे के कारण वह खुद ही दुनिया छोड़ गयी। इशिता पर दूसरा पहाड़ टूटा, ममतामयी सास के चले जाने से उसका रो – रो कर बुरा हाल हो गया। अपने लिए अपनी माँ का इस तरह चले जाना नरेन से बर्दाश्त नहीं हो रहा था। बिस्तर पर पड़े – पड़े वह दिन – रात आँसू बहाता। वह डिप्रेशन में डूबता जा रहा था। अपने लाचार पति को इस तरह रोते – तड़पते देख इशिता को उस पर बड़ी दया आती। नरेन की स्थिति देख उसका कठोर हृदय मोम की तरह पिघलता जा रहा था।

उसी समय उसके पापा ने एक विस्फोट किया कि वह नरेन को छोड़ दे। इशिता पापा से पूछना चाहती थी कि किसके भरोसे अपने पति को छोड़ दे। नरेन की जिंदगी में जबर्दस्ती उन्होंने ही उसे भेजा। आज जब वह अपाहिज हो गया है तो उसे छोड़ने की सलाह दे रहे हैं। क्या मैं उनके हाथों की कठपुतली हूँ ? मेरा कोई अस्तित्व नहीं है ? मुझ पर कब तक बस पापा की ही चलती रहेगी। मेरे पास क्या दिल – दिमाग नहीं है ?

नरेन भी जानता था कि इशिता एक न एक दिन उसे छोड़कर चली जाएगी। आखिर वह अपाहिज शरीर से उसकी देखभाल भी कैसे करेगा ? वह तो उसे पसंद भी नहीं करती। हाँ ! उसके पेट में जो उसका अंश पल रहा है शायद अब वह उसे जन्म भी न दे। फिर उन दोनों का रिश्ता खत्म हो ही जाएगा। बस, एक नौकरी बची है लेकिन वह होगी कैसे ? कितने सारे सवाल नरेन के सामने सुरसा की तरह मुँह बाए खड़े थे। जितना समाधान ढूँढ़ता और वह उसमें उलझ जाता।

हमेशा हँसने –  मुस्कराने वाला नरेन दुःख और उदासी के भँवर जाल में डूबता जा रहा था। इशिता को याद नहीं कि कभी भी वह उदास रहा हो । कभी – कभी उसने उसे चंडूल भी कह दिया है तो वह उसे बाँहों में लेकर चूम लेता कि कितना प्यारा तुमने मुझे नाम दिया है। इसी बात पर रसगुल्ले हो जाएँ। उसने माँ से छुपाकर इशिता को स्पंज वाले उजले रसगुल्ले खूब खिलाए थे। उसे रसगुल्ले बहुत पसंद थे। जब भी वह रूठ जाती तो नरेन को उसे मनाने के लिए एक हथियार मिल गया था। सिर्फ एक साल हुआ था इस शादी को।

इशिता आज एक ऐसे सच से आत्मसाक्षात्कार कर रही थी, जिसकी उसने सपने में भी कल्पना नहीं की थी। नरेन को टूट कर बिखरते देख वह उसकी ढाल बनी हुई थी। भले नरेन अपने पैरों पर न चल पाये लेकिन पहले की तरह वह हँसे बोले बस वह इतना ही चाहती थी।

पहली बार उसने नरेन का हाथ अपने हाथों में लेकर कहा, ‘जो हो गया उसे तो हम नहीं बदल सकते, अब आगे जो जिंदगी बची है उसे तो हम हँस कर जिएँ। आप बच्चों को हिम्मत से लड़ने की बातें सिखाते हैं और आज आप स्वयं हिम्मत छोड़कर बैठे हैं । आप कल से स्कूल पढ़ाने जाइए और मैं कालेज पढ़ने जाया करूँगी। हमें अपने आने वाले बच्चे को एक बेहतर समाज और एक सुनहरा भविष्य देना है । इस तरह हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने से कुछ नहीं होगा।‘ नरेन नम आँखों से इशिता को देखे जा रहा था कि उसे नापसंद करने वाली आज उसे अपनी माँ की तरह समझा रही है।
‘आप अगर मेरी बात नहीं मानेंगे तो फिर मैं आपको चंडूल महाराज बोलूँगी,’ इशिता ने हँस कर कहा ताकि नरेन को हँसी आ जाए।

वह ठठा कर हँस दिया, ‘मैं सोच रहा था कि इतने दिनों से कोई मुझे मेरे प्यारे नाम से बुलाता क्यों नहीं ?  हाँ !  यह ठीक है। मैं एक नौकर रख लेता हूँ वह मुझे स्कूल ले जाएगा – लाएगा और  तुम  कॉलेज जाना।  अरे हाँ !  तुम पढ़ने के फेर में मेरे आने वाले बच्चे की देखभाल मत भूल जाना। वैसे अभी बच्चे के जन्म में तो समय है न ?’

‘बहुत  समय है । अभी तो साढ़े तीन महीने ही हुए हैं, सातवाँ महीना लगते ही मैं कालेज से छुट्टी ले लूँगी ।‘

“दीदी… सर आपको बुला रहे है,” एक छात्रा ने आकर कहा तो इशिता जैसे नींद से जगी।
“तुम चलो में आती हूँ,” आँसू पोंछ कर वह मैदान में आ गयी।

नरेन व्हील चेयर पर बैठे उसी का इंतजार कर रहे थे। उन्होंने उसे देखा मगर कुछ बोला नहीं। इशिता भी खामोशी से उन्हें घर लेकर आ गयी।

नरेन ने फोन कर अपने नौकर को जल्द से जल्द आने को कहा। अपनी पत्नी की तबीयत खराब होने के कारण वह गाँव चला गया था। उसने दूसरे दिन ही आने का वायदा किया। इशिता आते ही रसोई में जुट गयी। खाना बनाकर उसने नरेन को दे दिया। वह खाने लगे। उसे भी जोर से भूख लगी थी वह खाने के लिए बैठी कि तभी फिर पापा का फोन आ गया।

वह दूसरे कमरे में जाकर उनसे बात करने लगी। इस बार फोन पर माँ भी थीं। वह भी इशिता को सब छोड़ कर अपने पास बुला रही थीं।
पापा ने पूरा दबाव बनाते हुए एकदम खुल कर कहा, “एक अपाहिज के साथ तुम इतनी बड़ी जिंदगी कैसे काटोगी ? वह तुम्हें कोई सुख नहीं दे सकता। तुम्हारी रक्षा नहीं कर सकता। मैंने एक डॉक्टर से अबॉर्शन करवाने की बात कर ली है। वह तैयार है भरत भी तुमसे शा…” इशिता को लगा उसके कान में पिता की आवाज नहीं जा रही है बल्कि गर्म – गर्म  सीसा उँड़ेला जा रहा है।

अबॉर्शन की बात पर उसका पूरा वजूद हिल गया। उसकी ममता जाग उठी। अपने अजन्मे बच्चे की गर्दन पर अपने पिता के खूनी हाथ की कल्पना कर उसका सर्वांग काँप गया। उसका वात्सल्य प्रेम खौलते हुए खून के साथ चिघांड़ उठा, “वाह पापा वाह ! आप जैसा तो मैंने पिता ही नहीं देखा । जब मैं भरत को चाहती थी तो आपने जबर्दस्ती नरेन से मेरी शादी करवाई और आज जब वह अपाहिज हो गये हैं तो उन्हें छोड़ने के लिए रोज – रोज मुझ पर दबाव डाल रहे हैं। आप जैसा स्वार्थी और मौकापरस्त इंसान मैं पहली बार देख रही हूँ। अगर भरत से मेरी शादी होते ही उसका भी एक्सीडेंट हो जाएगा या वह मर जाएगा तो आप मेरी तीसरी शादी करवाएँगे ? जिस बच्चे के आने की खुशी में मैं और नरेन जी रहे हैं उसे आप… आपने खत्म करवाने की बात कैसे कह दी…” इशिता की आँखें अपने अजन्मे बच्चे की याद में रो पड़ी  ।

पापा ने उसकी सिसकी सुनी पर उनके मुँह पर ताला लग गया था ।
वह आगे बोली, “पापा, मुसीबत में आपको मुझे हिम्मत देनी चाहिए थी । आपने जिस उम्मीद के बलबूते पर मेरी शादी नरेन से करवायी है मैं उसी उम्मीद पर खरी उतरना चाहती हूँ। मेरी जिंदगी में संघर्ष करना ही लिखा है तो मुझे यह संघर्ष और नरेन का साथ दोनों पसंद हैं। मैं उन्हें कभी नहीं छोडूँगी। मेरे सिवा अब उनका है ही कौन ? आगे से इस विषय पर आप मुझसे कभी बात नहीं करेंगे, नहीं तो मैं आपसे सारे रिश्ते तोड़ दूँगी।“ कहकर इशिता ने मोबाइल घुमा कर फेंक दिया और धड़ाम से आवाज आयी।

वह दौड़ते हुए कमरे की तरफ भागी। टेबल पर से पानी का गिलास लेने के क्रम में नरेन पलंग पर से नीचे गिर गये  थे। 

“यह आपने क्या किया, थोड़ा मेरा इंतजार नहीं कर सकते थे ?” इशिता नरेन को किसी तरह से उठाते हुए भर्राए गले से बोली।
“अब तो सिर्फ नौकर का ही इंतजार करना पड़ेगा…” कहते – कहते नरेन की आँखें छलछला आयीं।

“आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि मैं आपको छोड़ के कहीं नहीं जाऊँगी। हमेशा आपकी परछाई बनकर रहूँगी । पापा को जो बोलना है बोलने दीजिए। यह मेरी जिंदगी है और मेरा फैसला है।“ इशिता नरेन को पलंग पर ठीक से बैठाते हुए बोलती जा रही थी।

उसने उसकी भीगी  पलकों को पोंछ दिया, “मर्दों को आँसू शोभा नहीं देते। आपकी धर्मपत्नी हूँ अपना धर्म निभाऊँगी। आज से मैं आपकी माँ की तरह आपको डाँटूगी । बहन की तरह दुलार करूँगी और पत्नी की तरह प्यार करूँगी। इतने सारे किरदार मैं प्ले करूँगी समझे मेरे चंडूल महाराज…” उसने नरेन को गले से लगा लिया।

नरेन को लगा कि इशिता ने उसे तीखी धूप से बचाते हुए उस पर अपने प्यार की शीतल छाँव कर दी, “धन्यवाद इशिता, तुम्हारे साथ से आज मैं आबाद हो गया।“

नोट : मेरी यह कहानी ‘शीतल छाँव’ गृहशोभा, द्वितीय, दिसंबर 2015 में गलती से विलास जोशी के नाम से ‘साथ तुम्हारा’ शीर्षक से छपी थी . पत्रिका की छवि खराब होने के कारण संपादक ने भूल सुधार नहीं छापा . मैनें अपने फेसबुक पर उस समय पोस्ट किया था. वरिष्ठ लेखकों के कहने पर मैंने कहानी का शीर्षक और पात्रों के नाम बदल दिए हैं . मेरे कथा संग्रह ‘छंटते हुए चावल’ में यह कहानी प्रकाशित है

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