Spread the love

– नरेंद्र कौर छाबड़ा

उनके दोनों बेटे कुशाग्र,मेधावी थे . उच्च शिक्षा प्राप्त करके विदेश में बहुराष्ट्रीय कंपनी में नौकरी कर रहे थे . पति पत्नी जीवन की सांध्य बेला में अकेलापन तो महसूस करते लेकिन बेटों के सुखद भविष्य को देख तसल्ली कर लेते.दोनों बेटे कुछ कुछ अन्तराल पर माँ-बाप से फ़ोन पर बातें कर लेते लेकिन

उनसे मिलने पांच सात वर्षों में एक बार ही आते.

माँ का स्वास्थ तेज़ी से बिगड़ रहा था.जब डॉक्टरों ने जवाब दे दियान बाद माँ का निधन हो गया. इत्तफाक से छोटा बेटा भी उसी दिन वहां पहुँच गया.विलाप के बावजूद सभी को संतोष था बेटा समय पर पहुँच गया.माँ के संस्कार में शामिल होकर चिता को अग्नि भी दी.

रात को पिता ने सहज ही बेटे से कह दिया-‘अच्छा हुआ तुम वक्त पर पहुंच गये .कम से कम एक

बेटा तो माँ की मौत पर आ गया अंतिम दर्शन करके सभी संस्कार संपन्न कर लिए.’ बेटा फ़ौरन बोल उठा-‘हम दोनों भाइयों ने तय कर रखा था एक की मौत पर मैं आऊंगा दूसरी बार भैया आयेंगे…..’

पिता के सामने तो जैसे सारी कायनात घूमने लगी थी.लगा किसी ने-हृदय  को क्षत विक्षत करके प्राण ही निकाल लिए हों.यह हमारा खून बोल रहा है…..इतनी संवेदनहीनता…… सबेरे बेटा उठा तो पिता नज़र नहीं आये.उनके कमरे में गया तो देखा वे मर चुके हैं. समीप ही एक

चिठ्ठी पड़ी थी-‘मेरे मरने पर बड़े बेटे को आने का कष्ट करना पड़ेगा.तुम आए हो तो यह काम भी निपटाते जाना. तुम्हारे खुशहाल और मस्त जीवन में कोई असुविधा न हो इसलिए मैं आत्महत्या कर रहा हूँ…..’

Leave a Reply

Your email address will not be published.