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– नरेंद्र कौर छाबड़ा

 

रेल में हमारे सामने की सीट पर अधेड़ पति पत्नी अपनी तीन बेटियों और एक बेटे के साथ बैठे थे। बच्चे काफी शोर-शराबा मचाए हुए थे । कभी किसी खाने की वस्तु के लिए आपस में उलझ पड़ते तो कभी किसी खिलौने के लिए। उनकी मां बीच-बीच में डांट फटकार देती जिससे कुछ मिनटों के लिए शांति छा जाती पर फिर से उनकी शरारतें शुरू हो जाती।

लड़का सबसे बड़ा लगभग 12-13 बरस का था । उसके बाद सभी लड़कियां दो-तीन वर्ष के अंतर की लगती थीं । सबसे बड़ी लड़की लगभग 10 वर्ष की थी। सुंदर, गदबदी, कानों में शायद अभी-अभी छेद करवाकर बुंदे पहने थे क्योंकि उनके आसपास तेल हल्दी नजर आ रहे थे। खेलते खेलते बच्चों में फिर झगड़ा हो गया और लड़के ने लड़की के कान पर तमाचा जड़ दिया। उसके कान की त्वचा पर खून की बूंदे रिसने लगी। लड़की चीख पड़ी। मां ने तनिक क्रोध से लड़के को देखा पर तब तक लड़की ने भाई की कलाई पर जोर से दांत गड़ा दिए। भाई चीखा। उसकी कलाई पर दातों के निशान उभर आए। मां ने लड़की को एक जोर की चपत लगाई – “क्यों री, शर्म नहीं आती भाई को इतनी जोर से काट लिया। वह तेरा दुश्मन है?”

“ उसने मुझे इतनी जोर से क्यों मारा?” लड़की रोते-रोते बोली ।

“उसके मारने से तू मर तो नहीं गई । ले देकर अकेला लड़का है उसके पीछे पड़ जाती हो तुम सब..” मां अभी भी क्रोध में बड़बड़ा रही थी।

“ मेरे काटने से क्या वह मर जाता..? लड़की के कहते ही मां ने एक जोरदार झापड़ बेटी के गाल पर दे मारा—” कलमुंही कहीं की अनाप-शनाप बके जा रही है! आज के बाद ऐसा कुछ बोली तो जुबान खींच लूंगी समझी?”

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