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– राज प्रिया रानी

 

हरि बोल ले आई देखो सावन की हरियाली ,
टपके घर की छतिया और आंगन पानी पानी ।

झर झर बहके पुनीत बयार झूम के डाली डाली ,
मन के झूले डोल रहे रिमझिम रस मतवाली ।

शोभे चंदन तिलक शिव पर शंकर का है गुंजन ,
घटा छाई घनघोर आसमां धूप लगे है कुंदन ।

तन भी सिमटी मन भी भीगा बूंद बूंद सताती है ,
इंद्र की बारिश मित की कस्ती मिलन राग सुनाती है।

बरसे चमन में शोखी पवन दिल में अगन लगाई,
हरिहर वादी सरसर शोर मंगल वंदन बन आई ।

राह पड़ाव नहर डगर छप छप की बेला बदराई,
शाम सवेरा रात बसेरा घट घट घोर बलखाई ।

सुलग रही है विरह बिजुरिया नयनों से नेह बरसाई ,
आंखों का पानी रिमझिम रानी प्रीत इत्र बन छाई ।

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