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सेवा सदन प्रसाद

 

आज शरारती फागुन

अपनी मर्जी से

मेरे

रूप को संवारा,

तब

खूब गौर से

दर्पण में

खुद को निहारा।

सरकता आंचल

बिखरी जुल्फें

गालों से

लिपटा हुआ गुलाल,

आंखों में

आंखें डाल कर

इशारे से

पूछा एक सवाल।

खामोश क्यों उमंगें?

उदास क्यों

तेरा मादक बदन

और हर एक अंग ,

मेरा ‘मैं’ कह पङा–

फागुन के दिन भी

बिरहिन बनी हूं मैं

साजन नहीं जो संग।

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