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– महेन्द्र “अटकलपच्चू”

 

रात में जब सोता हूं

तब

अजीब से ख्याल आते हैं।

कभी डर सा लगता है

तो कभी घुटन सी महसूस होती है

नींद भी उचट जाती है

कभी रोने को मन करता है

कभी हंसने का।

बिस्तर से उठकर इधर-उधर

टहल भी लेता हूं।

दो एक घूंट पानी भी पी लेता हूं।

कभी-कभी खिड़की खोलकर

बाहर देख लेता हूं।

पंखे की आवाज भी मन में

एक अजीब सी कसक

पैदा करती है

पंखे की ओर देखता हूं

तो लगता है

मेरे ऊपर न गिर जाये

डर भी अजीब होता है।

अकेला रहूं तो सताता है

सबके साथ भी परेशान करता है।

कभी अंधेरे में रहने का मन करता है

कभी उजाले में अच्छा लगता है।

कभी एकांत पसंद आता है

कभी भीड़ भी भला लगता है

क्या कहूं इसे…?

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