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– विद्या शंकर विद्यार्थी

           ‘ धावसन रे, रमेसर मालिक के पाला मार देलस, आ खटिया लेके आवसन हाली, सहर ले चले के होई।’ गांव में गलबल गलबल बात चले लागल। आह रे दादा, असो के जाड़ जेकरा के धरता हिला देता। शरीर कबार देता, कवनो मोका खातिर गेंठियावल पइसा खोले के पर जाता।
           ‘ इनिकर गोतिया सुन के केवाड़ी लगा देलन, आ हल्लो कइला पर नइखन सुनत।’ खटिया धरत एक आदमी कहल।
            ‘ आरे मरदे, ऊ केहू के बोखार देबे ओला जीव ना ह। मदद कहां से दिही।’ दोसर आदमी नीयत के बखिया उघार देलस।
             ‘ परले हरला में आदमी चिन्हाला।निरोग रहे के ढरका नइखन नू पीके आइल।’
              ‘ इनिका के हालि ले चलसन, बतियावे के समय नइखे। देखल जाई । एही गावे में न रहे के बा। माठा पीए से लाद साफ होला मन के कबज ना जाला। ‘
             एही बोलते बतियावत में लोग सहर ठेक गइल । डॉक्टर सूई देलन। घरी घंटा में रमेसर ठीक हो गइलन। ई शीत लहर ना बलुक कठ जीव के चिन्ह चिन्हाए ओला पाला ह। के कन्हेला प बोझ लेला आ के छटक जाला।
– रामगढ़, झारखण्ड

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