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– नज़्म सुभाष

 

सुमित्रा देवी ने सफ़ेद धोती के ‘आंचर’ में आंसू पोंछ लिए …उन्हें अब भी यकीन नहीं हो रहा था कि सक्सेना साब 52 साल पहले अग्नि के समक्ष जोड़ी हुई गांठ खोलकर खुद को आजाद घोषित करते हुए परलोकवासी हो चुके हैं । अब तो हफ्ता भर होने वाला है । मगर यकीन …. यकीन  ही तो नहीं होता ।

आज मृत्यु भोज का आयोजन है । घर के सभी सदस्य दौड़ाभागी में लगे हैं । मन तो उनका भी है कि सक्सेना साब के अंतिम काम में वह भी हाथ बंटायें पर उनका रोग उठने ही नहीं देता। वो व्हीलचेयर पर बैठी टुकुर-टुकुर सारा कुछ देख रही हैं। घर के बाहर कनात के साथ-साथ कुर्सी मेज़ें भी लग गई हैं।

 

पंडित जी का सुझाव था कि भोज इत्मीनान से बैठकर ही ग्रहण किया जाए ताकि मरने वाले की आत्मा को शांति मिले और संभव हो तो घर के सदस्य ही सबको भोजन परोसें। उनके कहे अनुसार ही सारे काम हो रहे हैं।

शाम के 5:00 बजते ही लोग आने लगे। भोज शुरू हो गया । सुमित्रा देवी घर के बाहर बैठी सब देख रही हैं….सक्सेना साब के साथ की यादें ज़हन में उथल-पुथल मचाये थीं।

शिथिल जिस्म एकदम सुन्न था। काश! ज़हन भी सुन्न होता…..।

प्रथम पांति में बैठे हुए सभी लोग भोजन ग्रहण कर ही रहे थे कि बेटे सुधीर ने एक-एक कटोरी सूजी का हलवा सभी के सामने रख दिया। इतने सुस्वादु भोजन के बाद मीठे के नाम पर हलुआ….

सभी हैरान … मगर यह हैरानी ज्यादा देर तक न रही।

“पिता जी को सूजी का हलुआ बहुत पसंद था…  आप सब ग्रहण करेंगे तो उन्हें शांति मिलेगी।”

सुमित्रा देवी के कानों में ये आवाज पड़ी तो चौंक गयीं। हलुआ….  सक्सेना साब अपने अंतिम समय में हलुआ  की

ख्वाहिश लिए ही रुखसत हो गए। किसी ने उनकी एक न  सुनी ।

“रात ग्यारह बजे बुढऊ हलुआ खाएंगे….ये भी कोई वक़्त है… मेरे बस की नहीं” बहू के शब्द अभी भी कानों में गूंज रहे थे। ….वो लाचार न होती तो……

आज उन्हीं के नाम पर हलुआ खिलाया जा रहा है। उन्हें वितृष्णा – सी हुई । अंदर से सब्र का बांध टूट गया।

उनकी सिसकियाँ किसी और तक पहुंचे इससे पहले ही उन्होंने धोती का ‘आंचर’ अपने मुंह मे ठूंस लिया।

  • 356/केसी-208

कनकसिटी आलमनगर लखनऊ-226017

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