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विद्या शंकर विद्यार्थी

 

हरिबाबू कमली के रूप की लावण्यता पर मुग्ध थे। जगते कमली तो सोते कमली, चाय के लिए कमली तो टेबल पर खाने लगाने के लिए कमली, नहाने वक्त पीठ पर साबुन लगाने के लिए कमली तो लगे साबुन धोने के लिए कमली। जैसे उनकी जिंदगी में अपनी पत्नी नाम की कोई चीज ही न हो। बस कमली तो कमली, और कुछ नहीं। कमली रिश्ते में उनकी साली लगती थी। और उनकी पत्नी इस बीच में टोकती तो हरिबाबू शेर की तरह दहाड़ उठते जैसे शेर के हिस्से का कोई शिकार छिन रहा हो। अब हरिबाबू को घर के लोगों ने टोकना भी छोड़ दिया, पत्नी अजीज आ गई समझाते समझाते।

हरिबाबू अपने बैंक के दो खातों की नोमिनी कमली को बना दिये, जैसे कमली ही सब कुछ हो, पत्नी और बेटे कुछ भी नहीं।  हरिबाबू को एक बेटा था, सिर्फ एक। आगे ऐसा दैविक चक्र कहिए या चट्टान, भहरा गया। वह भी हरिबाबू के बेटे और उनकी पत्नी पर। मतलब क्षणिक बीमारी में हरिबाबू की आंखें बंद हो गईं। सभी के पांव तले की धरती खिसक गई।

थोड़ी देर के लिए कमली भी आहत हो गई। किन्तु उसके नाम में दो खाते आ गये थे। अब उजड़े चाहे बसे जो कोई।

दो साल बाद हरिबाबू के बेटे को लगी घातक बीमारी के लिए पैसे की जरूरत पड़ी। जो कमली हरिबाबू के घर की अभिन्न सदस्या बन कर रह रही थी, जरूरत आने पर आंखें बदल दी। इस तरह जैसे कोई लगाव ही नहीं रहा हो।

कमली हरिबाबू की शिकार हुई या हरिबाबू कमली के शिकार हुए या हरिबाबू का पूरा परिवार कमली का शिकार हुआ। ऐसी स्थिति में हरिबाबू की बहू भी पूरे परिवार सहित दो पैसे के लिए दूसरे का मुंह ताक रही है और…  और कमली निर्मोही बनकर कहीं अन्यत्र निकल गई।

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