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– विद्या शंकर विद्यार्थी
मैं कविता हूँ
समय की मार की कविता हूँ
समय की धार की कविता हूँ
दीन – लाचार की कविता हूँ
समय की पुकार की कविता हूँ।
मैं कविता हूँ
भिक्षुक की फटी झोली हूँ
मैं दबी – दबायी बोली हूँ
शर्म आती है कहने में
सुख नहीं चुप रहने में
पांव मेरे जब कांपते हैं
लोग दूर से भांपते हैं
कहते हैं कि पीया होगा
साला अधिक लिया होगा
देखो देखो डोल रहा है
दे दो दाता बोल रहा है
टुकुर टुकुर ताक रहा है
हैं मालदार, भांप रहा है
ऐसे ही सब मरते हैं
इनके दिन गुजरते हैं ।
मैं कविता हूँ
पेट की धधकती आग हूँ
सुलगती मैं तो दुर्भाग्य  हूँ
देेवालय में अनाथालय में
दौड़ती रही शिवालय में
गई ऊँची ईमारतों के द्वार
हँसे दीन पर उनके परिवार
कंचन नहीं नहीं दामनी मैं
नहीं किसी की कामिनी मैं
उपेक्षिता को पूछे कौन
रहते हैं सभी छूंछे से मौन
क्षुधा की ज्वाला हूँ मैं
चिथड़ों में पला हूँ मैं
पुलिस कभी गरियाती है
डंडे हम पर सरियाती है
उधर माल फरियाती है
कारी हमें घिर आती है ।
मैं कविता हूँ।
काले धंधे बस फलेंगे
कितने घर यहाँ जलेंगे
दुनिया नहीं फकिरों की
दुनिया है यह अमीरों की
हम तो सड़क किनारे हैं
हर समय ही हम हारे हैं
लिख विधाता कलम से लिख
लिख सके तो दम से लिख
लिख तकदीर रहम से लिख
मत किस्मत में चिख लिख
मैं कविता हूँ
मैं कविता हूँ
मैं कविता हूँ ।

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