Spread the love

 

 

  • अरुण निशंक

नादाँ मैं क्या क्या ख्वाब सजाता रहा हूँ

एक बेवफा को दिल में बसाता रहा हूँ

उसने जफा किया है मेरी वफा के बदले

जिनकी राहों में, मैं फूल बिछाता रहा हूँ

मेरे दर्दे दिल को समझ न सके वो

जिन्हें नगमा वफा का सुनाता रहा हूँ

एक नजर न देख सके वो पलटकर

मैं वर्षों से जिन्हें बुलाता रहा हूँ

बेवफा कितने दूर हो गए दुनिया से मेरी

ताउम्र जिन्हें पलकों पे बिठाता रहा हूँ

संगदिल जला बैठे हसरते गुलशन मेरा

और मैं बागे वफा को सजाता रहा हूँ

मेरी थोड़ी भी कद्र न की उसने कभी

जिसकी खातिर मैं खुद को मिटाता रहा हूँ

जिन्दगी बोझ बन गयी है बगैर उसके

यादों में जिसकी जिन्दगी बिताता रहा हूँ

काश मेरे जख्मों का मरहम बन जाते

मैं जिन जख्मों को जमाने से छुपाता रहा हूँ

अब तो आ जाओ मायूस को न तड़पाओ

न जाने कितनी मुद्दत से तुम्हें बुलाते रहा हूँ .

 

Leave a Reply

Your email address will not be published.