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  • नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’

 

श्री बबलू जी,

परनाम !

रउआ सोचत होखब कि आजु हम राउर नांव से ई चिठ्ठी काहे लिखत बानी, जबकि हमनी के बिआह बीस दिन बादे बा . एह घरी दोसर लइकी आपन भावी पति के सपना में डूबल रहे लिसन . बाकिर हम, हमार बिआह रउआ जइसन आछा आ सुनर लइका से हो जाई ई सोचि – सोचि के हम मानसिक दुःख के दौर से गुजरत बानी .

बुरा मत मानब हम रउआ से बिआह नइखी क सकत . हम ई फैसला बहुते सोच समुझ के आ आपन अतीत के देखते हुए लेनी हा . हम रउआ के धोखा नइखी दे सकत . भले हमार पिछिला जिनिगी के बदनुमा दाग हमार घरे के लोग छिपा देलस बाकिर हम नइखी छिपा सकत .

हम आपन घरे के लोग के दोस नइखी देत . एक तरह से हमार बारे में ऊ बात छिपा के ऊ लोग हमार जिनिगी संवार चाहत बाड़े . माई – बाबू त कसहूं आपन बेटी के खुश देखल आ ओकर रिश्ता आछा से आछा घर में कइल चाहेलन . हमार माई – बाबूजी भी इहे चाहत बाड़े जा . एहिसे त रउआ जइसन अमीर बाप के बेटा से हमार छेका ( सगाई ) झट से करवा देलन .

कहवां हम साधारन परिवार से आ रउआ प्रोफेसर माई – बाबू के एकलउता रत्न ! पता ना ओह मोहल्ला के बिआह में राउर माई -बाबूजी हमरा के कइसे देख लेनीं आ रउओं हमरा अइसन सांवर आ सधारन नाक – नक्शा के लइकी के पसन क लेनीं .

कबो – कबो मन करेला कि आपन ई सुनर भाग्य प हम खूब इतराई, बाकिर होंठ प इतराए के मुसुकान अइबे करेला कि आंखि में घिनावना मंजर उतर जाला आ दिल आह भरि – भरि के रोये लागेला .

हम… हम रउआ से कइसे कहीं ? जवन लइकी जवरे रउआ बिआह के बंधन में बन्हाइल चाहत बानीं, ओकरा के भरपूर पेयार ओकर सुनहवला अंचरी में डालल चाहत बानीं ऊ नव बरिस के उमिर में जूठा हो चुकल बिया .

हम… हम बलात्कार के शिकार लइकी बानी . रंगीन मिजाज के हमार सगा मामा हमार रेप कइले रहे . हमार गरीब माई आपन नइहर में रहत रहे .

… हम खून से लथपथाइल माई के गोदी में निढाल पड़ल रहीं . बाबूजी कवनो कीमत प ओह मामा के जान से मार देबल चाहत रहन .

हमार अनपढ़ माई, बाबूजी के सोझा हाथ जोरि के खड़ा हो गइल, “मधु के बाबूजी, हमार ओह नीच भाई जवन करे के रहे क देलस .

बाकिर रउआ अइसन कुछु मत करीं कि जेसे हमनी के तबाह आ बरबाद हो जाई जा . रउआ ओकरा के मारि देब त रउवा के फांसी हो जाई, फेरु हम तीन – तीन गो लइकी के लेके कहवां मारल – मारल फिरब ? ई दुनिया बड़ा जालिम बा, जब एगो छोटी चुकी लइकी के ओकर मामा ना छोड़लस त भला हमरा आ हमार दूनों बेटी के केहू छोड़ीं ? बिना मरद के हम ई लइकिन के बोझा कइसे उठाइब ?”

“त का हम तोर ऊ पापी भाई के असहीं छोड़ि दीहीं ?” ऊ हमार फूल अइसन बेटी के …” बाबूजी भोकार पारि – पारि के रोये लगले,  “हम ओह राछस के जेल में डालि के सड़ा देब . हमरा पुलिस के भीरी जाये  दे .” बाबूजी थाना में जाये खातिर बेकाबू होत रहन .

“रउआ हमनी माई – बेटी के कीरिया, अगर रउआ थाना में गइनीं त . ई बात जाने के बाद सभ केहू हमनी प अंगूरी उठाई . हमनी के केहू के मुंह ना देखा सकब जा . हमार ऊ कुत्ता भाई बहुते अमीर बा . केहू तरह जेल से छुटि जाई . छूटे के बाद ऊ हमनी जवरे कवन बरताव करी ई भगवानो नइखन जानत .

वोइसे भी ओकरा के सजा देवावे के मतलब बा लता के जवरे हमनी सभे के भरल बाजार में लंगटे होखल . हमनी परिवार प त करिखा लागिये गइल . ई बात खाली हमनी के ही जानत बानी जा . बहरी के लोग नइखे जानत . अगर ई बात सभे के पता चलि जाई त हमार दूनों सयान होखत बेटी के भी बिआह ना होई . केहू हमनी से रिश्ता ना जोड़ी . हमनी गरीब का करब जा ? रउआ शांत हो जाईं .”

ना चाहते हुए भी बाबूजी अपना दिल प हजारों पथर रख के माई के बात मान ले लें .

ओह मामा से माई सभ रिश्ता तूर देलस . ओह दुःख से निकले खातिर बाबूजी ऊ गाँव छोड़ि के शहर में आ गइलन .

रिश्ता टूटल चाहे गांव छूटल बाकिर हमार दिल से ऊ दरद कबो ना निकलल . देह के घाव त भरि गइल बाकिर मन के घाव हरमेसा गहिरा रहल . चंचल आ चुलबुल हम उदासी के भंवर में डूबत चली गइनी .

कब बचपन बितल आ कब जवानी आइल, इयादे नइखे . दूनों पड़ाव लोर से ही भरल रहल .

माई – बाबूजी के खूब पेयार हमरा के सहारा देलस . दूनो बड़ बहिन के दुलार जिनिगी में चले के हौंसला देलस . बाकिर जइसे – जइसे बड़ होत गइनी, आत्महत्या के खेयाल गहिरा होत गइल .

हमरा के हरदम उदास आ दिन रात लोर बहावते देखि के एक दिन बाबूजी कहलें, “बबी, हम जानत बानी कि तू कवन मानसिक पीड़ा से गुजर रहल बाड़े, बाकिर हमनी खातिर जी .”

“बाबूजी, हम जियल नइखी चाहत… नइखी चाहत .” हमार आंखि से सैलाब उमड़ पड़ल .

“बबी, लता, जियल त हमरा आ तोर माई के ना चाहीं, जवन हमनी के ओह पापी के सज़ा ना दिअवनी जा . आपन बदनामी के डर से चुप रह गइनी जा . बुचिया, मधु आ जया के लेखा तू हो हंस – बोल, खुश रह . हमनी तोरा से आउर कुछु ना चाहीं . तोर हरमेसा ई भरल आंखि देखि के हमार आत्मा तड़प – तड़प के रोयेला .” ऊ हमरा के छाती से लगा रो पड़लन .

हंसल – बोलल हमरा खातिर आसान ना रहे, मगर बाबूजी के आंखि में अपना खातिर बेहिसाब दरद देख हम अपना आप के तनी – तनी ओह दुःख से उबरनी . केहू तरह पढ़ाई पूरा कइनी . माई हमरा के दिन भर घर के काम में लगवले रहत रहे, सिखावत रहत रहे ताकि हमार मन लागल रहे .

हम बिआह करे के एकदम तैयार ना रही . ओह घरी माई – बाबूजी आ दूनों बिआहल बहिन हमरा सोझा हाथ जोरि के खाड़ हो गइली स, “जवन हो गइल ओकरा के भूला जो बुचिया, जब तू जिनिगी जी ले लीस त एह जीवन में ख़ुशी भरले . जब हेतना साल बाद तोरा बारे में केहू ना जान पाइल त आगहूं केहू ना जान पाई .”

बाकिर हम आपन दिल के कइसे समुझाई ? हम एगो सीधा साधा इंसान के धोखा नइखी दे सकत . ना हम पत्नी सुख दे सकत बानी आ नाही आपन ई छलनी दिल से आपन भरपूर पेयार रउआ प नेछावर कर सकत बानी .

जेह दिन हमनी के छेका भइल रहे ओही दिन ओह मामा के बहुते भयानक मौत भइल रहे, एड्स से . ऊ त मरी गइल बाकिर हमरा ऊपर दाग लागले के लागले रहल .

आजु हम रउआ आगे हाथ जोरत बार – बार निहोरा करत बानी . रउआ केहू तरह हमरा से बिआह मत करीं . ई रिश्ता तूर दीहीं . ई हमरा ऊपरे राउर बहुते बड़का एहसान होई .

-लता .

….

प्रिय लता जी,

तोहार चिठ्ठी पढ़ि के दिल बहुते दुखाइल हा . हम सोंचले भी ना रहीं कि जवन लइकी के जवरे हमार बिआह होखे के बा ओकरा दिल में हेतना दरद छिपल बा .

सबसे पहिले हम तोहार हिमत के तारीफ़ करब कि तू आपन पिछला जिनिगी के सभ बात सच – सच बता दिहलू . हमरा के अन्हरिया में ना रख लूँ . तोहरा जइसन एतना हिमत आ साफ़ – साफ़ बोले वाली लइकी हम पहिला बेर देखत बानी .

जवन घटिया मामा तोहरा ऊपरे हेतना बड़ दाग लगा देलस, ओकरा त मरे के बादो पिलुआ पड़ी . भगनी त देवी माई के रूप होली सन बाकिर तोहार मामा … खैर, छोड़s, ओइसन बात .

आजु ई नयका जीवन में हर रिश्ता दाग दार हो चुकल बा .

अगर तू बिआह ना करे के सोचलू हा, त ई समाज के का जवाब देबू ? एह हाल में हजारों सवाल तोहार देहि में सुई गड़ाई . हम मानत बानी आपन तन – मन के ऊपर झेलल गहिरा घाव के बिसार देबल आसान नइखे . फिर भी तोहरा ई घुटन से मुक्त होखे के पड़ी .

तोहार पिछिला जिनिगी के घटना एतना गहिरा बा कि तू आपन हाथ से हमरा के माटी में मिलावत बाड़ू .

तू लोग लइकिन के नजर में खाली गोरे लोग सुनर रहेला का सांवर लइकी सुनर ना लउके लिसन ?

भले तोहार तन सांवर बा बाकिर मन अईनक लेखा एकदम साफ़ सुथरा बा . जवना प एको खुरचन नइखे . एहिसे हमार माई – पिताजी तोहरा के हमारा खातिर पसन कइनीं हा . हमनी के सूरत ना सीरत सुनर चाहीं .

तू हमरा से बिआह ना करे के हाथ जोरि के निहोरा कइलू हा, बाकिर हम तोहार ई निहोरा स्वीकार ना करब . हम तोहरा से आ बस तोहरा से ही बिआह करब . तू गंगा लेखा पवित्र बाड़ू . अपना आप के जूठ आ पापी मत समुझs .

तू ऊ ऊपर बइठल ओह भगवान के न्याय देखs कि जेह दिन तोहार छेका हमरा से भइल ओही दिन ओह पापी मामा के कतने घिनावन मौत भइल . ऊ त मरि गइल . ओकर देबल घाव के इयाद क क के कब तकले लोर गिरवबू ?

ऊ दरद, ऊ गम के भूला जा . एहमे हम तोहार मदद करब . तू अपना आप के पापी मत बुझs . छोट लइकी पाप ना करे . ओह घटना – अपराध के जिम्मेदार तू नइखू .

हम तोहार चिठ्ठी आपन माई – पिताजी से पढ़वनी हा . जवरे तोहरा से बिआह करे के आपन फैसला भी सुना देनी .

जानत बाड़ू, हम आपन पिताजी के सपना पूरा ना कइनी . उहां के सपना रहे कि हम एगो आछा डाक्टर बनी, बाकिर लफंगा संघतियन  के जवरे सड़क नापे के फेर में हमरा रेलवे में मामूली नोकरी मिलल . ओही घरी से पिताजी हमरा प खिसिआइल रहेनीं .

बाकिर हमार फैसला सुनि के उहां के हमरा छाती से लगा लेनीं, “बबलू बबुआ, आजु हमार छाती गर्व से आउर चौड़ा हो गइल . लता ही हमार पतोह बनि के एह घर के शोभा बढइहें .”

माई कहली, “बबुआ, हमनी के दुल्हिन के जिनिगी में एतना ख़ुशी भरि देब जा कि ऊ आपन करिया जिनिगी के दुख हरमेसा खाती भूला जइहें .”

हम तोहरा के ख़ुशी देबे ठीक बीस दिन बाद बरात लेके आइब . तू आपन पिछिला जिनिगी के करिया पन्ना हमेशा खातिर फाड़ि के दू डेग आगे बढ़ि के हमार हाथ थाम लs .

तोहार भावी जीवनसाथी .

बबलू .

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