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– डॉ.  बिक्रम कुमार सिंह

 

पहिले कपड़ा के भीतरी अस्तर होए,
अब देहिया पर से बस्तर गायब बा।

नवका बबूनी, बबुआ लोग कहेली। फैशन नायब बा।
का त, शिकायत भेल खराब बा।

का हसी दुसर देसावा के, अब हमरे लोगवा के चाल खराब बा।।

फैशन में येतना फसल लोग बा,
लड़का लड़की मे अंतर न भुझात बा।

कपड़ा ओछ बा की, सोच ओछ बा।
केसवा के रंग हो गेल बा, जैसे भैसी के पोंछ बा।

मेहरारू बदला बदली के जमना आइल बा।
हमरा बुझात बा, आदि मानव जुग आइल बा।

बूढ़ी मां के, वस्त्र मे इजत तोपेला चिपी साटल बा।
पतोहिया के इज्जत देखावेला, ढिजाइए वाला चिपी कटल बा।

मां के माथा पर अदब के घूंघट बा।
दुलहीन के साड़ी पहिने मे झनझट बा।

फाटल कपड़ा पहिनल, अमीरी के पहचान बा ।
भरल पुरल कपड़ा पहिनल गरीबी के निशान बा।

बाप मतारी के कदर भुलाइल बा।
मरद मेहरी के जुग आएल बा।

हमरो मेहरी कहेलि राउर सोच पुरान बा।
ये से उनकारो वस्त्र से अस्तर गायब बा।

अब फाटल कपड़ा के फैशन बा।
येही से हमरा लेखनी में चिपी सटल बा।

– चकिया मोतीहारी

One thought on “बस्तर से अस्तर गायब बा”

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