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 – विद्या शंकर विद्यार्थी

 

वह

आदिवासी औरत

पहाड़ से

लकड़ी की बोझ लिये

आज भी उतरती है

शहर की गली से होती/पसीने पोछती –

प्रतिदिन बाजार की ओर गुजरती है

उम्मीदें लिए  दो रोटी की

बड़े पेट वालों की रोटी है कि मोटी

तो उसकी जरूरत की छोटी तथा

पतली होती जाती है।

मंगरा

का नशा जब कमता है

वह बड़बड़ा/गरियाता है

हमें और किसी ने नहीं अपनों रहनुमाओं ने मारा है

चले आते हैं छिछियाते

कहते हैं – भूलना मत मंगरा, एक वोट से हार हार होगी हमारी

मंगरा तो नहीं जाता उनके द्वार, हाथ जोड़ने और घिघियाने, मंगरा की अपनी मिट्टी है

मंगरा दारू पीता दारू पियेगा

और वह भी एक पानी वाला

मंगरा की रोटी छोटी और पतली होती जाती है तो होती जाए

मंगरा अब महुए की रोटी खाएगा

तो

मंगरा की औरत समझाती है –

महुआ की रोटी पर गरूर कर गरूर

अपना जंगल है न

हम कटने नहीं देंगे – हम दोनों जैनी

जान दे देंगे।

तब… तब…

मंगरा समझ जाता है

लाख टके की बात।

महुए की रोटी की बातें।

  • रामगढ़, झारखण्ड

 

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