Spread the love

 

-अलका मित्तल

ग़ज़ल

ख़्वाहिशें फिर जिगर में मचलने लगीं
सोचकर ही सनम को सँवरने लगीं।

कब मिलोगे बताओ कभी तो हमें
रातें यूँ हीं जुदाई में कटने लगीं।

हो रहा है नशा बिन पिये ही हमें
दिल्लगी भी फ़िज़ाएँ ये करने लगीं।

मत रहो अब ख़फ़ा ज़िन्दगी को जियो
महफ़िलें इश्क़ की अब तो सजने लगीं।

छा रही है घटा आँख में है नमी
जब मिला साथ दोनों बरसने लगीं।

अब मिलो तो सही दिन बहुत हो गये
दूरियाँ अलका अब तो अखरने लगीं।

( कॉपीराइट कलाकृति – सच्चिदानंद किरण )

Leave a Reply

Your email address will not be published.