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  • नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’

 

हाथ में अबीर लेकर सजी धजी झुनी अपने मुहल्ले के सभी महिलाओं को अबीर लगाने गई। वह सभी घर घूमते, अबीर लगाते और पकवानों से पेट भरते अपनी सहेली सीता के घर गई। हालांकि सीता अपनी ससुराल में थी। ऐसे तो झुनी को बाकी दिनों में पढ़ाई से समय मिलता नहीं है होली के बहाने ही सभी से मेल मिलाप हो जाता है।

चाची अपने कमरे में बैठी मिल गई। उसने चाची के पैरों पर अबीर चढ़ाया। उन्होंने आशीर्वाद देते उसके गालों पर लाल अबीर लगा दिया।

कुछ देर यहाँ-वहाँ की बातें होती रही दोनों में। बाहर से चाचा आए। झुनी ने उनके पैरों पर भी अबीर चढ़ाया। वह अंदर चले गए।

किचन से खट-पट की आवाज आई। सभी के घरों में थोड़ा-थोड़ा पकवान खाते-खाते झुनी का पेट भर गया था।

उसने कहा, “चाची, मुझे कुछ पकवान खाने को मत दीजिएगा। पेट बहुत भरा हुआ है। चाचा को मना कर दीजिए कुछ न लाएं।”

“पकवान!” चाची चौंक पड़ी, “मेरे यहाँ तो पकवान बना ही नहीं है। मैं तुझे क्या खिलाऊँगी? जबकि मैंने और तेरे चाचा ने आज पकवान का मुंह ही नहीं देखा।”

“क्या मतलब..? आप होली नहीं मना रही हैं?”

तभी चाचा एक कटोरी में दूध-चूरा लेकर वहाँ आए और एक कुर्सी पर बैठ कर खाने लगे।

चाची ने भरे गले से कहा, “सुबह से हम दोनों दूध-चूरा ही खा रहे हैं। मेरे घुटने में आज दर्द ज्यादा ही था, इसलिए कुछ नहीं बनाई।”

“आपकी दोनों बहुएँ! बड़ी भाभी तो बगल में ही रहती हैं न!”

“हाँ, रहती है, मगर पूछती कहाँ है। बेटा भी नहीं पूछता। छोटी बहू दो दिन पहले मायके गई और बेटा आज सुबह अपनी ससुराल होली मनाने गया।”

“अपने बूढ़े माता-पिता को अकेले छोड़ कर वह चला गया, किसके भरोसे?” झुनी के मुंह से निकल गया।

“दूध-चूरा के भरोसे…” चाचा की आँखों में कुछ तैरने लगा।

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