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– मुकेश बोहरा अमन

साइकिल मेरी रंग-रंगीली ,
छोटी, सुन्दर है शर्मीली ।
करता हूं मैं रोज-सवारी,
जिसकी सीट है नीली-पीली ।
गोल-गोल दो चक्के प्यारे ,
चलते है तब लगते प्यारे ।
घंटी की टन, टन-2 टन-2
मन को लगती है हर्षिली ।
बच्चे, बढ़े, युवासाथी ,
दुनिया की काफी आबादी ।
सैर-सपाटा करती इस पर,
इसकी शान बड़ी अलबेली ।
बच्चों के मन भाती है ये ,
हर घर में मिल जाती है ये ।
चाल है गजगामिनी जैसे ,
साइकिल मेरी है नखराली ।
– गीतकार
बाड़मेर राजस्थान
8104123345
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