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– मनिन्दर कौर

प्रकृति का सुंदर नज़ारा है,
नदिया का खुबसूरत किनारा है|
एक कुछ रूठा सा, दूसरा मतवाला है|
नदिया के पास जब मैं जाती हूँ,
मैं भी नदिया बन जाती हूँ|
रूठे मन को ज़रा मनाती हूँ,
नदिया के बहाव में;
मैं भी बह जाती हूँ|
पानी आगे जो बढ़ गया,
वह फिर लौट के ना आएगा|
अपने अतीत को बहाती हूँ,
फिर फूलों सी खिल जाती हूँ|
फूलों की लाली मुख पर लिए।
नीले अंबर की ओढ़ चुनरिया|
लौट के जब आती हूँ,
मन निर्मल हो जाता है|
प्रकृति का सुंदर नज़ारा है,
नदिया का खुबसूरत किनारा है|

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