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– डॉ. निरुपमा राय

“हां ! मैं रघुवीर मिश्र, ठीक पहचाना, इस राज्य का वही किसान जिसे सर्वश्रेष्ठ किसान का सम्मान मिला था, जो धरती को अपनी मां समझता था, सारी दुनिया ही जिसके लिए समाज थी… । वह सीधा सादा रघुवीर मिश्र … हां वो ही जो धान की एक-एक किस्म पर घंटों भाषण दे सकता था … खेत की उर्वरा शक्ति को देखकर ही पहचान लेता था… बीज को छूते ही उसे भान हो जाता धान की फसल कितनी होगी …. “ कहते कहते वो बुरी तरह हांफने लगा था । टी. वी. चैनल के उद्घोषक ने उसे संभालते हुए एक गिलास पानी लाने का आदेश दिया । एक सांस में पूरा ग्लास खत्म करके उस वृद्ध व्यक्ति अर्थात रघुवीर मिश्र ने अपनी भीगी आंखें पोंछकर टीवी स्क्रीन की ओर देखा…  परसों रात से एक ही समाचार को बार-बार चलाया जा रहा था वही, समाचार” देखिए भूख और गरीबी ने कैसे एक इंसान को कुत्ते की तरह जीवन जीने के लिए विवश कर दिया ….  हां .. हम शहर के संभ्रांत इलाके के उसी मोहल्ले की बात कर रहे हैं जहां पिछले कुछ महीनों से एक बूढ़ा भोजन की तलाश में भटकता पाया गया है…. आसपास बनी बहुमंजिला इमारतों में रहने वाले पत्थर दिल लोगों में से भी कुछ लोग ऐसे थे जो रस्सी के सहारे पॉलिथीन में खाना बांधकर नीचे की और लटका दिया करते थे और वह बूढ़ा सारा खाना निकाल कर अपनी झोली में भरता जाता था…. रोटी सब्जी दाल मिठाई और बहुत सारी चीजें एक ही थैली में भरता जाता … कभी दिखता कभी अचानक से गायब हो जाता .. और आज फिर देखिए हमारे चतुर खोजी पत्रकारों ने उसे ढूंढ ही लिया … और देखिए … यह बड़ी-बड़ी लंबी रस्सियों और जंजीरों में पॉलिथीन और कपड़े की थैली में लटके खाने को लेने के लिए वह आ रहा है… आ रहा है … अपने कैमरामैन से हम कहते हैं..। जूम करके दिखाएं… यह देखिए यही है वह बूढ़ा जो महीनों से जूठा बासी खाना खाने के लिए विवश है…।“

उस बूढ़े के गले से जोरदार खांसी निकली किसी तरह अपनी खांसी को संयमित करते हुए उसने टीवी चैनल के उद्घोषक से कहा, “बार-बार एक ही चीज को टीवी में क्यों चला रहे हो मेरी विवश जिंदगी को समाचार की चासनी में लपेटकर क्यों परोस रहे हो बेटा ! इससे समाज को क्या संदेश मिलेगा क्या मुझ भूखे की भूख को कोई समझ सकेगा …कोई समझ सकेगा … कि किन विडंबनाओं से जूझ कर यहां तक पहुंचा हूं?”

उद्घोषक ने मधुर स्वर में कहा ,”बाबा, सारा देश आपकी कहानी सुनना चाहता है !”

“कहानी सुनकर क्या होगा?”

“हम आप के दर्द को समझ कर आपके लिए…. आपकी बेहतरी के लिए कोई उपाय सोचेंगे”

“उपाय !!! उपाय ही तो नहीं मिला कोई जो आज मैं यहां पहुंच गया हूं..  दर दर की ठोकर खाकर.. ठीक दिखा रहे हैं आप कुत्ते की तरह जूठे खाने पर झपटना मेरी नियति बन गई….!”

बूढ़ा फूट-फूट कर रोने लगा सारे कैमरे बूढ़े के चेहरे की तरफ घुमा दिया गए…. झुर्रियों भरा बूढ़े का लाचार चेहरा.. चेहरे पर धंसी दो आंखों में वेदना के चिन्ह ….लगातार बहते आंसू …थरथर कांपता शरीर…. टीवी स्क्रीन पर रोते बिलखते बूढ़े का चित्र बार-बार  दिखाया जा रहा था।. पता नहीं इस भौतिकवादी युग में मानवीय संवेदनाएं कहां जाकर ठिठक गई हैं,…. स्क्रीन पर बार-बार.. रोते-कांपते उस वृद्ध व्यक्ति का असहाय चेहरा कौंध रहा था और लोग उसे एक कथा की तरह देख रहे थे।मीडिया और समाचार पत्रों के लिए यह ब्रेकिंग न्यूज़ थी लोगों के लिए एक नई खबर  और उस वृद्ध असहाय के लिए अपमान और वेदना का दस्तावेज ।

आखिरकार यह तय हुआ ,की अच्छी तरह खाना-पीना खिलाकर उस बूढ़े व्यक्ति से उसकी कहानी पूछी जाएगी। तत्काल उस बूढ़े को शहर के वृद्ध आश्रम में भेज दिया गया। दूसरी सुबह एक एनजीओ के कुछ व्यक्ति और कुछ पत्रकार बूढ़े से मिलने आए और उनकी कहानी के बारे में जानना चाहा ।फिर जो कथा निकलकर सबके सामने आई ,उसने सबको संज्ञाशून्य बना डाला। एक अच्छे -भले व्यक्ति की विडंबनाओं से भरी गाथा …जहां वह कहीं दोषी नहीं था ..समाज और उससे उत्पन्न विभिन्न  विडंबनाओं के चक्रव्यूह में फंसकरअंततः फेंके हुए अन्न पर पराश्रित जीवन जीने के लिए विवश हो गया था।

किस्मत हो तो रघुवीर जैसी.. धन – धान्य की कोई कमी नहीं सुंदर सुशील जीवनसंगिनी दो बेटे चार बेटियां, भरा पूरा परिवार सुंदर स्वस्थ दो गाय जो दरवाजे पर बंधी थी ,साल भर अन्न उपजाने वाली उपजाऊ धरती. 1 एकड़ में फैला आम का विशाल बगीचा…पूरा गांव रघुवीर की किस्मत से ईर्ष्या करता था। रघुवीर भी अपने भरे पूरे परिवार और फलती फूलती खेती के बीच स्वयं को संसार का सबसे सौभाग्यशाली मनुष्य मानता था ।जब भी कोई कहता कि रघुवीर एक संपन्न किसान है तो रघुवीर हंसकर कहता अरे नहीं नहीं मुझे देखकर तो सारे लोग कहते हैं… कि सान छै !!!  (क्या शान है)

पर यही इंसान भूल कर जाता है, उसे ज्ञात ही नहीं होता वह तो नियति के हाथों की कठपुतली मात्र है। नियति जैसा चाहेगी वैसा ही होगा । बेटियां बड़ी हो रही थीं गांव के ही स्कूल में पुस्तक पढ़ने लायक शिक्षा दिलवाकर चारों बेटियों का विवाह धूमधाम से किया रघुवीर ने ।  झूठी शान.. दिखावा.. दहेज की मोटी रकम ..अपना गांव ही नहीं ,आली पाली के गांवों को न्योता देकर भोजन कराना और अपनी मूंछों पर ताव देना रघुवीर को शांति प्रदान करता था । बहुत कोशिश की दोनों बेटे पढ़-लिख जाएं पर उन दोनों को जैसे दुनिया में पढ़ाई लिखाई छोड़ कर बाकी अन्य सभी कामों से बेहद प्यार था । अपने दोनों नाकारा बेटों को देखकर रघुवीर की छाती पर जैसे सांप लोटने लगते थे। वह हमेशा उन्हें फटकारते हुए कहता, अरे मूर्खों कुछ पढ़ो जीवन में आगे बढ़ने की सोचो मैं कितने दिन हूं .. लगभग सारी खेती वाली जमीनें तो तुम्हारी बहनों के विवाह में स्वाहा हो गयीं  थोड़ी बहुत जो जमीन बची है उससे किसी तरह से तुम लोगों का लालन-पालन कर रहा हूं। सोचो मेरे जाने के बाद तुम दोनों का क्या होगा ? और तुम्हारी बूढ़ी मां का क्या होगा?

एक  दिन बड़े बेटे ने तो तेज जवान में कुछ ऐसा कह   दिया था,कि ऊपर से नीचे तक मानो जडवत रह गए थे रघुवीर मिश्र।

“ जब पता है कि हमारे समाज में दहेज- प्रथा कभी नहीं मिटने वाली.. सुरसा की तरह मुंह फाड़ -फाड़ कर दहेज मांगते हैं लड़के वाले…तो  चार-चार बेटियां पैदा करने की क्या जरूरत थी?” किंकर्तव्यविमूढ़ बैठे रह गए थे रघुवीर भीगीआंखों से पत्नी को देख कर बस इतना कहा था,” कौन सा पाप किया था जो ऐसे सपूत जन्मे …!”

जितनी भी जमीन बची थी उसमें किसी तरह मकई की खेती करके  रघुवीर अपना और अपने परिवार के लोगों का पालन पोषण करने लगे। इसी में से कुछ बचा कर चारों बेटियों की ससुराल भी भेजना पड़ता था । बस एक एकड़ में फैला आम का बगीचा यह संतोष देता था की समय आने पर एक पूंजी तो हाथ में है।

दोनों बेटे कभी ताश खेलते तो कभी जुआ खेलते पकड़ाते।  रघुवीर मिश्र उनकी मरम्मत करते, मारते मारते हाथ थक जाता, लाठी टूट जाती पर लड़कों के कान पर जूं तक नहीं रेंगती । किसी तरह अपने जानने पहचानने वाले लोगों की मदद लेकर रघुवीर ने दोनों बेटों को छोटे-मोटे काम पर लगा दिया था। थोड़ा बहुत कमाई आने लगी तो उनका शादी ब्याह भी करवा दिया पर नियति न जाने क्या ठाने बैठी थी…दोनों बहुएं कर्कशा और बातूनी थी क्या मजाल तो कोई बात में उनसे जीत जाए। धीरे धीरे चूल्हा चौका भी अलग हो गया। पुरखों के बनाए एक घर में तीन चूल्हे जलने लगे और फिर नियति ने फेंका अपना  एक और पत्ता  … जो थोड़ी बहुत जमीन बची थी उस पर खेती करने के लिए रघुवीर ने साहूकार से पच्चीस हजार रुपए कर्ज लिया, सोचा मकई की फसल कटने पर कर्जा चुका दिया जाएगा। गांव देहात में आज भी साहूकारों का बोलबाला है ही, और ऊपर से तुर्रा यह सूद की राशि कुल रुपयों की बीस प्रतिशत होगी…  रघुवीर ने सोचा दोनों बेटों के साथ मिलकर मकई की खेती करूंगा और फसल काटने पर सारा पैसा चुका दिया जाएगा । फसल तीन  महीनों में लहलहाने लगी थी । देख -देख कर रघुवीर का हृदय मानो नृत्य करता था । इस बार बहुत अच्छी फसल हुई थी, आराम से साहूकार का कर्जा चुका दिया जाएगा साल भर के लिए अनाज भी खरीद कर कोठियों में रख लिया जाएगा …! पर इंसान जो सोचता है हमेशा वैसा होता नहीं है। नियति अब अपना तुरुप का पत्ता फेंकने वाली थी, कुछ दिनों से भारी वर्षा हो रही थी। दिन -रात मेघ गरज रहे थे न जाने प्रकृति को क्या हो गया था। गांव के वातावरण में एक बात गूंज रही थी कि कोशीनदी  इस बार विकराल रूप धारण करने वाली है । दिन रात हो रही बरसात और कटाव ने बाढ़ को साक्षात निमंत्रण दे दिया था । आखिरकार वह समय आ गया, कोसी की भयंकर बाढ़ ने रघुवीर मिश्र को भी नहीं छोड़ा । उस के अरमानों को भी मानो अपने गंदे मटमैले जल के साथ ही बहा ले जाने के लिए आतुर हो उठी थी। आज भी याद है रघुवीर को शाम की गोधूलि बेला में अचानक से लाउडस्पीकर चीखने लगे…”.गांव के सभी लोगों को सूचित किया जाता है कि दो घंटे के अंदर जरूरी माल- असबाब लेकर टोलों  को खाली कर दें और बांध पर शरण ले लें… किसी भी समय  कोशी की विशाल विकराल लहरें इस गांव को समेटने वाली हैं ….जल्दी कीजिए ….अपना जरूरी सामान लेकर अपनी जान बचाने के लिए बांध पर आ जाइए…. सभी से निवेदन है बांध पर आ जाएं….. जल्दी कीजिए …जल्दी..”

गांव के सभी लोगों की तरह रघुवीर भी अकस्मात सर पर आ गई इस विपत्ति से सन्न रह गया था । जरूरी सामान?.. उसे समझ में नहीं आ रहा था कौन सा सामान उठाए और कौन सा छोड़े आज दुख की इस विकट बेला में अपने घर का सभी सामान उसे विशिष्ट ही लग रहा था और यही मनुष्य का स्वभाव भी है।

उसने बीमार पत्नी का हाथ पकड़ा और जो भी थोड़ी बहुत पूंजी पास में थी उसे एक पोटली में बांधकर बांध की ओर दौड़ लगा दी। जाते-जाते बेटों को भी सचेत कर गया … सभी बांध की ओर दौड़ने लगे । भगदड़ सी मच गई…. कुछ ही देर में गांव के गांव बांध के ऊपर सिमटने लगे और कुछ ही घंटों में बांध के चारों तरफ तेजी से गरजती ….. दूध की तरह फेन को अपने साथ उड़ाती .. भयावह जल राशि ने सब कुछ अपने गर्भ में समेट लिया। सब कुछ कोशी में समाते चले गए…. गांव के गांव.. मकान खेत …… मवेशी और कुछ असहाय लोग भी । यह जीवन का बेहद कठिन दौर था जब सभी  एक एक दाने को मोहताज हो गये थे । अन्न उगाने वाला किसान एक-एक दाने को तरस गया था । रघुवीर का परिवार भी इसका अपवाद नहीं था । किसी तरह कुछ दिन सरकारी टेंट में गुजरे और उसके बाद आसपास के खाली जगहों पर लोगों ने अपने घर बसाने शुरू किए । जीवन टेढ़ी-मेढ़ी गति से गतिमान था । ऐसे में भी साहूकार अपने ऋण को भूला नहीं था उसके रोज-रोज के तानों से तंग आकर रघुवीर ने शेष बची जमीन जो ऊपरी इलाकों में थी , बेचकर उसका कर्जा चुका दिया ।बेटों और उनकी  पत्नी ने बहुत विरोध किया बहूएं तो गाली गलौज पर उतर आई थीं । पर रघुवीर ने उस जमीन को बेचकर अपने माथे का कर्जा उतार लिया । उसे भली भांति ज्ञात था ऋण सबसे बड़ा पाप है और विडंबना यह है, कि अन्नदाता कहे जाने वाले किसान इस पाप को करने के लिए आज भी विवस हैं । अच्छा भला संपन्न परिवार रातों-रात भिखारियों की श्रेणी में आ गया था ।

कुछ महीनों के बाद जब बाढ़ का पानी उतरा, टूटे-फूटे कीचड़ से भरे अपने घरों को देखकर सब का कलेजा मुंह को आ गया। फिर भी यह जीवन है ,यह तो हर क्षण गतिमान रहता ही है । रघुवीर की पत्नी इस आघात को सहन नहीं कर पाई और जल्दी ही ईश्वर को प्यारी हो गई । जब दाने-दाने को परिवार मोहताज हो गया तो रघुवीर अपने दोनों बेटों के साथ शहर चला आया । संपत्ति के नाम पर केवल आम बाड़ी बच गई थी, उसे भी बेच कर पूरा परिवार शहर के एक छोटे से टोले में एक कमरा किराए पर ले कर रहने लगा । रघुवीर निरंतर बूढ़ा होता जा रहा था कमाने खाने लायक नहीं रह गया था । ऐसे में बेटे अपनी पत्नियों के साथ अलग दुनिया बसाने की होड़ में लग गए और धीरे-धीरे उस टीन की छप्पर वाले छोटे से कमरे में वो अकेला रह गया । एक तो बुढ़ापा, उससे भी भारी भूख !!  बेटे और बहुओं ने रघुवीर को माथे का बड़ा बोझ समझकर अपने परिवार से ही नहीं, मानो जिंदगी से बाहर निकाल दिया था । एक उन्नत और फलता फूलता किसान परिवार जीवन के कई घातों को सहन करता हुआ धूल घूसरित हो गया था। जब पेट की भूख सताने लगी बूढ़े रघुवीर को घर से निकलना ही पड़ा। आसपास से जूठा  और बासी खाना मांगना उसकी नियति हो गई थी ।

समाज की कुरीतियों और आपदाओं ने एक अच्छे भले किसान का जीवन लील लिया था। दहेज, समाजिक कुव्यवस्था, सरकारी योजनाओं का अभाव, या जानकारी का ना होना, बाढ़, सुखाड़, न जाने क्या-क्या …. जो किसान अन्नदाता है वहीं अन्य की एक मुट्ठी के लिए मोहताज हो गया था।

इस करुण कथा को सुनकर पूरे कमरे में गहरा सन्नाटा व्याप्त हो गया था । बूढ़े की कहानी सुनकर सभी हतप्रभ रह गए थे ।

“बाबा! आप की कहानी सुनकर हमारी तो आंखें भर आई आपने जीवन में कितनी कठिनाइयां झेली है ….हम कोशिश करेंगे कि अब आपको भूखा ना रहना पड़े । आप इसी  संस्था में रहिए…. अब आपको भीख नहीं मांगने पड़ेगी …जूठन नहीं खाना पड़ेगा… आपकी इस कहानी ने तो हमें हिला कर रख दिया।“ सहसा रघुवीर ने पास ही रखी छड़ी को कंपकंपाते हाथों से उठाया और गहरी नजर से उन सभी को देखते हुए कहा ,

“क्या कहा?  बाबा आप की कहानी सुनकर हमें बहुत दुख हुआ?  नहीं …..!  यह कहानी नहीं है …..। “कहते हुए रघुवीर धीमे लड़खड़ाते कदमों से उस कमरे से बाहर निकल गया । कमरे में गहन सन्नाटा व्याप्त हो गया …. उस सन्नाटे से एक चीख उभरी……नहीं यह कहानी नहीं यथार्थ है…..!!

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