Spread the love

– सिद्धेश्वर

 

राजभाषा हिंदी हमारी भारतीय संस्कृति और बाजारवाद का एक हिस्सा है l और इस कारण यह राष्ट्रभाषा होने की अधिकारणी भी है l दुर्भाग्य है कि आजादी का अमृत महोत्सव मनाते हुए भी हम अपने देश की भाषाई संस्कृति को बनाए रखने के लिए हर साल हिंदी दिवस मनाने को विवश होते हैं l और हिंदी दिवस के दिन ही हिंदी को पूरा मान सम्मान देते हैं l हिंदी दिवस,, हिंदी सप्ताह और हिंदी माह गुजर जाने के बाद, फिर हिंदी अंग्रेजी की दासी बनी रह जाती है l  देश की राजनीति सिर्फ जनता के भाव को तौलती हुई नजर आती है, लेकिन देश की 80% जनता की भाषा को मातृभाषा के रूप में प्रतिस्थापित करने में असफल रह जाती है l

सवाल यहां पर यह भी है कि अपनी भारतीय भाषा संस्कृति में हिंदी को सर्वोच्च स्थान देने के लिए, हिंदी भाषी क्षेत्र के लोग भी एक मत क्यों नहीं होतें ? सालों भर हिंदी को व्यवहारिक भाषा क्यों नहीं बनाते ?  देश की मातृभाषा के लिए, सिर्फ साहित्यकार और पत्रकार ही अपनी अहम भूमिका का निर्वाह क्यों करते हैं ?

हिंदी के हितेषी राजवर्धन ने ठीक ही कहा है कि संस्कृति एक सामासिक पद है, जबकि धर्म, जाति, भाषा, भौगोलिक स्थिति, खानपान व रस्मो रिवाज इकहरी चीज है l संस्कृति में धर्म, जाति,  भाषा, परंपरा व भौगोलिक स्थिति का समावेश होता है l इसके अतिरिक्त अन्य बहुत से सामाजिक व आर्थिक कारक होते हैं जो किसी खास क्षेत्र की संस्कृति को सुनिश्चित करते हैं! यानी किसी खास भौगोलिक स्थिति व एक ही भाषा में रहने वाले लोगों की संस्कृति में बहुत हद तक समानता होती है परंतु उसी भाषा क्षेत्र में रहने वाले अलग-अलग धर्म व जाति के लोगों की संस्कृति में थोड़ा सा फर्क जरूर होता है l

इस प्रकार आर्थिक सामाजिक भिन्नता के बावजूद एक भाषाई भौगोलिक क्षेत्र में रहने वाले लोगों की संस्कृति कमोबेश एक जैसी होती है l उदाहरण के लिए बँग संस्कृति, मैथिली संस्कृति, राजस्थानी संस्कृति, भोजपुरी संस्कृति आदि l इसलिए हिंदुस्तान के लिए विभिन्न भाषाएं क्षेत्रों के संस्कृति में विभिनता के बावजूद भी मूल तत्व समान दिखते हैं l फिर इस मूल तत्व के तहत हम हिंदी को वह सम्मान क्यों नहीं दे सकते ?

हमारी राजभाषा हिंदी का यह दुर्भाग्य है कि जब भी भाषाई संस्कृति की बात होती है, सभी अपने अपने क्षेत्र की बोलियों को, सबसे आगे रखने के प्रयास में, हिंदी को ढकेल कर पीछे धकेल देते हैं l और फिर इस प्रकार यहीं पर हिंदी बेचारी राजभाषा बन कर रह जाती है  और तमाम कोशिशों के बावजूद, हिंदी आज तक  राष्ट्रभाषा नहीं बन सकी है l इसलिए इसके लिए सिर्फ सरकार दोषी नहीं हम सब दोषी हैं l

सालों भर अंग्रेजी का गुणगान करते हुए और अपने अपने क्षेत्रीय भाषाओं के लिए लड़ते हुए, सिर्फ एक दिन, एक सप्ताह या एक माह हिंदी की पूजा कर, हम हिंदी को वह स्थान नहीं दिला सकते, जिसकी वह अधिकारणी है l इस प्रकार हम सिर्फ हिंदी को बढ़ावा देने का औपचारिकता निभाते हैं, झूठा दिखावा करते है या नहीं ?

आजादी के अमृत महोत्सव का जश्न मनाते हुए, हमें इस बात की चिंता भी अवश्य करनी चाहिए, कि हम भाषाई रूप से कब स्वतंत्र होंगे, कब आजाद होंगे ? हिन्दी कब हमारे देश की एक राष्ट्र भाषा होगी l यानी दिखावे के लिए सिर्फ राजभाषा नहीं, बल्कि हिंदी कब मातृभाषा होगी? जब तक हमारे देश की मातृभाषा हिंदी नहीं बनती, तब तक  हमारी भाषीय संस्कृति के मूल तत्व का दर्शन नहीं हो सकता l और हम आजाद मुल्क में भी भाषाई गुलामी को ही झेलते रहेंगे !

राजवर्धन ने इस संदर्भ में एक बात बहुत सही कहा है कि हिंदुस्तान के विभिन्न क्षेत्रीय समूहों के सांस्कृतिक मिलन से जिस वृहत सामासिक संस्कृति का निर्माण हुआ है, वहीं भारतीय संस्कृति हमारी है l  यानि अनेकता में एकता ही हमारी पहचान है l

जिस प्रकार गंगा में छोटी  बड़ी नदियां अपने स्वतंत्र अस्तित्व को बचाए रखकर, उसमें समाहित हो जाती है l ठीक उसी तरह क्षेत्रीय संस्कृति भी अपनी विशेषता को बचाकर सामासिक भारतीय संस्कृति का निर्माण कर सकती है l इसलिए प्रायः लोग यह कहते हैं कि भारतीय संस्कृति का विशिष्ट गुण है विविधता में एकता l

किंतु विविधता में एकता की बात वहां पर कमजोर हमें दिखती है, जहां पर विभिन्न क्षेत्रीय भाषा के लोग, हिंदी को देश की राष्ट्र भाषा बनाने के लिए एकमत नहीं हो पाते l आखिर ऐसा क्यों? यह हमारा सवाल है, उन तमाम हिंदी सेवियों  के सामने, जो हिंदी का हो कर भी हिंदी के नहीं हैं l हमारे सवाल है उस सरकार के आगे, जो राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की मूर्ति पर माला तो चढ़ाते हैं, लेकिन उनकी कथन को सार्थक नहीं कर पाते, जिस कथन को महात्मा गांधी ने कहा था कि हमारे देश की राष्ट्रभाषा हिंदी ही हो सकती है कोई दूसरी भाषा नहीं l

अंग्रेजी पर गर्व करने वाले भारतीयों को भी महात्मा गांधी की वह बात याद करनी होगी जब उन्होंने हिंदी प्रेम में कहा था कि दुनिया को कह दो कि गांधी अंग्रेजी नहीं जानता l आज यह बात कहने में तो ना जाने कितने हिंदुस्तानियों को शर्म आएगी l वह तो आज भी गर्व से लोगों के बीच कहते हैं कि हमें अंग्रेजी खूब आती है l हिंदी तो गवारुओं की भाषा है l

भारतीय संस्कृति को बाजारवाद से भी जोड़कर देखा जाता रहा है l और वह सही भी है l आज हमारे देश में बाजार का एक मजबूत हिस्सा है हिन्दी l इसके बावजूद हम हिंदी के ऊपर अंग्रेजी का लेबल चिपकाते फिरते हैं l महात्मा गांधी पश्चिमी की मशीनी सभ्यता का विरोध करते थे l क्योंकि मशीनी सभ्यता जरूरत से ज्यादा उत्पादन करती थी और उसकी खपत के लिए बाजार चलाती थी तथा उपनिवेश बनाकर शोषण करती थी l

आज के बाजार में यही शोषण अंग्रेजी कर रही है! और धीरे-धीरे भारतीय संस्कृति और व्यावसाय को अपनी दासी बना रही है l इन बातों को हम गंभीरता से ले भी नहीं रहे, यह हमारा दुर्भाग्य है l इसके बावजूद हमें यह स्वीकार करना ही पड़ता है कि यदि हिंदी बाजारवाद का हिस्सा न बने तो विदेशी वस्तुओं की खपत भी बहुत कम हो जाएगी l क्योंकि आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है l और आज मोबाइल से लेकर गूगल फेसबुक, व्हाट्सएप के माध्यम से, अंग्रेजी के साम्राज्य को थोड़ा कम करते हुए, हिंदी की उपयोगिता बढ़ाई जा रही है, ताकि यह व्यवसाय विश्व भर में फैल सके l हिंदी यदि तमाम विरोध के बावजूद टिकी हुई है तो, भारतीय बाजारवाद और भारतीय फिल्मी संगीत के कारण l हिंदी फिल्मों ने व्यवसाय को एक नया रास्ता दिया है l और पूरे देश ही नहीं विश्व भर में हिंदी फ़िल्म और हिंदी फिल्मी गानों का व्यवसाय खूब फल फूल रहा है! इस कारण कुछ मुट्ठी भर लोग, जो हिंदी को पनपना देखना नहीं चाहते, हिंदी के इस विकास को पनपने नहीं देते और ये लोग ही हिंदी को मातृभाषा बनाने से जबरन रोक रहे हैं l

भारतीय संस्कृति और बाजारवाद की दृष्टि से भी हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाना बेहद जरूरी है! यदि हमारे देश के शासक अपने निहित स्वार्थ से बाहर आ जाए और मजबूत इरादा कर ले, तो हिंदी को मातृभाषा बनने से कोई रोक नहीं सकता

  • “सिद्धेश् सदन” अवसर प्रकाशन, (किड्स कार्मल स्कूल के बाएं)

द्वारिकापुरी रोड नंबर:०2, पोस्ट: बीएचसी,  हनुमाननगर ,कंकड़बाग ,पटना 800026 (बिहार )मोबाइल :92347 60365 ईमेल:[email protected]

Leave a Reply

Your email address will not be published.