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     ◆ अभिजित दूबे

 

साहब का जन्मदिन था।

सबमें उत्साह था। कौन कितना अधिक वफादार है, यह साबित करने की होड़ मची हुई थी।

केक लाया गया।

चेहरे पर थोड़ा सा ही सही, केक लगाने की अनुमति मांगी गई। सबसे नजदीक के चमचों में से दो ने साहब के चेहरे पर अपनी उंगली से केक लगाकर रश्म अदायगी की। सबने दाँत निपोरकर करोडों-करोड़ बार अपने बॉस को शुभकामनाएं दीं। इस साल जिनकी-जिनकी पदोन्नति होनीं थी, उनका तो उत्साह अपने चरम पर था। चूंकि पदोन्नति में सीट रिक्तियाँ  कम थी और प्रत्याशी अधिक थे, अतः सब अपने अपने तरीके से बॉस को रिझा रहे थे।  सभी अपने – अपने होमवर्क के हिसाब से लगे हुए थे।

एक ने अंत में तो केक साहब के चरणों में अर्पित करते हुए बोलना शुरू किया,

” सर, आज आपका अवतरण दिवस है। धन्य हैं आपके माता-पिता जिन्होंने आपके जैसे महान विभूति को जन्म दिया। सर, आपने अपना राज्य, अपना देश का बहुत नाम रौशन किया।  हम इस संस्था में कार्यरत होने से अधिक इस कारण से पहचाने जाते हैं कि हम आपके मातहत हैं। सर, इस महान संस्था के प्रत्येक कर्मचारी आपके प्रति कृतज्ञ हैं कि इस संस्था को आपने अपनी सेवा दी। आज आपका नाम इस संस्था के नाम का पर्याय बन गया है।  आप नहीं आते तो इस संस्था को कोई नहीं जानता। आप इस संस्था के कण-कण में हैं, और अगर मेरे पास शक्ति रहती तो हनुमान की तरह अपना सीना चीर कर दिखा देता, कि आप मेरे हृदय में बसे हुए  हैं।

इतना कहकर उसने केक का टुकड़ा साहब के चरणों में समर्पित कर दिया और साष्टांग लोट गया। ”

साहब अभिभूत हो गए, सभी कर्मचारी भावुक होने का अभिनय करने लगे। लग रहा था जैसे भरत मिलाप हो रहा है। बंदे ने बाजी मार ली थी।

साहब ने उसे चरणों से उठाया और गले लगा लिया।

साहब ने कहा, “तुम्हारी जगह मेरे हृदय में है।  इस संस्था को आपके जैसे होनहार ने संवारने में अपना सर्वस्व दिया है।”

साहब अभिभूत थे। बंदे ने बाजी मार ली थी, पदोन्नति का परिणाम तय हो चुका था ।

 

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