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– अलका मित्तल

 

कच्चे मकाँ हुए अब पक्के पत्थर दिल इंसान हुआ,
पता पूछ रहे इक दूजे से रहता अब इंसान कहाँ?
अपने सपने लाद दिये बचपन बच्चों का बचा कहाँ,
बरस-बरस के बदरा पूछे काग़ज़ की अब नाव कहाँ?
ब्याह शादी की हँसी ठिठोली नानी दादी की सीख कहाँ,
रूठना लड़ना और मनाना रिश्तों में अब वो प्यार कहाँ?
बलात्कार और लूट डकैती इंसानियत अब रही कहाँ,
सूख गया आँखों का पानी दिल में अब जज़्बात कहाँ?

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