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– अपूर्व कुमार

प्रेमचंद (31 जुलाई 1880 – 8 अक्टूबर 1936)का मूल नाम धनपत राय श्रीवास्तव था जो नवाब राय या मुंशी प्रेमचंद के नाम से भी जाने जाते है।वे आम पाठक के खास उपन्यासकार और कहानीकार सदा के लिए अपनी संवेदनशील रचनाओं की बदौलत हो गए। उन्होंने पंद्रह उपन्यास, तीन सौ से अधिक कहानियां ,दस अनुवाद ,सात बाल पुस्तकें की रचना के साथ संपादन का दायित्व भी संभाला। सबों की भाषा सहज और सुस्पष्ट। वे मन की आवाज लिखते थे।बिना साहित्य की चाशनी में डूबाए।
आज की बढ़ती सामाजिक विद्रूपताएं,विसंगतियों एवं विडंबनाओं के इस दौर में संवेदनाओं के साहित्यकार प्रेमचंद के साहित्य की प्रासंगिकता और बढ गई है। उनकी सभी कृतियों के आधार में संवेदनाएं नजर आती हैं।खास बात यह है कि उनकी संवेदनाएं केवल वंचित-शोषित-दलित के प्रति न होकर प्राणी मात्र के लिए हैं।
दरअसल प्रेमचंद ऐसे साहित्यकार थे जो साहित्य की कलम में, संवेदनाओं की स्याही भरकर, आत्मा की नींब से लिखा करते थे। वे साहित्यकारों के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए लिखते हैं कि-
“साहित्यकार का काम केवल पाठकों का मन बहलाना नहीं है। यह तो भाटों , मदारियों, विदूषकों और मसखरों का काम है। साहित्यकार का पद इससे कहीं ऊंचा है। वह हमारा पथ प्रदर्शक होता है। वह हमारे मनुष्यत्व को जगाता है। हमारे सद्भावों का संचार करता है। हमारी दृष्टि को फैलाता है।”

1936 में लखनऊ में आयोजित प्रगतिशील लेखक संघ के प्रथम अधिवेशन में भाषण देते हुए प्रेमचंद जी ने कहा था,
“साहित्यकार का लक्ष्य केवल महफ़िल सजाना और मनोरंजन का सामान जुटाना नहीं है – उसका दरज़ा इतना न गिराइए। वह देशभक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई भी नहीं है, बल्कि उसके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सच्चाई है।”

पुन: साहित्य के विषय में उनका कहना था-
“वही साहित्य, साहित्य कहलाने का अधिकारी है जो हमारी सुरुचि को जागृत करता है, हमें आध्यात्मिक और मानसिक तृप्ति प्रदान करता है तथा मनुष्य में गति, संकल्प, कठिनाईयों पर विजय प्राप्त करने की दृढ़ता और सौंदर्य प्रेम पैदा करता है।”

लेखन को वह तो अपना परम कर्तव्य मानते हुए कहा करते थे-
”मैं एक मजदूर हूँ। जिस दिन कुछ लिख न लूँ, उस दिन मुझे रोटी खाने का कोई हक नहीं।”
अब ऐसे साहित्यकार की प्रासंगिकता जिस दिन समाप्त होगी उस दिन साहित्य के साथ मानवता का अध्याय भी समाप्त हो जाएगा!
आज के दिन की मजदूरी के रूप में मैं आज लिखी एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ।

सावन गीत
ढूँढ रहा हूँ मैं तो अब भी
बचपन वाला वह सावन
मेंहदी तोड़ती बहनों को
झूला वन,उपवन,आंगन

ढूँढ रहा हूँ मैं तो अब भी
घंटी वाले कांवर को
कदवा करते बैलों को और
धान रोपती बंजारन को

ढूँढ रहा हूँ मैं भी अब तो
उस सावन की चूडीवाली को
भर-भर बाँहे हरी चूड़ियाँ
पहनाती जो गोरी/काली को

ढूँढ रहा हूँ मैं तो अब भी
डाकघर जाती बहना को
लिफाफे में भरकर राखी
टिकट साटती बहना को

ढूँढ रहा हूँ मैं तो अब भी
बसहा वाले बाबा को
डलिया में चावल देती माँ
और शीष नवाते दादा को

मेरा वो सावन कहाँ गया
कोई तो उसको लौटा दो
पाकर उसको चहक उठुंगा
कोई तो उसको लौटा दो….
कोई तो उसको लौटा दो…
कोई तो उसको लौटा दो..

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