Spread the love

 

– डाॅ. पुष्पा जमुआर

हे सखी अबरी के
सावन आईलैय
आगबा बरसावे
नहीं भींगे धानी रे चुनरिया

सखी आग लगावे सावन के महिनमा
पड़े नहीं रिमझिम रे फुहार
बूंद -बूंद ल छछनैय है जियरा
खेतबा में सुखे धानमां के बिचड़बा
खेत-खलिहान सुना होलो
गर्मी से रोब है गोदी के बालकबा

चढते उमरिया सखी सावन अईलैय
अबकी सवनमा में घाम के चढ़े पारा
तड़-तड़ चूअ लग है पसीना
बाग-बगीचा सखी लगलो न झूला
सावन के दिन झुलसे रहलो हे आँगनमां
पोर-पोर अंग -अंग जलाब है गर्मी
कैसे करे सोलह शृंगार
चूऐ तड़-तड़ पसीना
बदरा भी भीतर-बाहर
उमड़-घुमड़ते उड़ जाहैय दूर आकाश
सखी अबरी सावन में न भाए पियवा
फिर -फिर जो तू निगोड़ा सावन दूसर देश
जब भी आईहें रे सावन रिमझिम लेके फुहार

सखी सावन में
मनभावन न होलैय मौसम
धरती टक -टक ताके
कब बरसतै बरसात
धरा के
तन-मन होतै तृप्त
हरी चुनरिया ओढ़ कर
लहरा-लहरा के झूमंम बार-बार
हे सखी अबकी
सावन करते हो
अग्नि बरसा
गेलै हरियाली के दिन
जुग बदले लगलैई है
बदल गलैय हे मौसम के मिज़ाज
सखी सावन अईलैय हे लेके
गरम हवा,गर्मी की सौगात।

Leave a Reply

Your email address will not be published.