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– मीरा सिंह “मीरा”

 

पांच भाभियों के लाड़ले देवर आशु की बांछें खिली हुई थीं। हो  भी क्यों नहीं ? होली का दिन जो था। सभी भाभियां रसोई में विविध पकवान बनाने में जुटी हुई थीं। उन सबके हाथ बझे हुए थे। उनकी इस व्यस्तता का वह भरपूर आनंद उठा रहा था। गांव की परंपरा के अनुसार पुरुष घर के बाहर दालान में होली खेलने की तैयारी कर रहे थे। आशु भी होली की तैयारियों में व्यस्त था। खुशी का माहौल था।किसी काम से जब  आंगन में आता, तो मौका पाकर अपनी भाभियों के साथ हँसी – ठिठोली करते हुए रंग गुलाल पोत देता। फिर एक विजेता की तरह हंसते – खिलखिलाते दरवाजे की ओर दौड़ पड़ता। भाभियां चाहकर भी उसे पकड़ नहीं पा रहीं थीं। हाथ बझे होने के कारण वो सब मन मारकर रह जा रही थीं। यह देख बड़की भौजी ने अपनी गोतिनियों को समझाया, “चिंता काहे कर रही हो सब? देवर जी बड़ा तेज बनते फुदक रहे हैं न। कुछ देर और फुदकने दो उन्हें। पहले रसोई का काम सलट जाए। फिर देखना, बबुआ जी का क्या हाल करते हैं? हम सब पांच हैं। अउर उ अकेले। आज उनको छाक न छुड़ाया, तो मेरा नाम नहीं।”

यह सुनकर सब जल्दी-जल्दी रसोई का काम सलटाने लगी। काम खत्म ही होने को था कि अचानक आशु आंगन में ठंडई लेने आ  पहुंचा। भाभियां तो इसी अवसर की ताक में थीं। उन्होंने एक – दूसरे को कनखी मारी। फिर क्या था ! एक भौजाई ने उसे बात में उलझाया, दूसरी  भाभी ने तत्परता से डयोढी का दरवाजा बंद कर दिया। इस बीच अन्य भाभियां बाल्टी में रंग घोल चुकी थीं। भाभियों के हाथों में गुलाल और रंग था। इन सबसे अनभिज्ञ आशु ने जैसे ही ड्योढ़ी की तरफ कदम बढ़ाया, बड़की भौजी बोल पड़ी, “ऐ बबुआ जी, एक बात सुनिए न।”

इससे पहले कि वह बात समझ पाता, पीछे से मंझली और छोटकी भौजी ने दो बाल्टी रंग उस पर उड़ेल दिया। आशु बचने के प्रयास में तेजी से आगे की ओर भागा, पर बड़की भौजी ने रास्ता  रोक लिया। उसे संभलने का मौका दिए बगैर पीछे से अन्य भौजाइयां उसके गालों पर रंग और गुलाल पोतने लगीं। आंगन में जमकर धमाल हुआ। हंसी के ठहाकों से आंगन गूंज उठा। सबका मन खुशियों से सराबोर था।

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