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” लघुकथाकारों को दिशा निर्देश देना ही लघुकथा समीक्षकों की उपादेयता है!”: सिद्धेश्वर
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” ईमानदार और जानकार समीक्षकों का आज भी अभाव है! ” : अमन कुमार त्यागी
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” लघुकथा विधा में समीक्षकों के दायरे में विस्तार की जरूरत ! ” : डॉ रामकुमार घोटड़
पटना :18/07/2022! ” रचनाकार का नाम और मुंह देखकर समीक्षा और आलोचना करने वाले, लघुकथा की समीक्षात्मक टिप्पणी करते वक्त, लघुकथा की समीक्षात्मक बिंदु की ही अवहेलना कर जाते हैं l लघुकथा आंदोलन से जुड़े कई लब्ध प्रतिष्ठित लघुकथाकारों कि कई लघुकथाएं इन्हीं अवधारणाओं से अभिप्रेरित होती हैँ, और अपने द्वारा बनाए गए मापदंडों पर ही खरी नहीं उतरती l आजकल एक ही विषय पर कई लघुकथाएं हमारे सामने आ रही है, जो लघुकथा के विकास का बाधक बनी हुई है l थोड़े से संवाद और शब्दों के हेर फेर के बाद, एक ही विषय को उजागर करना , लघुकथा के प्रति नीरसता पैदा करती है l युवा लघुकथाकारों को इस तरह के दुहाराव से बचना चाहिए l समीक्षक आलोचक यदि इन बिंदुओं पर लघुकथाकारों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करें, तब लघुकथा सृजन में अपेक्षित विकास हो सकता है l लघुकथाकारों को दिशा निर्देश देना ही लघुकथा समीक्षकों की उपादेयता है l”
भारतीय युवा साहित्यकार परिषद के तत्वाधान में, फेसबुक के अवसर साहित्यधर्मी पत्रिका के पेज पर आयोजित ऑनलाइन हेलो फेसबुक लघुकथा सम्मेलन का संचालन करते हुए, संस्था के अध्यक्ष सिद्धेश्वर ने उपरोक्त उद्गार व्यक्त किया । उन्होंने कहा कि -” आज प्रतिदिन एक लघुकथा लिखने की बेचैनी, प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए विषय से संबंधित लघुकथा लिखने की विवशता और चित्र प्रतियोगिता की तरह, दिए गए चित्र देखकर लघुकथा गढ़ने की प्रक्रिया, लघुकथा के भविष्य के लिए घातक हो सकती है l अधिक छपने की भूख और रातों रात लघुकथा का बादशाह बन जाने की भूख ने ऐसी स्थिति ला खड़ा की है l”
मुख्य अतिथि ओपन डोर के संपादक एवं प्रकाशक अमन कुमार त्यागी ने कहा कि – ” लघुकथा समीक्षक और संपादक को भी अभी समझने की जरूरत है कि लघुकथा और लघु कहानी,दो अलग-अलग विधा है l ईमानदार समीक्षकों का आज भी अभाव है, जो लघुकथा का उचित मूल्यांकन कर सकें l मैं कमलेश्वर और दुष्यंत कुमार की परंपरा से जुड़ा हुआ व्यक्ति हूं, इसलिए लघुकथा का विकास चाहता हूं और लघुकथा के विकास के लिए समर्पित हूं l मैं अपनी पत्रिका और प्रकाशन के माध्यम से निष्पक्ष रूप से रचनाओं का मूल्यांकन कर,पुरस्कृत रचनाकारों को नगद राशि से सम्मानित करता हूं l जबकि आज धड़ल्ले से सम्मान पत्र बांटने वाले स्वयं समझ नहीं पाते की लघुकथा और लघु कहानी क्या है ? आज जिस धड़ल्ले से अनर्गल लघुकथाएं लिखी जा रही है, वह श्रेष्ठ लघुकथा के लिए बाधक है l ऐसी स्थिति में, लघुकथा समीक्षक होने के बजाय, लघुकथा के लिए स्वतंत्र समीक्षक की सख्त जरूरत है l ”
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रतिष्ठित लघुकथाकार डॉ रामकुमार घोटड़ ने कहा कि -” लघुकथा के सृजन में गुण दोष के आधार पर, शाश्वत मूल्यों के आधार पर कसौटी पर रखना,समीक्षक का कार्य है l दुर्भाग्य है कि लघुकथाकार ही आज समीक्षक की भूमिका निभाते आ रहे हैं l जबकि इसके लिए स्वतंत्र समीक्षकों की जरूरत है, जो ईमानदारी पूर्वक लघुकथाओं पर अपनी बेबाक दृष्टि डाल सके l लघुकथा विधा में समीक्षा का दायरा नहीं बढ़ पाने का एक प्रमुख कारण यही है l मित्रता निभाने के ख्याल से, लघुकथाकार समीक्षक लघुकथाओं में दोष नहीं निकाल पाते, जो श्रेष्ठ लघुकथाओं को आम पाठकों से रूबरू कराने के लिए जरूरी है l
कोलकाता के सुरेश कुमार चौधरी ने कहा कि ” जब लघुकथा पढ़ी जाती है या लिखी जाती है तो उसकी तत्काल समीक्षा हो तो लिखने वाले को दिशा निर्देश भी मिलते हैं और त्रुटियों का पता चलता है l अतः सर्वप्रथम समीक्षको को अपना मन्तव्य देना चाहिए। ”
विशिष्ट वक्ता डॉ शरद नारायण खरे ने कहा कि ” समीक्षा सदा सृजन को दिशा देती है l लघुकथा की समीक्षा अवश्य होनी चाहिए,पर समीक्षक को सदा सधा,मँजा व उत्कृष्ट लेखक होना चाहिए,अन्यथा लघुकथाकार की लेखनी पर नकारात्मक प्रभाव ही दृष्टिगोचर होगा । समीक्षक को समीक्ष्य लघुकथा में विद्यमान कमियों को बताते हुए एक बेहतर लघुकथा के तत्वों को स्पष्ट करना होगा,जिससे लघुकथाकार को दिशा मिल सकेl प्राय: लघुकथाकार सुगठित लघुकथा के स्थान पर बेतरतीब ढंग से कुछ भी लिख जाते हैं,तो समीक्षक को अपनी समीक्षा के द्वारा उन्हें साधना होगा,बाँधना होगा और सही ट्रेक पर दौड़ाना होगा।”
राज प्रिया रानी ने कहा कि – ” अधिकतर लघुकथाकार अपने समकालीन लघुकथाकारों की अच्छी रचनाओं को नजर में नहीं रखते और सिर्फ अपने मित्रों की रचनाओं की गिनती गिनाते हैं, जो समीक्षा के उद्देश्य को नकार देता है l निष्पक्ष समीक्षकों का आज घोर अभाव है, जिसके कारण अच्छी लघुकथाएं पाठकों के सामने आ नहीं पातीँ l”
इस ऑनलाइन लघुकथा सम्मेलन में देशभर के डेढ़ दर्जन से अधिक नए पुराने लघुकथाकारों ने अपनी- अपनी लघुकथाओं का पाठ किया । प्रियंका श्रीवास्तव शुभ्र ने ” आपत्ती “/ सीमा रानी ने ” बोहनी “/ डॉ योगेंद्र नाथ शुक्ल ने ” आत्मग्लानि “/ पुष्प रंजन ने ” वर्षगांठ की बेशुमार खुशी “/ अर्चना खंडेलवाल ने सूखानुभूति / अमन कुमार त्यागी ने – “हिंदी किस भाषा का शब्द है?” / रशीद गौरी ने “कोई और “/ मधुरेश नारायण ने ” आत्मबोध “/ रेखा भारती मिश्रा ने-” एंटीक फर्नीचर ” /कनक हरलालका ने ” विरासत “/ डॉ शरद नारायण खरे ने ” धर्मपरायणता ” / विजय कुमारी मौर्य ने – ” छूटती मंजिल ” / राम नारायण यादव सुपौल ने ” आसमान”/ ऋचा वर्मा ने “रिश्ते “/ मीना कुमारी परिहार ने -” ईद का चांद होना “/ राज प्रिया रानी ने – ” सम्मान ” शीर्षक लघुकथाओं का पाठ किया, जिसे ऑनलाइन ढेर सारे पाठकों ने सराहा l इसके अतिरिक्त सिद्धेश्वर की लघुकथा ” सिमटती दूरियां ” और संतोष सुपेकर की लघुकथा ” अंतिम इच्छा ” पर अनिल पतंग द्वारा बनाई गई लघु फिल्म का प्रदर्शन भी किया गया, जिसे ढेर सारे दर्शकों ने पसंद किया!
इनके अतिरिक्त मीनाक्षी सिंह, केवल कृष्ण पाठक,अशोक कुमार,,कीर्ति काले, सपना शर्मा, हरि नारायण हरि, चाहत शर्मा, अंजना पचौरी, पुष्पा शर्मा , नीरज सिंह, संतोष मालवीय,दुर्गेश मोहन, डॉ सुनील कुमार उपाध्याय आदि की भी दमदार उपस्थिति रही l
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🔷 प्रस्तुति :ऋचा वर्मा (उपाध्यक्ष ) / एवं सिद्धेश्वर ( अध्यक्ष )भारतीय युवा साहित्यकार परिषद ////// मोबाइल :92347 60365

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