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– प्रियंका श्रीवास्तव ‘शुभ्र’

 

यह महासमर की बेला है

व्याधियो ने चहु ओर घेरा है

अकुलाकर न देना तुम डार

अपने हिम्मत की पतवार

विश्वास की डोर धरना

बाजू में हिम्मत भरना

हो जाएंगे उस पार सभी

बाधाएं आएं कितनी भी

सागर हो कितना भी गहरा

घोर तिमिर का हो पहरा

ईश्वर में जो विश्वास रहे

पार उतरने की आस रहे ।

चीर तिमिर का उदर गहरा

ले उज्ज्वल रश्मि सा चेहरा

एक सुबह ऐसी होगी

जिसकी शाम श्याम न होगी ।

खिलता कुसुम सा बाहर आएगा

संग-संग भ्रमर गुनगुनाएगा

मन प्रफुल्लित हो जाएगा

सबमें उल्लास समाएगा ।

सब साथ मिलकर गाएंगे

संग में खुशियां मनाएंगे

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