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– विद्या शंकर विद्यार्थी

एक तो पति की कॉमा की स्थिति दूसरे चुनाव में पड़ी ड्यूटी को लेकर सविता काफी तनाव में थी। कैसे मिलेगी विमुक्त इन्हें ड्यूटी से, कैसे बचेगी इनकी नौकरी, इन्हें क्या पता है, क्या हो रहा है, इनकी नौकरी के साथ और…  और मेरे साथ…  सविता ने चुपके से बहते आँसू पोंछा।  क्या मानो अंदर ही अंदर बहुत कुछ पी भी गई।

सविता की व्यथा डॉक्टर पहचान गये थे क्योंकि  उनके अंदर भी मानवीयता थी कि एक पति के कॉमा में होने पर क्या स्थिति होती है नारी की। यह जालिम दुनिया नहीं समझेगी, क्योंकि हृदयहीन है, लुटेरा है, बेइमान है और पूरी तरह धोखेबाज है।

‘आँसू मत बहा बेटी, सब ठीक हो जाएगा।’ डॉक्टर ने सांत्वना देते हुए कहा।

‘कैसे नहीं बहाऊँ, कोई मेरे साथ नहीं है !’ सविता ने फफकते हुए कहा।

‘एक डॉक्टर की कलम है जो तेरे पति को चुनाव से मुक्त करेगी और मैं इन्हें इलाज के लिए बनारस रेफर करता हूँ ।’ कहते कहते डॉक्टर की आँखों से बह आये संवेदना के आँसू।

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