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– नसर आलम नसर

दीप यादों की जलाए जो वही इंसान है
राह भटकों को दिखाए जो वही इंसान है
नेक राहों पर चलाए जो वही इंसान है
आग नफरत की बुझाए जो वही इंसान है
“दीप यादों की जलाए जो वही इंसान है ”
यों तो रस्ते में बहुत से लोग मिल जाते हैं यार
भूखे इंसां को खिलाए जो वही इंसान है
आजकल तो हंसते बच्चों को रुला देते हैं लोग
रोते बच्चों को हंसाए जो वही इंसान है
यों तो इंसां हैं बहुत से इस ज़माने में नसर
काम इंसां के है आए जो वही इंसान है

– फुलवारी शरीफ पटना बिहार इंडिया
9304459648

One thought on “वही इंसान है ”

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