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हमारे देश की सभ्यता संस्कृति और नैतिक मूल्यों की दृष्टि से प्रेमचंद आज भी प्रासंगिक है!: सिद्धेश्वर
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सोशल मीडिया पर प्रेमचंद की मौजूदगी हमारी प्रेरणा है !: रुचि शर्मा
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साहित्य की कलम में, संवेदनाओं की स्याही भरकर, आत्मा की नीब से लिखा करते थे प्रेमचंद!: अपूर्व कुमार

पटना :01/08/2022! ” हिंदी साहित्य जगत में कथा उपन्यास की जब भी चर्चा होती है , प्रेमचंद का नाम सबसे ऊपर में आता है l बात ऊपर और नीचे की नहीं, बात समयगत उस प्रासंगिकता से है, जो हमारे जीवन मूल्यों को रेखांकित करती हुई,उनकी कथा कहानियों को, हमारे सबसे करीब ला खड़ा करती है l और बात सिर्फ यहां तक नहीं, बात प्रेमचंद की उस लेखन शैली से हैं, जो हमें जादुई आभास नहीं कराती, कोई दिमागी कसरत करने के लिए बाध्य नहीं करती, कोई पहेलीनुमा स्थिति उत्पन्न नहीं करती, कोई शब्दों के आडंबर में दिग्भ्रमित भी नहीं करती, और ना ही असहजता का बोध कराती है l शायद इसलिए प्रेमचंद किसी खास वर्ग के नहीं, किसी खास खेमे के नहीं, किसी खास विचारधारा के नहीं बल्कि संपूर्ण मानव समाज के सामने जीवंत हो उठते हैं l यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि आज के अधिकांश साहित्यकार और उनके शुभचिंतक, उनकी जयंतिया तो बड़ी धूमधाम से मना रहे हैं लेकिन उनकी राह पर नहीं चल रहे हैं, यह हमारे समाज की दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है l
भारतीय युवा साहित्यकार परिषद के तत्वाधान में गूगल मीट पर ऑनलाइन आयोजित ” मेरी पसंद आप के संग ” के तहत,प्रेमचंद जयंती संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए उपरोक्त उद्गार कवि- चित्रकार सिद्धेश्वर ने व्यक्त किया!

उन्होंने प्रेमचंद के कृतित्व पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि बढ़ते हुए समय अंतराल के बावजूद, क्या हम आज भी अपने समाज में, अपने जीवन अपने परिवार में, प्रेमचंद की कहानियों उपन्यासों के जीवंत पात्रों को उपस्थित नहीं पाते हैं ? सच तो यह है कि बदलते हुए विचारधारा और नैतिक मूल्यों के बावजूद, आज हम प्रेमचंद के विचारधारा से बहुत अलग नहीं हो पाते l आज भी हमें पंच परमेश्वर की आवश्यकता महसूस होती है l आज भी आर्थिक दीन हीन लोगों के बीच, कफन के पात्र किसी और कैमरे के फोकस में दिख पड़ते हैं l ग्रामीण इलाके में भी बहुत कुछ बदलाव आने के बावजूद, झोपड़ियों से लेकर खेत खलिहान में, कहीं न कहीं प्रेमचंद के पात्र हमें मिल ही जाते हैं, अपने नए रंग रूप में l
संगोष्ठी के मुख्य अतिथि एवं हस्ताक्षर पत्रिका की सम्पादिका रुचि शर्मा ने कहा कि प्रेमचंद जयंती पर बहुत ही अनमोल विचारों की प्रस्तुति रही। बिहार के साहित्य की धरोहर इस पीढ़ी ने प्रेमचंद की प्रासंगिकता पर जोर दिया। महत्वपूर्ण तथ्य यह कि सामान्य जीवन की रचना का चितेरा लेखक,आज़ का अदभुत और नायाब रचनाकार, कथाकार है। गर्व है हमे की हम प्रेमचंद के शताब्दी युग में,सोशल मीडिया पर जिस तरह आज़ प्रेमचंद जयंती मनाई गई उससे यही परिलाक्षित होता कि धनपतराय मुंशी प्रेमचंद की मौजूदगी हमारी प्रेरणा है l
पूरी संगोष्ठी का संचालन करते हुए युवा रचनाकार अपूर्व कुमार ने कहा कि – दरअसल प्रेमचंद ऐसे साहित्यकार थे जो साहित्य की कलम में, संवेदनाओं की स्याही भरकर, आत्मा की नीब से लिखा करते थे। वे साहित्यकारों के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए लिखते हैं कि-
“साहित्यकार का काम केवल पाठकों का मन बहलाना नहीं है। यह तो भाटों , मदारियों, विदूषकों और मसखरों का काम है। साहित्यकार का पद इससे कहीं ऊंचा है। वह हमारा पथ प्रदर्शक होता है। वह हमारे मनुष्यत्व को जगाता है। हमारे सद्भावों का संचार करता है। हमारी दृष्टि को फैलाता है।”
ऋचा वर्मा ने कहा कि – प्रेमचंद का कहना था “साहित्यकार देशभक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई नहीं अपितु उसके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सच्चाई है” हम साहित्यकारों का परम कर्तव्य है कि हम अपने सृजन द्वारा एक ऐसे समाज की परिकल्पना पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत करें जो प्रगति पथ पर अग्रसर, हर दृष्टि से एक आदर्श समाज हो.. क्या पता एक दिन यह कल्पना साकार रूप ले ही ले।
रेखा भारती मिश्रा ने विस्तार से कहा कि प्रेमचंद हिंदी साहित्य जगत के ऐसे विशिष्ट लेखक हैं जिनकी प्रासंगिकता आज भी यथावत बरकरार है । उनसे पहले और उनके बाद भी साहित्य में कई विविधताएं देखने को मिली मगर इन सब के बावजूद वे आज भी मानस पटल पर और साहित्य जगत में बार-बार याद किए जाते हैं । उनके लेखन में भाषा की सरलता देखने को मिलती है । साथ उनके पात्र का चरित्र हमारे आसपास के परिवार से मिलते-जुलते होते हैं । दूसरे शब्दों में कहें तो उनके लेखन में यथार्थ की झलक मिलती है । वह हमारे आसपास के लोगों को अपनी कहानियों का पात्र बनाते थे ‌ ना की किसी कल्पना से परे व्यक्तित्व को शामिल कर उसका महिमामंडन करते थे । उनकी कहानियों में दूरदृष्टि भी देखने को मिलती है । उनकी बुढ़ी काकी , निर्मला , ताई आदि कहानियां देखे जो वर्षों पहले लिखी गई थी मगर वह हमारे आज के परिवेश में भी फिट बैठती है । यह सब प्रेमचंद की दूरदर्शिता को स्पष्ट करता है । उनकी कहानियों में हर वर्ग के व्यक्ति की संवेदनशीलता को दर्शाया जाता रहा है ।
पूनम (कतरियार) ने कहा कि वास्तव में हिन्दी के कालजयी साहित्यकार प्रेमचंद का सृजन हिन्दी साहित्य का अमूल्य धरोहर है। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से हिन्दी कथा साहित्य के साथ ही हिन्दी उपन्यास को भी एक नया आयाम दिया ही, उसे एक ऐसी नींव दी जिसपर आगे हिन्दी गद्य की भव्य और आलीशान इमारत खड़ी हो सकीं। सामाजिक रुढ़ियों, कुत्सित मनोवृत्तियों, भ्रष्टाचार और शोषण के खिलाफ अपनी पैनी लेखनी से जिस तरह कभी तेज, कभी धीमे से, कभी घुमाकर प्रहार करनेवाला आधुनिक हिन्दी का यह प्रथम कहानीकार – उपन्यासकार, आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना अपने समय में था। स्थिति आज भी वही है, बस शोषण के मापदंड बदल गयें हैं, शोषकों के मुखौटे बदल गयें हैं,__आम आदमी आज भी वहीं खड़ा हैं जहाँ प्रेमचंद के युग में खड़ा था। और आज का रचनाकार भी उसी संवेदनशीलता से उसकी दास्तां बयां कर रहा है। और यही चीज आज के संदर्भ में प्रेमचंद के औचित्य को सिद्ध कर रहा है।
फिल्म निर्माता निर्देशक एवं अभिनेता अनिल पतंग ने कहा कि प्रेमचंद एक बहुत अच्छे अनुवादक भी थे, और उन्होंने कई महत्वपूर्ण कृतियों का अनुवाद किया l सच पूछिए तो प्रेमचंद हमारे युग के वेदव्यास थे l उन्होंने अपनी रचनाओं में उस अंतरधारा का सजीव चित्रण किया जो समाज की रीढ़ है l प्रेमचंद की कहानियों पर कम ही फिल्में बनी,लेकिन वह समाज में क्रांति की प्रतीक बनी l मजदूर फिल्म में उन्होंने छोटा सा अभिनय भी किया l तमाम तंगी और फटेहाली के बावजूद उनके स्वाभिमान में कोई कमी नहीं देखी गई ना उनके चेहरे पर कभी परेशानी l ”
साहित्य विविधा के इस कार्यक्रम में रशीद गौरी ने – दिलों में खुद गई है अदम खाइयाँ,तो मैं क्या लिखूं जीवन यात्रा?/ पूनम सिन्हा श्रेयसी ने -युद्ध में बीतता है एक-एक पल,एक युग की तरह!”/ लोक नाथ मिश्र ने -बहुत हुआ अब और नहीं,क्या होगा अब फ़िक्र नहीं, खून हमने बहुत जलाया!/ मीना कुमारी परिहार ने – प्यार के मुश्किल सफर में,हूं अभी हर इक नजर में!” सावनी गजल /, पुष्प रंजन कुमार ने- यहां नौनिहालों को बुखार मार देता है, यहां बीमारों को उपचार मार देता है,यहां नौजवानों को रोजगार मार देता है! जैसी कई उम्दा कविताओं का पाठ भी किया गया!
इस गूगल मीट के कार्यक्रम को फेसबुक के अवसर साहित्यधर्मी पत्रिका के पेज पर भी पर भी लाइव देखा गया l जिसमें सुनील कुमार उपाध्याय,सपना चंद्रा, विजेंद्र जैमिनी, प्रियंका श्रीवास्तव शुभ्र,अनिल खोरी,डॉ नीलू अग्रवाल, दुर्गेश मोहन संतोष मालवीय आदि की भी भागीदारी रही!

💠 प्रस्तुति :ऋचा वर्मा (उपाध्यक्ष ) / एवं सिद्धेश्वर ( अध्यक्ष ) भारतीय युवा साहित्यकार परिषद,  मोबाइल :92347 60365

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